सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेषोंका कथन] भाषानुवादसहित ४२९
विनियोगः; अन्यतस्तदसिद्धौ ज्ञानापेक्षितोपकारजनकत्वं तेष्वक्लृप्तमित्य- विशेषाद् नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो दुर्वारः । ननु नित्यानां दुरितक्षयमात्रहेतुत्वस्यान्यतः सिद्धावपि विशिष्य ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धक- दुरितनिर्वर्हकत्वं न सिद्धम्, किन्तु अस्मिन् विनियोगे सति ज्ञानो- द्देशेन नित्यान्यनुतिष्ठतोऽवश्यं ज्ञानं भवति; इतरथा शुद्धिमात्रम्, न नियता ज्ञानोत्पत्तिरिति सार्थकोऽयं विनियोग इति चेत्, तर्हि नित्याना-
व्यर्थ है, यदि दूसरेसे सिद्ध नहीं है, तो ज्ञानके लिए अपेक्षित उपकार जनकता नित्यमें क्लृप्त ही नहीं है, इसलिए ? नित्य और काम्य कर्मोंके साधारण विनियोगका निवारण कर ही नहीं सकते हैं। यदि शङ्का हो कि * नित्य कर्मोंमें केवल दुरितक्षयकी हेतुताकी अन्यसे सिद्धि होनेपर भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापक्षयहेतुता अन्य प्रमाणसे विशेषरूपतया सिद्ध नहीं है; किन्तु इस विनियोगसे ही यह सिद्ध होता है कि ज्ञानके उद्देश्यसे यदि पुरुष नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करे, तो अवश्य ज्ञान उत्पन्न होता है; इस विनियोगके † न रहते केवल शुद्धिमात्र ही होती है, नियमसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए यह विनियोग सार्थक है ? तो यह भी युक्त
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि दुरित दो प्रकारके हैं—एक तो ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक और दूसरा ज्ञानकी उत्पत्तिमें उदासीन होकर नरकादि देनेवाला। इस अवस्थामें यदि नित्य- कर्मोंका ज्ञानमें विनियोग न किया जाय, तो नित्यकर्मोंसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितका क्षय होता है, इसमें प्रमाण नहीं है, 'धर्मेण पापमपनुदति' (धर्मसे पाप हट जाता है) 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (यज्ञ, दान और तप मनीषियोंको पावन करनेवाले हैं) इस प्रकारके श्रुति-स्मृति-वचन भी नित्य कर्मोंमें सामान्यपापक्षयकी हेतुताका प्रतिपादन करते हैं। इससे नित्य कर्मोंमें नियमतः ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितक्षयहेतुता दूसरेसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए उसकी प्राप्ति करानेके लिए यह विनियोग है, अर्थात् यह बात अन्यतः सिद्धिपक्षका अवलम्बन करके विनियोगकी सार्थकता बतलाती है, यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि यज्ञ आदिका ज्ञानमें विनियोग न होनेपर नित्य आदिके अनुष्ठानसे दुरितविनाशरूप शुद्धि ही प्राप्त होती है, परन्तु ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक दुरित क्षयरूप शुद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ज्ञानके उद्देश्यसे नित्यकर्मोंका अनुष्ठान नहीं है, इस अवस्थामें अनेक जन्मोंसे जिसने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान किया है, उसको भी नियमतः ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि कदाचित् दैवयोगसे ज्ञानप्रतिबन्धक दुरितसमूहका सम्पूर्ण क्षय होनेपर भी ज्ञान कदाचित् होता है, इस प्रकार अनियत ज्ञानोत्पत्ति होगी।