सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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लक्षणारम्भसिद्धयर्थमुपकारमुखेन विकृतिषु प्राकृतान्वयो दशमाद्ये समर्थितः । किञ्च ‘क्लृप्तोपकारालभान्नित्यानामेवाऽयं विनियोगः’ इत्यभ्युपगमे नित्येभ्यो दुरितक्षयस्य तस्माच्च ज्ञानोत्पत्तेरन्यतः सिद्धौ व्यर्थोऽयं
जाती है, इस प्रकार कर्मोंके विषयमें अङ्गीकार करके ही पूर्वमीमांसकों ने बाधाध्यायके आरम्भके लिए उपकारका अतिदेश करनेके बाद विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका सम्बन्ध * दशम अध्यायके प्रथम पादमें बतलाया है। किञ्च, क्लृप्त उपकारकी काम्योंमें प्राप्ति न होनेसे नित्य कर्मोंका ही यह विद्यामें विनियोग है, ऐसा माननेपर नित्य कर्मोंसे पापका विनाश और विविदिषावाक्यसे भिन्न वाक्यसे ज्ञानोत्पत्ति यदि सिद्ध है, तो यह विनियोग ही
* प्रकृतिभागके अङ्गभूत पदार्थोंकी, अतिदेशसे विकृतियागमें, प्राप्ति दिखलाई गई है। तात्पर्य यह है कि पूर्वमीमांसाके दशम अध्यायमें विकृतिमें अतिदिष्ट अङ्गोंका प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर बाधका निरूपण किया गया है। उस बाधनिरूपणकी, यदि विकृतिमें अतिदेशसे पदार्थप्राप्तिके बाद उपकारकी कल्पना की जाय, तो सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि जैसे प्रकृतिमें श्रुति आदिसे विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट फल न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अतिदेशसे विकृतियागमें विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट उपकारके न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी भी कल्पना हो सकनेसे उसकी सिद्धिके लिए सभी अङ्गोंका अनुष्ठान अवश्यम्भावी होनेके कारण कुछ अङ्गोंका अनुष्ठान या उसके अंशातिदेशप्रामाण्यरूप बाधका असम्भव है, इसलिए बाधनिरूपणकी सिद्धिके लिए प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारके अतिदेशसे ही विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोंका अन्वय है, इस प्रकार दशम अध्यायके प्रथम अधिकरणमें निश्चित किया गया है; इसलिए जहांपर पदार्थोंके विनियोगके अनन्तर उपकारकी कल्पना की गई हो, वहाँपर उन पदार्थोंकी अपनी सामर्थ्यके अनुसार प्रथमतः ज्ञात विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना मीमांसक सम्मत है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि विनियोगके बाद जहाँ उपकारकी कल्पना की गई हो, उस स्थलमें भी क्लृप्त उपकारका सम्भव न होनेपर विनियुक्त पदार्थका परित्याग ही इष्ट हो, अक्लृप्त उपकारकी कल्पना इष्ट न हो, ऐसा माना जाय, तो ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि निरूपण करनेवाला अधिकरण ही व्यर्थ होगा, क्योंकि श्रपण, अवघात आदि पदार्थोंका अतिदेशसे विनियोग होनेपर भी विकृतियागस्थ कृष्णल आदिमें श्रपण आदिके विक्लेत्ति;- तुषविमोक आदि लोकसिद्ध दृष्टोपकारका अभाव होनेसे और अक्लृप्त उपकारकी कल्पनाका स्वीकार न होनेसे श्रपणादिका अननुष्ठानलक्षण बाध, जिसका कि दशम-अध्यायमें निरूपण किया गया है, हो सकता है, फिर उसके लिए ‘उपकारमुखेन’ इत्यादि-निरूपण करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे विविदिषावाक्यसे सामान्यतः नित्यकाम्यसाधारण विनियोगके प्रथम अवगत होनेपर उसकी उपपत्तिका लिए अक्लृप्त उपकारकी कल्पना युक्त ही है, यह भाव है।