भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मपि अक्लृप्तमेव ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितनिर्वहणत्वम्, ज्ञानसाधनविशिष्टगुरुलाभश्रवणमननादिसम्पादकापूर्वं च द्वारं कल्पनीयमित्यक्लृप्तोपकारकल्पनाऽविशेषाच्च सामान्यश्रुत्यापादितो नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो भञ्जनीय इति ॥ २ ॥

ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र त्रैवर्णिकानिदर्शनम् ।
वार्त्तिकोक्तेस्तथोद्देश्यगतत्वेनाऽविवक्षणात् ॥ ७ ॥

'विविदिषन्ति ब्राह्मणाः' इस श्रुतिमें ब्राह्मणग्रहण त्रैवर्णिकका उपलक्षण है, क्योंकि इस अर्थका पोषक वार्त्तिककारका वचन है और ब्राह्मणपदकी उद्देश्यविशेषणतया भी विवक्षा नहीं है ॥ ७ ॥


नहीं है, क्योंकि * नित्य कर्मोंमें ज्ञानोपकारकत्वनियमके असिद्ध होनेपर नित्यकर्मोंमें भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें अक्लृप्त ही प्रतिबन्धक दुरितके विनाशकारणतारूप और † ज्ञानके प्रति साधनभूत श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुका लाभ, श्रवण, मनन आदिको प्राप्त करानेवाले अदृष्टरूप द्वारकी कल्पना करनी होगी, इसलिए अक्लृप्त कल्पनाके सामान्य होनेसे 'यज्ञेन' इस सामान्यश्रुतिसे प्राप्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विनियोगको नहीं हटाना चाहिए ॥२॥


* 'ज्ञानमें अपेक्षित उपकार नित्योंमें क्लृप्त है' यह मत प्रमाणशून्य है, ऐसा मानकर काम्योंके समान नित्यमें भी अक्लृप्त उपकारकी कल्पना समान है, इस अभिप्रायसे दूषित करते हैं, यह भाव है ।

† यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि नित्यकर्मोंके विनियोग पक्षमें ही विधिका लाघव है, क्योंकि पक्षमें उनकी ज्ञानप्रतिबन्धकपापविनाशकी जनकता अन्य वचनसे प्राप्त होनेके कारण केवल नियम विधिसे लभ्य है, और काम्यकर्मोंकी ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितविनाशकारणता किसीसे प्राप्त नहीं है, अतः ज्ञानमें काम्य कर्मोंके विनियोग पक्षमें विधिका गौरव अपरिहार्य है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है,—क्योंकि इस परिस्थितिमें भी यज्ञ आदि श्रुतियोंके सङ्कोचरूप बाधके परिहारके लिए काम्य कर्मोंका भी विनियोग अवश्य है, इसीमें तात्पर्य है । यद्यपि नित्यकर्मोंसे ज्ञान-प्रतिबन्धक दुरित-विनाशरूप विशेषशुद्धिका लाभ होनेपर भी उतने मात्रसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती है। क्योंकि प्रमाणप्रमेयासम्भावना आदि प्रत्यक्ष प्रतिबन्धक हैं, तथापि उन प्रतिबन्धकोंके निरासके लिए नित्योंमें उक्त गुरु तथा उनसे श्रवण आदिके सम्पादक अक्लृप्त अदृष्टकारणताकी विविदिषावाक्यके बलसे कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ।

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