सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 454, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
णामेव विद्योपयोगः । अत एव 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३२ ) इति शारीरकसूत्रे विद्यार्थकर्मस्वाश्रमकर्मपदप्रयोग इति ॥
'परैस्तु वैधुरादीनामपि कल्पतरूक्तितः ॥४॥
कोई लोग कल्पतरुकी उक्तिके अनुसार आश्रमरहित विधुर आदिकोंके कर्मोंका भी उपयोग कहते हैं ॥ ४ ॥
कल्पतरौ तु नाऽऽश्रमधर्माणांमेव विद्योपयोगः, 'अन्तरा चाऽपि तु तद्-दृष्टेः' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३६) इत्यधिकरणे आश्रमरहितविधुराद्यनुष्ठितकर्मणामपि विद्योपयोगनिरूपणात् । न च विधुरादीनामनाश्रमिणां प्राग्जन्मानुष्ठितयज्ञाद्युत्पादितविविदिषाणां विद्यासाधनश्रवणादावधिकारनिरूपणमात्रपरं तदधिकरणम्, न तु तदनुष्ठितकर्मणां विद्योपयोगनिरूपणपरमिति शङ्क्यम् । 'विशेषानुग्रहश्च' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३८)
हैं, इसीलिए 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि'* इस शारीरिकसूत्रमें विद्याके उपयोगी कर्मोंमें 'आश्रमकर्म' पदका प्रयोग किया गया है ।
कल्पतरुमें † तो कहा है कि आश्रमधर्मोंका ही विद्यामें उपयोग है, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें आश्रमरहित विधुर आदिसे अनुष्ठित कर्मोंका भी विद्यामें उपयोगनिरूपण किया गया है । यदि शङ्का हो कि पूर्वजन्ममें अनुष्ठित यज्ञ आदिसे जिन्होंने विविदिषाकी उत्पत्ति की है, ऐसे अनाश्रमी विधुरोंका विद्याके साधन श्रवण आदिमें अधिकार है, इसीका निरूपण उक्त अधिकरणमें किया गया है, न कि विधुरोंसे इसी जन्ममें अनुष्ठित कर्मोंका विद्यामें उपयोगका निरूपण किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'विशेषानुग्रहश्च'‡
* सूत्रका यह अर्थ है कि कर्मफलोंकी अभिलाषा न करनेवाले आश्रमीको भी आश्रम-कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि आश्रमीके प्रति उन कर्मोंका शास्त्रोंमें विधान है, अन्यथा प्रत्यवाय होगा, यह भाव है ।
† इस सूत्रका यह अर्थ है—आश्रमके बिना रहे हुए पुरुषोंका भी ब्रह्म-विद्यामें अधिकार है, क्योंकि रैक्वप्रभृति अनाश्रमी पुरुषोंको भी ब्रह्मविद्या हुई है, यह भाव है ।
‡ देवताराधन आदि विशेषधर्मोंसे चित्तशुद्धिद्वारा रैक्वप्रभृतिको आश्रमधर्मोंके समान विद्याका अनुग्रह देखा गया है, अतः अनाश्रमियोंका कर्म भी विद्याका साधन है, इसीलिए—
'जप्येनैव संसिद्धयेत् ब्राह्मणो नाऽत्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥'
अर्थात् जपसे भी ब्राह्मण सिद्धि प्राप्त करता है, उसमें तनिक भी संशय नहीं है । वह अन्य कर्म करे या न करे, क्योंकि ब्राह्मण दयावान् कहलाता है, यह भाव है ।