सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२५
तदधिकरणसूत्रतद्भाष्ययोस्तदनुष्ठितानां जपादिरूपवर्णमात्रधर्माणामपि विद्योपयोगस्य कण्ठत उक्तेः । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' इति सूत्रे आश्रमकर्मपदस्य वर्णधर्माणामप्युपलक्षणत्वादित्यभिप्रायेणोक्तम्—
तत्र क्लृप्तफलत्वेन नित्यानामेव कैश्चन ।
कोई लोग कहते हैं कि क्लृप्त फल होनेसे नित्य कर्म ही विद्याके उपयोगी हैं ।
आश्रमधर्मव्यतिरिक्तानामप्यस्ति विद्योपयोगः, किन्तु नित्यानामेव । तेषां हि फलं दुरितक्षयं विद्याऽपेक्षते, न काम्यानां फलं स्वर्गादि । तत्र यथा प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणामङ्गानामतिदेशे सति न प्राकृतोपकारा-
इस प्रकारके उसके अधिकरणके सूत्र और भाष्यमें जपादिरूप सम्पूर्ण धर्मोंका उपयोग साक्षात् कहा गया है । 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माऽपि' इस सूत्रमें 'आश्रमकर्मशब्द सभी वर्णधर्मोंका उपलक्षण है' अर्थात् आश्रमकर्मसे भिन्न इतर वर्णधर्मोंका भी ग्रहण करना चाहिए, यह भाव है—इसी अभिप्रायसे कल्पतरुमें पंक्तियां भी हैं—
यद्यपि आश्रमधर्मसे *इतर धर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, तथापि वे नित्यधर्म ही हैं, क्योंकि उनका दुरितक्षयरूप जो फल है, उसीकी अपेक्षा विद्या करती है, काम्यकर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग आदि फलकी अपेक्षा नहीं करती है, इस परिस्थितिमें अर्थात् विद्यामें उपयोगी उपकारकी हेतुताके काम्यकर्मोंमें न होनेसे जैसे प्रकृतियागमें † प्रसिद्ध उपकारी अङ्गोंका विकृतिमें अतिदेश होनेपर प्रकृतिमें किये हुए उनके उपकारसे
* इन पंक्तियोंको कल्पतरुमें, जिसके प्रणेता अमलानन्दस्वामी हैं, देखिए पृ० ६२ भामतीकल्पतरुसहित शाङ्करभाष्य । इससे यही सिद्ध होता है कि 'विविदिषन्ति' इत्यादि विविदिषाश्रुतिसे जिन यज्ञ आदि धर्मोंका विद्यामें उपयोग कहा गया है, वे नित्य ही धर्म लेने चाहिएँ, काम्य नहीं, क्योंकि काम्योंका यदि ग्रहण किया जायगा, तो काम्य कर्मोंके स्वाभाविक फलका परित्याग करके उनका नित्यसाधारण पापक्षयरूप फल मानना होगा, कारण कि विद्या पापक्षयकी अपेक्षा रखती है, स्वर्ग आदिकी नहीं, इससे केवल गौरव होगा, यह भाव है ।
† प्रकृतियाग उसे कहते हैं, जो अतिदिश्यमान अङ्गका प्रतियोगी हो । प्रतियोगी उसे कहना चाहिए कि जिस यागके अङ्ग अतिदिष्ट होते हों, और विकृतियागका अर्थ है अतिदिश्यमान अङ्गोंका अनुयोगी, जिसमें अङ्ग अतिदिष्ट हों, वह अनुयोगी है । प्रकृतियागमें श्रुत पदार्थकी विकृतिमें कल्पना करना अतिदेश कहलाता है। दर्शपूर्णमास प्रकृतियाग है, क्योंकि इसके पदार्थोंका विकृतिभूत सौर्य पशुयाग आदिमें अतिदेश होता है, और सौर्य पशुयाग आदि विकृतियाग हैं, क्योंकि वे अतिदिश्यमान दर्शपूर्णमासयागके पदार्थोंके अनुयोगी हैं, यह भाव है ।
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