सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 451, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४२१
वन्वयस्य व्युत्पन्नतयाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोगः । ननु तथा सति यावद्विद्योदयं कर्मानुष्ठानापत्त्या 'त्यजतैव हि तज्ज्ञेयम्' इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं कर्मत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य विद्यार्थत्वं पीड्येतेति चेद्, न ; प्राग् बीजावापात् कर्षणम्, तदनन्तरमकर्षणमिति कर्पणाकर्षणाभ्यां व्रीह्यादिनिष्पत्तिवद्—
'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥'
इत्यादिवचनानुसारेण चेतः शुद्धौ विविदिषादिरूपप्रत्यक्प्रावण्यो-
व्युत्पन्न है, अतः प्रकृतिसे अभिहित ( कथित ) विद्यामें ही यज्ञ आदिका × विनियोग है ।
यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर विद्याकी उत्पत्ति तक कर्मानुष्ठानकी प्रसक्ति होनेसे 'त्यजतैव०' ( सब कर्मोंका त्याग करके ही पुरुषको ) प्रत्यगात्मरूप ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए, त्याग किये बिना नहीं ) इत्यादि श्रुतिसे* सिद्ध कर्मत्यागरूप संन्यासमें विद्यार्थता बाधित होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे बीज बोनेके पूर्वमें हल जोतना पड़ता है, उसके बाद नहीं, इससे कर्षण और अकर्षणसे व्रीहिकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही—
'आरुरुक्षोर्मु०' ( योगकी सिद्धि होनेके पूर्वमें उसके प्रति कर्म कारण हैं और योगसिद्ध होनेके बाद उन कर्मोंका शम ( संन्यास ) कारण है, ऐसा कहा जाता है ) इस वचनके अनुसार अन्तःकरणकी शुद्धिमें विविदिषारूप प्रत्यक्प्रावण्य
× यदि इसमें कोई शङ्का करे कि उदाहृत वाक्योंमें अर्थात् 'अश्वेन जिगमिषति' इत्यादि वाक्योंमें अश्व आदिका इच्छामें अन्वय नहीं हो सकता है, इसलिए इच्छान्वयका परित्याग किया ? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्तिसे यह भी कह सकते हैं कि वेदनेच्छाके भी यज्ञान्वयमें अयोग्य होनेसे उसमें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है और ब्रह्मवेदनका, जो कि ब्रह्मानन्दसाक्षात्काररूप है, फलरूपसे अन्वय हो सकता है, यह भाव है ।
* 'अथ परिव्राट्' इस प्रकारसे उपक्रम करके 'ब्रह्मभूयाय कल्पते' इत्यादि कही गई अन्य श्रुतिसे परिव्राट्शब्दसे कथित संन्यास ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण बतलाया गया है, इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी कहा गया है, यह अभिप्राय है ।