सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यार्थ कर्मामें शूद्रका अनधिकार ] भाषानुवादसहित ४३७
वचनाग्निहोत्राद्यसम्भवेऽपि कण्ठोक्तसर्ववर्णाधिकारश्रीपञ्चाक्षरमन्त्रराजविद्या-दिजपपापक्षयहेतुतपोदानपाकयज्ञादिसम्भवाद्; 'वेदानुवचनेन यज्ञेन दानेन' इत्यादिपृथक्कारकविभक्तिश्रुतेः विधुरादीनां विद्यार्थजपदानादिमात्रानुष्ठाना-नुमतेश्च वेदानुवचनादिसमुच्चयानपेक्षणात् । न च शूद्रस्य विद्याया-मर्थित्वासम्भवः ।
है, तथापि † जिनमें सब वर्णोंके अधिकारका प्रतिपादन किया गया है, ऐसे श्रीपञ्चाक्षररूप मन्त्राधिराज विद्या आदिका जप, पापक्षयके हेतुभूत-तप, दान, पाकयज्ञ आदिमें अधिकार है और 'वेदानुवचनेन' ( वेदाध्ययनसे ), 'यज्ञेन' ( यज्ञसे ) 'दानेन' ( दानसे ) इत्यादि अलग अलग कारकविभक्तिका श्रवण होनेसे विधुर आदिको विद्यार्थ जप, दान आदिके अनुष्ठानकी अनुमति होनेसे वेदानुवचन आदिके ‡ समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है। और शूद्रकी विद्यामें अर्थिता ( अधिकारिता ) नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि
† किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः ।
यस्यो नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः ॥
मन्त्राधिराजराजो यस्तार्यवेदान्तशेखरः ।
सर्वज्ञाननिधानश्च सोऽयं शैवषडक्षरः ॥
प्रणवेन विना मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः ।
स्त्रीभिशूद्रैश्च सङ्कीर्णैर्ध्यायते मुक्तिकांक्षिभिः ॥ ( ब्रह्मोत्तर खण्ड )
अर्थात् इन प्रमाणोंसे यह प्रतीत होता है कि जिसके हृदयमें ॐ नमः शिवाय यह मन्त्र है, उसको अनेक मन्त्रोंसे, अनेक तीर्थोंसे एवं अनेक प्रकारके तप और यज्ञोंसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है। यह सब मन्त्रोंका अधिराज है, सब वेदान्तोंका मूर्धन्य है, सब ज्ञानोंका खजाना है। और यह 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र यदि प्रणव ( ॐ कार ) से रहित हो, तो इसे पञ्चाक्षर कहते हैं, इसी पञ्चाक्षर मन्त्रको मुक्तिके अभिलाषी स्त्री, शूद्र आदि तथा सङ्कीर्ण जातिके लोग मुक्तिके लिए भजते हैं ।
‡ 'वेदानुवचनेन विविदिषन्ति' 'यज्ञेन विविदिषन्ति' इत्यादि रूपसे प्रत्येकमें साधनताकी प्रतीति होनेसे समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है, यदि समुच्चयकी विवक्षा होती, तो 'वेदानुवचनयज्ञदान-तपोभिर्विविदिषन्ति' ऐसा वाक्य होता और पृथक् कारकविभक्तिके श्रवणमें भी वेदानुवचनेन च, यज्ञेन च, इत्यादि चकारघटित वाक्य होता, अतः समुच्चयकी विवक्षा नहीं है, यह भाव है ।