भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 590 में से

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४३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद ]


'श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः' ।

इतीतिहासपुराणश्रवणे चातुर्वर्ण्याधिकारस्मरणेन पुराणाद्यवगतविद्यामाहात्म्यस्य तस्यापि तदर्थित्वसम्भवात् । 'न शूद्राय मतिं दद्याद्' इति स्मृतेश्च तदनुष्ठानानुपयोग्निहोत्रादिकर्मज्ञानदाननिषेधपरत्वात् । अन्यथा तस्य स्ववर्णधर्मस्याप्यवगत्युपायासम्भवेन 'शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिस्तस्यापि सत्यमक्रोधश्शौचमाचमनार्थे पाणिपादक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म भृत्यभरणं स्वदारतुष्टिः परिचर्या चोत्तरेषाम्' इत्यादितद्धर्मविभाजक-


'श्रावयेत्०' (ब्राह्मण चार वर्णोंको पुराण आदि सुनावे, यदि क्षत्रिय आदिको पुराण आदि सुनाना हो तो ब्राह्मणको आगे करे) इस प्रकार स्मृति, पुराण और इतिहासके श्रवणमें चारों वर्णोंका अधिकार प्रतिपादित होनेसे जिस शूद्रने पुराण आदिसे विद्याका माहात्म्य जाना है, ऐसे शूद्रको भी विद्याकी अधिकारिता प्राप्त हो सकती है। 'न शूद्राय' इस प्रकारकी पूर्वोक्त स्मृति शूद्रके अनुष्ठानके अनुपयोगी अग्निहोत्रादि कर्म, ज्ञान और दानका निषेध करनेवाली है। यदि सम्पूर्ण शास्त्रविषयक ज्ञानके निषेधमें ही 'न शूद्राय' इत्यादि वचनका तात्पर्य माना जाय, तो उसको अपने वर्णधर्मके ज्ञानका साधन भी नहीं रहेगा, इससे 'शूद्रश्चतुर्थो वर्णः०' * अर्थात् शूद्र चौथा वर्ण है, उसका एक ही जन्म है (क्योंकि उपनयनरूप द्वितीय जन्म उसका नहीं है) उसका भी सत्य, अक्रोध, शुद्धता किसीके मतसे आचमनकी जगहमें हाथ और पैरका प्रक्षालनमात्र, श्राद्धकर्म, भृत्य, स्त्री आदिका पोषण, अपनी समानजातीय भार्यासे निर्वाह और ऊपरके ब्राह्मण आदि तीन वर्णोंकी


* गौतम धर्मसूत्रके दशम अध्यायमें ४९ वें सूत्रसे इस शूद्रधर्मका विभाग किया गया है, तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'न शूद्राय मतिं दद्यात्' इत्यादि शास्त्रसे शूद्रोंको शास्त्रार्थज्ञानका दान निषिद्ध भासता है, तथापि

वृद्धौ च मातापितरौ भार्या साध्वी सुतः शिशुः ।
अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत् ॥

इत्यादि वचनके अनुसार जो ब्राह्मण अपने माता, पिता, सती स्त्री, और पुत्र आदिका पोषण करनेके लिए शूद्रोंके प्रति पुराण आदिके पठनमें प्रवृत्त होते हैं उनसे शूद्रोंको अपना कर्तव्य और विद्यामाहात्म्य अवश्य ज्ञात हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं हैं, यह भाव है।

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