सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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विवरणानुसारिणस्त्वाहुः—‘प्रकृतिप्रत्ययार्थयोः प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यम्’ इति सामान्यन्यायाद् ‘इच्छाविषयतया शब्दबोध्ये एव शब्दसाधनतान्वयः’ इति स्वर्गकामादिवाक्ये क्लृप्तविशेषन्यायस्य बलवत्त्वात् । ‘अश्वेन जिगमिषति’ ‘असिना जिघांसति’ इत्यादिलौकिकप्रयोगे अश्वादिरूपसाधनस्य, ‘तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यं’ ‘मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ इत्यादिवैदिकप्रयोगे तव्यार्थभूतविधेश्च सन्प्रत्ययाभिहितेच्छाविषये एव गमनादा-
विवरणानुसारी लोग कहते हैं कि † ‘प्रकृति०’ ( प्रकृति और प्रत्ययके अर्थोंमें प्रत्ययका ‡ अर्थ ही प्रधान होता है ) इस सामान्य नियमसे स्वर्गकामादि वाक्यमें क्लृप्त ‘इच्छाविषय होनेसे शब्दबोध्य अर्थमें ही शब्दसाधनताका अन्वय होता है’ यह न्याय बलवान् है । और ‘घोड़ेसे जानेकी इच्छा करता है, तलवारसे मारनेकी अभिलाषा करता है’ इत्यादि लौकिकप्रयोगमें अश्व आदिरूपसाधनका और ‘तदन्वेष्टव्यम् ०’ ( उसकी — परमात्माकी — खोज करनी चाहिए, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए, आत्माका मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए ) इत्यादि वैदिकप्रयोगमें तव्यार्थभूत विधिका सन्प्रत्ययसे कही गई इच्छाके विषयभूत गमन आदिमें ही अन्वय
† भामत्यादि नवटीकोपेत शाङ्करभाष्यके पृ० ६८३ में इस मतकी पोषक विवरणकी पंक्तियाँ हैं—'नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानैः संस्कृतस्याऽऽत्मनो यदि श्रवणमननध्यानाभ्यासादीनि ज्ञानसाधनानि सम्पद्यन्ते, तदा संस्कारकर्माणि सहकारिविशेषादात्मज्ञानमवतारयन्ति—इत्यादि । इसी प्रकार और अनेक वाक्योंसे भी इसी अर्थका प्रतिपादन श्रुति और स्मृतिके विरोधपरिहारपूर्वक किया गया है ।
‡ ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इसमें सनरूप प्रत्ययका अर्थ है—इच्छा और विद्धातुरूप प्रकृतिका अर्थ है—ज्ञान, इनमें प्रत्ययार्थ इच्छा ही प्रधान है, इसलिए शब्दतः प्रधानरूपसे प्रतीत होनेवाली इच्छामें ही यज्ञादिका विनियोग प्राप्त है, परन्तु इस नियमका औत्सर्गिक होनेसे बाध हो सकता है । अतः ‘स्वर्गकामो यजेत’ इस विधिवाक्यमें विधायकप्रत्ययसे इष्टसाधनत्वरूपसे अवगत यागके इष्ट विशेषकी आकाङ्क्षामें शब्दतः स्वर्गके प्रधान न होनेपर भी फलत्वरूपसे अन्वय किया गया है, इसलिए ‘इष्यमाणसमभिव्याहारे इष्यमाणस्यैव प्राधान्यम्’ न तु इच्छायाः’ ( इच्छा और इच्छाविषयके सामीप्य रहते इच्छाका विषय ही प्रधान होता है, इच्छा नहीं ) इस प्रकारका विशेषनियम, जो कि पूर्व सामान्यनियमका बाधक है, बलवान् है, यह भाव है ।