सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद
दयपर्यन्तं कर्मानुष्ठानम्, ततः कर्मतत्सन्न्यासाभ्यां विद्यानिष्पत्त्यभ्युपगमात् । उक्तं हि नैष्कर्म्यसिद्धौ—
‘प्रत्यक्प्रवणतां बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव ॥’ इति
कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षेऽपि विविदिषापर्यन्तमेव कर्मानुष्ठाने विविदिषार्थत्वपक्षात् को भेद इति चेद्, अयं भेदः—कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षे द्वारभूतविविदिषासिद्ध्यनन्तरमुपरतावपि फलपर्यन्तानि विशिष्टगुरुलाभानिर्विघ्नश्रवणमननादिसाधनानि निवृत्तिप्रमुखानि सम्पाद्य विद्योत्पादकत्वनियमोऽस्ति । विविदिषार्थत्वपक्षे तु श्रवणादिप्रवृत्तिजननसमर्थोत्कटेच्छासम्पादनमात्रेण कृतार्थतेति नावश्यं विद्योत्पादकत्वनियमः । ‘यस्यैतेचत्वारिंशत्
( योग ) के उदयतक कर्मोंका अनुष्ठान और उसके बाद संन्यास है, इस रीतिसे कर्म और कर्मके त्यागसे विद्याकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना है।
नैष्कर्म्यसिद्धिमें भी कहा है— ‘प्रत्यक्प्रवणताम्०’ (चित्तशुद्धिद्वारा बुद्धिमें विविदिषा, वैराग्य आदि प्रत्यक्प्रावण्यकी प्राप्ति करनेके बाद कर्मोंका प्रयोजन प्राप्त हो जानेसे वे कर्म वर्षाकालके बाद मेघके समान अस्त हो जाते हैं ।) यदि शङ्का हो कि कर्मोंके विद्यार्थत्वपक्षमें भी विविदिषातक ही उनका अनुष्ठान होनेसे कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षसे क्या भेद हुआ ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेद इस प्रकारसे है—कर्मोंके विविदिषार्थत्वपक्षमें द्वारभूत विविदिषाकी सिद्धिके बाद उनका त्याग होनेपर भी अदृष्टद्वारा फलकी उत्पत्तितक विशिष्ट गुरुकी प्राप्तिसे निवृत्तिप्रमुख ( निवृत्तिसहित ) श्रवण, मनन आदिका सम्पादन करके वे कर्म विद्याके उत्पादक होते हैं, ऐसा नियम है और विविदिषार्थत्वपक्षमें, तो अर्थात् जिस पक्षमें कर्मोंका प्रयोजन केवल ब्रह्मज्ञानकी इच्छा पैदा करना है, उस पक्षमें तो श्रवण आदिमें प्रवृत्ति करानेमें समर्थ, ऐसी उत्कट इच्छाके सम्पादनमात्रसे कृतार्थता है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकत्व * है,
* विविदिषार्थत्वपक्षमें यज्ञ आदिसे उत्पन्न अदृष्ट श्रवण आदिमें प्रवृत्ति तक रुचिका (विविदिषाका) उत्पादन करके नष्ट हो जाता है, क्योंकि अदृष्टका फलोत्पत्तिके बाद विनाश होता है, यह नियम है। और विविदिषाकी उत्पत्तिके अनन्तर श्रवण आदिके प्रति बाधक न