सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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तिरिक्तोपकारकल्पनम्, एवं ज्ञाने विनियुक्तानां यज्ञादीनां क्लृप्तनित्यफलपापक्षयातिरेकेण न नित्यकाम्यसाधारणविद्योपयोग्यपकारकल्पनमिति ।
काम्यानामपि संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ ५ ॥
न चोपकारसंक्लप्तिद्वारं वाक्यं प्रतीक्षते ।
प्राप्तैर्वचनवैयर्थ्यं द्वारभेदेऽविशिष्टता ॥ ६ ॥
संक्षेपशारीरककारके मतमें काम्यकर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, वाक्य उपकारसंक्लप्तिरूप द्वारकी अर्थात् अन्यत्र जिस उपकार की प्राप्ति हुई हो, उसकी अपेक्षा नहीं करता है, क्योंकि उसकी प्राप्ति होनेसे वाक्य ही व्यर्थ होगा, यदि द्वारभेद मानेंगे, तो समानता ही प्रसक्त होगी ॥ ५ ॥ ६ ॥
संक्षेपशारीरके तु नित्यानां काम्यानां च कर्मणां विनियोग उक्तः, यज्ञादिशब्दाविशेषात् । प्रकृतौ क्लृप्तोपकाराणां पदार्थानां क्लृप्तप्राकृतो-
भिन्न उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, वैसे ही ज्ञानमें विनियुक्त [ नित्य ] यज्ञोंका नित्यकर्मोंके फलरूपसे प्रसिद्ध पापविनाशसे अतिरिक्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, कारण कि वैसी कल्पना करनेमें गौरव है।
* संक्षेपशारीरकमें तो नित्य और काम्य 'दोनों कर्मोंका विद्यामें विनियोग कहा है, क्योंकि 'तमेतम्' इत्यादि श्रुतिमें सामान्यरूपसे यज्ञ आदि शब्दोंका कथन किया गया है। † प्रकृतियागमें जिनका उपकार प्रसिद्ध है, ऐसे पदार्थोंका—क्लृप्त प्रकृतियागीयके उपकारके अतिदेशसे ही विकृतियागमें अतिदेशसे—
* संक्षेपशारीरककारका यह भाव है कि 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इसमें यज्ञशब्द जैसे 'नित्य यज्ञोंमें रूढ है, वैसे ही काम्ययज्ञोंमें भी रूढ है, इसलिए नित्य कर्मोंके समान काम्य-कर्मोंका भी विद्यामें उपयोग प्रतीत होता है, अतः नित्यकाम्य साधारण किसी उपकारविशेषकी कल्पनामें कोई विरोध नहीं है।
† नित्यकाम्यसाधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो पूर्वमीमांसाके न्यायके साथ विरोध होगा, ऐसा समझ कर कल्पतरुमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका दृष्टान्त दिया गया है, उसका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृतियागमें जिन पदार्थोंका उपकार क्लृप्त है, उनका पहले अतिदेश होता है, अनन्तर उन पदार्थोंके उपकारका विकृतिमें अतिदेश होता है, पहले प्राकृतिके पदार्थोंके अतिदेशसे विकृतिमें विनियोग करनेके बाद इनके उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए प्रकृतिविकृतिस्थलमें क्लृप्त उपकारका