भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३१

नन्वेवमपि कथम्— ‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।’ इत्यादिस्मरणनिर्वाहः ? न च तस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानपरत्वम्, विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणेन ब्राह्मणानामेव विद्यार्थकर्मण्यधिकारप्रतीतेः । अतो जनकाद्यनुष्ठितकर्मणां साक्षादेव मुक्त्युपयोगो वक्तव्यः, मैवम्; विविदिषावाक्ये ब्राह्मणग्रहणस्य त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वात् ।

अब शङ्का होती है कि यद्यपि ‘तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने’ इत्यादि ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतिका विविदिषावाक्यके साथ विरोध न हो, इसलिए ‘ज्ञान साक्षात् मुक्तिका साधन है और कर्म विद्याकी प्राप्ति द्वारा मुक्तिमें साधन है, इस प्रकार क्रमसमुच्चयसे निरूपण किया गया, तो भी

‘कर्मणैव’ ( जनक प्रभृति महानुभावोंने कर्मोंके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की ) इत्यादि स्मृतिकी उपपत्ति कैसे हो सकती है, [ क्योंकि इसमें ‘कर्मणैव’ ( कर्मसे ही ) इस अवधारणसे मुक्तिके प्रति कर्मातिरिक्त साधनताका खण्डन किया गया है, इसलिए साक्षात् मुक्तिके प्रति ही कर्मोंका उपयोग प्रतीत होता है ] । यदि शङ्का हो कि ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका तात्पर्य विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ‘ब्राह्मणाः विविदिषन्ति’ इत्यादि विविदिषाश्रुतिमें ‘ब्राह्मण’ शब्दके कथनसे यही प्रतीत होता है—ब्राह्मणोंका ही विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें अधिकार है । इसलिए * जनक आदि द्वारा अनुष्ठित कर्मोंका साक्षात् ही मुक्तिमें उपयोग है, ऐसा कहना चाहिए ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणका ग्रहण त्रैवर्णिकोंका † उपलक्षण है ।


* अर्थात् ‘विविदिषन्ति’ इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात विद्यासाधन कर्मोंमें त्रैवर्णिक अधिकृत नहीं है, इसलिए, यह अर्थ है।

† जब विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणग्रहण उपलक्षण है, तब विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें जनक आदिका भी अधिकार है, अतः ‘कर्मणैव’ इत्यादि स्मृतिका वचन विद्याप्रयोजक कर्मके अनुष्ठानमें ही पर्यवसित है, इसलिए उक्त वचनसे ‘तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ ( आत्मसाक्षात्कारसे ही मृत्युका—संसारका—अतिक्रमण कर सकते हैं, उससे अन्य संसारके अतिक्रमणके लिए मार्ग नहीं है ) इस श्रुतिसे विरुद्ध साक्षात् कर्मोंमें मुक्तिसाधनता बोधित नहीं होती है, यह भाव है।