सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें४३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद
यथाऽऽहुरत्रभवन्तो वार्तिककाराः—
‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र द्विजानामुपलक्षणम् ।
अविशिष्टाधिकारित्वात् सर्वेषामात्मबोधने ॥’ इति ।
नहि ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेद्’ इति विपरिणमिते विद्याकामाधिकारविधौ ब्राह्मणपदस्याऽधिकारिविशेषसमर्पकत्वं युज्यते; उद्देश्ये विशेषणायोगात् ।
इस विषयमें पूजनीय वार्त्तिककार कहते हैं—
‘ब्राह्मणग्रहणं चाऽत्र०’ ( विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण-ग्रहण द्विजोंका अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका उपलक्षण है, क्योंकि आत्मज्ञानके साधनभूत कर्मोंमें ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यका अधिकार सामान्यरूपसे सुना गया है ※) ।
और ‘विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेत्’ ( विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदिका अनुष्ठान करे ) इस प्रकार † विपरिणत विद्याकामकी अधिकार ‡ विधिमें ब्राह्मण पद अधिकारीका समर्थक ( बोधक ) है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, कारण कि विद्याकामरूप उद्देश्यमें विशेषणका सम्बन्ध नहीं हो सकता है ।
※ इस वार्त्तिकको सुरेश्वराचार्य विरचित वार्त्तिकके १८८९ पृष्ठमें चतुर्थ अध्याय चतुर्थ ब्राह्मणमें देखना चाहिए ।
† क्योंकि विद्याप्रयोजक कर्मोंका ही अधिकार प्रकृत है, यह भाव है, यदि इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दमें त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वके सिद्ध होनेपर तीनों वर्णोंका सामान्यरूपसे विद्याप्रयोजक कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होगा और तीनों वर्णोंका सामान्यतः कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होनेपर उसके अनुरोधसे ब्राह्मणग्रहणको उपलक्षण मान सकते हैं, इसलिए अन्योऽन्याश्रय होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणपदमें सामान्यतः द्विजोपलक्षणताका अनाश्रय करके ही सभी द्विजोंका विद्यार्थकर्मोंमें अधिकार वार्त्तिक वचनमें कहा गया है ।
‡ तात्पर्य यह है कि किसीको यदि शङ्का हो—विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण शब्दके ग्रहणसे ब्राह्मणका ही विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रतीयमान होता है, तो फिर वर्णत्रयसाधारण अधिकारकी सिद्धि कैसे होती है ? तो इसपर कहना चाहिए कि क्या ब्राह्मणशब्द यज्ञ आदि विधिके उद्देश्यमें विशेषणके समर्पकरूपसे ब्राह्मणमात्रकी अधिकारिताका बोधक है, अथवा विधेयभूत कर्त्ताके समर्पकरूपसे अथवा इन दोनोंके समर्थक न होते हुए भी अन्य गति न होनेसे अपनी केवल सन्निधिमात्रसे ब्राह्मणमात्रके अधिकारका बोधक है ? इस प्रकार तीन विकल्पोंमें प्रथम