भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार ] भाषानुवादसहित ४३३


नापि 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इति स्वाराज्यकामा- धिकारे राजसूयविधौ 'स्वाराज्यकामो राजकर्तृकेण राजसूयेन यजेत' इति कर्तृतया यागविशेषणत्वेन विधेयस्य राज्ञो राजकर्तृकराजसूयस्याऽराज्ञा सम्पादयितुमशक्यत्वाद् अर्थादधिकारिकोटिनिवेशवद्, इह यज्ञादिकर्तृतया विधेयस्य ब्राह्मणस्याऽर्थादधिकारिकोटिनिवेश इति युज्यते । 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गाद्' इति सूत्रे (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३४)

यदि शङ्का हो कि जैसे 'राजा स्वाराज्यकामो०' (स्वाराज्यको चाहनेवाला राजा राजसूयनामक यज्ञ करे) स्वाराज्य चाहनेवालेकी अधिकार- बोधिका* इस राजसूयविधिमें 'स्वाराज्यके अभिलाषी राजा द्वारा किये जानेवाले राजसूय यज्ञसे अपना अभीष्ट सम्पादन करे' इस प्रकार कर्तृत्वरूपसे यागके विशेषण विधेयभूत राजाका—केवल राजासे किये जानेवाले राजसूयका राजासे इतर अनुष्ठान नहीं कर सकता है, इससे अर्थतः—अधिकारी कोटिमें विशेषणरूपसे निवेश होता है, वैसे ही प्रकृतमें 'विद्याका अभिलाषी पुरुष ब्राह्मणकर्तृक याग आदिका अनुष्ठान करे, इस प्रकार विधेयभूत ब्राह्मणका अर्थतः अधिकारी कोटिमें निवेश होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिङ्गात्'† इस ब्रह्मसूत्रमें इस प्रकारकी व्यवस्था


विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। विद्यामें यज्ञ आदिका विनियोगबोधक विधिमें विद्याभिलाषीका अधिकार सिद्ध ही है, इसलिए ब्राह्मण्यविशिष्ट विद्याकामका अधिकार विवक्षित है, ऐसा स्वीकार कर ब्राह्मणपदमें विशेष अधिकारिसमर्पकताका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि विधेयभूत यज्ञ आदिकी उद्देश्यत्ता केवल विद्याभिलाषीमें ही प्रतीत होती है, अतः ब्राह्मण्यरूप विशेषणकी आकाङ्क्षा नहीं है, इसलिए अनाकाङ्क्षितका विद्याकामके प्रति विशेषण रूपसे अन्वय नहीं हो सकता है। यदि विशिष्टको उद्देश्य मानें, तो गौरव होगा, विद्याकाम और ब्राह्मण्य प्रत्येकको उद्देश्य मानें, तो वाक्यभेद प्रसक्त होगा अर्थात् विद्याका अभिलाषी यज्ञ आदि करे' और 'ब्राह्मण यज्ञ आदि करे' इस प्रकार वाक्यभेद होगा, यह भाव है।

* उक्त तीन विकल्पोंमें से द्वितीय विकल्पका इस ग्रन्थसे शङ्कापूर्वक परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाराज्यकाम वाक्यमें स्वाराज्याभिलाषीके प्रति राजपदका पूर्वोक्त रीतिसे विशेषणत्वरूपसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए कर्तृविधायकताका अङ्गीकार करके यदि स्वाराज्यकामी राजा हो, तो राजसूय यज्ञ करे, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। इससे अर्थात् जैसे राजाका अधिकारी कोटिमें प्रवेश हुआ है वैसे ही ब्राह्मण्यका अधिकारीकी कुक्षिमें प्रवेश क्यों नहीं, यह शङ्काका भाव है।

† 'सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात्' इस सूत्रका अर्थ यों है—सर्वथा अपि—यज्ञ आदिके

५५