सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यार्थ कर्मोंमें शूद्रका अनधिकार] भाषानुवादसहित ४३५
कारपर्यवसानमित्युपपद्यते । अन्यत्र त्रैवर्णिकाधिकारिकत्वेन क्लृप्तानामिहापि त्रैवर्णिकाधिकारात्मविद्यार्थत्वेन विधीयमानानां यज्ञादीनां त्रैवर्णिकाधिकारित्वस्य युक्ततया विधिसंसर्गहीनब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रादधिकारसंकोचासम्भवेन ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वौचित्यात् ॥ ३ ॥
वैदिकत्वात्तु विद्यायाः शूद्रस्यानधिकारिता ।
विद्याके वैदिक होनेसे—वेदगम्य होनेसे—उसमें शूद्रका अधिकार नहीं है ।
ननु विद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वे शूद्रस्यापि विद्यायामर्थित्वादि-
लाभ होता है अतः ब्राह्मणका† ही अधिकार फलतः सिद्ध.होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिन यज्ञोंमें तीनों वर्णोंका अधिकार कर्मकाण्डमें निश्चित किया गया है, वे ही यज्ञ प्रकृत विविदिषा वाक्यमें आत्मज्ञानके, जिनमें कि तीनों वर्ण अधिकृत हैं, उत्पादन के लिए—विधीयमान हैं, अतः उनमें तीनों वर्णोंका अधिकार युक्तियुक्त होनेसे विधिसंसर्गसे* हीन ब्राह्मणपदकी सन्निधिसे अधिकारका सङ्कोच नहीं हो सकता है, अतः 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' इस श्रुतिमें ब्राह्मणशब्द यथाप्राप्त सामान्य विद्याधिकारीका उपलक्षण है, यही मानना उचित है ॥ ३ ॥
† अब शङ्का होती है कि यदि विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्दको विद्याधिकारीमात्रका उपलक्षण माना जाय, तो शूद्र भी विद्यामें अभिलाषा आदि कर सकता है, अतः वह भी विद्याके उपयुक्त कर्मोंमें अधिकृत होगा ?
* विधिसंसर्गहीन अर्थात् उद्देश्यके समर्पण द्वारा अथवा विधेयके समर्पण द्वारा विधि-वाक्यार्थके अन्वयबोधमें ब्राह्मणशब्द अनुपयोगी है, राजसूय यज्ञका अन्यत्र विधान न होनेसे वर्णत्रयाधिकारता उसमें क्लृप्त नहीं है, अतः विधिसंसर्गहीन राजपदके समभिव्याहारसे राजसूयवाक्यमें राजकर्तृताका नियम है। यदि शङ्का हो कि उक्त प्रकारसे विद्यार्थ कर्मोंमें क्षत्रिय और वैश्यके समान ब्राह्मणका भी अधिकार सिद्ध ही है, तो ब्राह्मण ग्रहण व्यर्थ है, तो युक्त नहीं है, क्योंकि विद्यार्थ कर्मोंमें ब्राह्मणका मुख्य अधिकार है, ऐसा सूचित करनेके लिए ब्राह्मणका ग्रहण है, यह भाव है ।
† शङ्काका तात्पर्य यह है कि विद्या तो विधेय नहीं है, अतः उसमें अधिकार विद्यार्थित्वरूप ही होगा, और यह अर्थित्वरूप अधिकार शूद्रको भी हो सकता है, इसलिए क्षत्रिय आदिके समान शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार निवृत्त नहीं कर सकते हैं ।