सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद
'अन्यत्र विहितानामेव यज्ञादीनां विविदिषावाक्ये फलविशेषसम्बन्धविधिः, नापूर्वयज्ञादिविधिः' इति व्यवस्थापितत्वेन प्राप्तयज्ञाद्यनुवादेन एकस्मिन् वाक्ये 'कर्तृरूपगुणविधिः, फलसम्बन्धविधिश्च' इत्युभयविधानाद्वाक्यभेदापत्तेः ।
नापि राजसूयवाक्ये राज्ञः कर्तृतया विधेयत्वाभावपक्षे राजपदसमभिव्याहारमात्राद्विशिष्टकर्तृत्वलाभद्वद् इह वाक्यभेदाय कर्तृतया ब्राह्मणविधानेऽपि ब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रेण ब्राह्मणकर्तृत्वलाभात् तदधि-
की गई है कि 'कर्मकाण्डमें विहित यज्ञ आदिको उद्देश्य करके ही विविदिषावाक्यमें फलविशेषके सम्बन्धकी विधि है, अपूर्व यज्ञ आदिकी विधि नहीं है, और यदि पूर्वसे प्राप्त यज्ञ आदिका अनुवाद कर एक वाक्यमें कर्तृरूप गुण और फलसम्बन्ध इन दोनोंकी विधि मानें, तो वाक्यभेदकी आपत्ति होगी* ।
† यदि शङ्का हो कि जैसे राजसूयवाक्यमें कर्तृरूपसे राजामें विधेयत्वके अभाव पक्षमें ‡ राजपद्के सान्निध्यमात्रसे विशिष्ट कर्तृताका लाभ होता है, वैसे ही प्रकृतमें वाक्यभेदके परिहारके लिए कर्तृरूपसे ब्राह्मणका विधान न होनेपर भी ब्राह्मणपदके समभिव्याहारमात्रसे (सान्निध्यमात्रसे) ब्राह्मणकी कर्तृताका
आश्रमकर्मत्वपक्षमें या उनके विद्यासहकारित्वपक्षमें एवं—'यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्' इत्यादि वाक्योंमें जो अग्निहोत्र आदि धर्म हैं, वे ही विहित हैं, क्योंकि 'उभयलिङ्गात्' अर्थात् श्रुति और स्मृति—दोनों प्रमाण हैं, श्रुतिसे 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति लेनी चाहिए और स्मृतिसे 'अनाश्रितः कर्मफलम्' (कर्मफलकी अभिलाषा न करके जो यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है, उसे विद्या-प्राप्ति होती है) इत्यादिका ग्रहण करना चाहिए ।
* राजसूयवाक्यमें कर्त्रादिगुणविशिष्ट अपूर्व कर्मकी ही विधि मानी गई है, अतः वाक्यभेद प्रसक्त नहीं है, अतः उसमें राजशब्दकी कर्तृरूप गुणविधायकता युक्त है, यह भाव है ।
† पूर्वोक्त तीन विकल्पोंमें से तृतीय विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं। कर्तृत्वरूपसे राजामें विधेयताके न होनेपर भी राजाका ही राजसूय यज्ञमें अधिकार सिद्ध होता है, क्योंकि राजशब्दकी सन्निधिसे स्वाराज्यकामशब्द क्षत्रियपरक है, ऐसा स्वभावतः ज्ञात हो सकता है, अन्यथा राजपद व्यर्थ होगा, इस अभिप्रायसे जिनके मतमें राजाकी कर्तृत्वरूपसे विधि नहीं मानी जाती है, उनके मतमें, यह अर्थ है ।
‡ क्योंकि विद्याके हेतु यज्ञ आदिमें जैसे शूद्रका निषेध है, वैसे क्षत्रिय और वैश्यका निषेध नहीं है, अतः ब्राह्मणके समान उनका भी अधिकार है, यह भाव है ।