सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२७
पकारातिदेशमुखेनैव विकृतिष्वतिदेशेन सम्बन्धः, न तु पदार्थानामपि- देशानन्तरमुपकारकल्पनेति न तत्र प्राकृतोपकारातिरिक्तोपकारकल्पना- प्रसक्तिः । इह तु प्रत्यक्षश्रुत्या प्रथममेव विनियुक्तानां यज्ञादीनामुप- दिष्टनामङ्गानामिव पश्चात् कल्पनीय उपकारः प्रथमावगतविनियोग- निर्वाहायाक्लृप्तोऽपि सामान्यशब्दोपात्तसकलनित्यकाम्यसाधारणः कथं न कल्प्यः । अध्वरेषु अध्वरमीमांसकैरपि हि ‘उपकारमुखेन पदार्थान्वये एव क्लृप्तोपकारनियमः, पदार्थान्वयानन्तरम् उपकारकल्पने त्वकॢप्तोऽपि विनियुक्तपदार्थानुगुण एव उपकारः कल्पनीयः’ इति सम्प्रतिपद्यैव बाध-
सम्बन्ध होता है, पदार्थोंके अतिदेशके बाद उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए विकृतिस्थलमें प्रकृतिस्थपदार्थोंके उपकारसे पृथक् उपकारकी कल्पना प्रसक्त नहीं है, प्रकृतस्थलमें⁺ तो साक्षात् ‘यज्ञेन’ इस श्रुतिसे पहले ही विनियुक्त यज्ञ आदिके—जैसे* उपदिष्ट अङ्गोंका प्रथम अवगत विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त दृष्टादृष्टरूप उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही प्रथम अवगत विनियोगका निर्वाह करनेके लिए अक्लृप्त होनेपर भी सामान्य यज्ञशब्दसे नित्यकाम्य साधारण पश्चात् कल्पनीय—उपकारकी कल्पना क्यों न की जाय ? अर्थात् अवश्य की जाय, यह भाव है । प्रथम उपकारके अतिदेशके अनन्तर जहाँ पदार्थोंका अन्वय किया जाता है, वहींपर क्लृप्त अर्थात् प्रथमतः ज्ञात उपकारकी कल्पना होती है, अन्य की नहीं, यह नियम है और जहाँपर पदार्थोंके अन्वयके पीछे उपकारकी कल्पना की जाती है, वहींपर अक्लृप्त होनेपर भी विनियुक्त पदार्थोंके अनुकूल ही उपकारकी कल्पना की
⁺ परित्याग करके अन्य उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए दृष्टान्त विषम है अर्थात् प्रकृतस्थलमें तो पहले यज्ञ आदिका विनियोग करनेके बाद उपकारकी कल्पना की जाती है और अतिदेशस्थलमें प्रकृतिमें उपकारकी कल्पना करनेके बाद प्रकृतियज्ञके पदार्थोंका विकृतिमें विनियोग होता है ।
* दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें अथवा अन्य स्थलमें जो पदार्थ उपदिष्ट हैं अर्थात् साक्षात् श्रुतिसे बोधित हैं उनका श्रुति, लिङ्ग आदि प्रमाणोंसे पहले ही दर्श, पूर्णमास आदिमें विनियोग हो जाता है, अनन्तर इस विनियोगके निर्वाहके लिए दृष्ट और अदृष्टरूप किसी फलरूप द्वारकी कल्पना-की जाती है, इसी प्रकार ‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादि श्रुतिसे प्रथमतः ही यज्ञ आदिका विविदिषामें विनियोग हो जाता है, इसलिए इस विनियोगको सफल करनेके लिए अक्लृप्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यह भाव है ।