सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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सम्भवनेन तस्यापि विद्यार्थकर्माधिकारप्रसङ्ग इति चेद्, न; ‘अध्ययन-गृहीतस्वाध्यायजन्यतदर्थज्ञानवत एव वैदिकेष्वधिकारः’ इत्यपशूद्राधिकरणे (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० ३४) अध्ययनवेदवाक्यश्रवणादिविधुरस्य शूद्रस्य विद्याधिकारनिषेधात् । ‘न शूद्राय मतिं दद्याद्’ इति स्मृतेरपाततोऽपि तस्य विद्यामहिम्नावगत्युपायासम्भवेन तदर्थित्वानुपपत्तेश्च तस्य विद्यायामनधिकारादिति केचित् ।
केचित् पौराणिके ज्ञाने तस्याप्याहुरधिक्रियाम् ॥ ८ ॥
कोई लोग पौराणिक ज्ञानमें शूद्रका भी अधिकार मानते हैं ॥ ८ ॥
अन्ये त्वाहुः—शूद्रस्याप्यस्त्येव विद्यार्थकर्माधिकारः, तस्य वेदानु-
तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विधिवत् अध्ययनसे [ वेदसे ] उत्पन्न होनेवाले ज्ञानसे युक्त पुरुषको ही वैदिक कर्मोंमें अधिकार है, अन्यका नहीं, इस प्रकार अध्ययनसे प्राप्त वेदवाक्योंके श्रवणसे रहित शूद्रका अपशूद्राधिकरणमें † ॰ विद्यामें अधिकारनिषेध किया गया है और ‘न शूद्राय मतिं दद्यात्’ (शूद्रको शास्त्रार्थ ज्ञान नहीं देना चाहिए) इस प्रकार की स्मृतिसे साधारणरूपसे भी विद्याकी महिमासे अर्थात् विद्यारूप ब्रह्मप्राप्तिके साधनसे ज्ञानसाधनका असम्भव होनेसे शूद्रमें विद्यार्थिता ही नहीं हो सकती है, अतः शूद्रका विद्यामें अधिकार है ही नहीं, ऐसा कुछ लोग कहते हैं ।
※अन्य कुछ लोग कहते हैं कि शूद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोंमें अधिकार है । यद्यपि शूद्रका वेदाध्ययन और अग्निहोत्र आदिमें अधिकार नहीं
- • 'शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि' इस सूत्रसे आरब्ध अधिकरण अपशूद्राधिकरण कहलाता है, इसमें निर्णय किया गया है कि शूद्रका श्रुतिप्रतिपादित सगुण विद्यामें और निर्गुण ब्रह्मविद्याके साधन यज्ञ आदिमें अधिकार नहीं है, क्योंकि उसने वेदाध्ययन नहीं किया है। और वेदार्थानुष्ठानमें अध्ययनविधिसे सम्पादित वेदजन्य ज्ञान अपेक्षित है, अतः सगुण और निर्गुण ब्रह्मविद्यामें शूद्रका अधिकार है ही नहीं, इसीलिए तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः (तै—सं) 'शूद्रो विद्यायामनवक्लृप्तः' ये उक्तार्थमें प्रमाणभूत भी हैं।
- † 'शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रसक्त होगा' इसे इष्टापत्ति मानकर उक्त आक्षेपका समाधान करते हैं।