भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 590 में से

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पृष्ठ 469

विद्यार्थ कर्मोंमें शूद्रका अनधिकार] भाषानुवादसहित ४३९


वचनानामननुष्ठानलक्षणाप्रामाण्यापत्तेः । न चैवं सत्यपशूद्राधिकरणस्य निर्विषयत्वम् । तस्य— 'न शूद्रे पातकं किंचित् न च संस्कारमर्हति ।' इत्यादिस्मृतेर्गुरूपसदनाख्यविद्याङ्गोपनयनसंस्कारविधुरस्य शूद्रस्य सगुणविद्यासु निर्गुणविद्यासाधनवेदान्तश्रवणादिषु चाधिकारनिषेधपरत्वाद् निर्गुणविद्यायां शूद्रस्यापि विषयसौन्दर्यप्रयुक्तार्थित्वस्य निषेद्धुमशक्य-

सेवा ) इत्यादि शूद्रधर्मोंके विभाजक वचनोंका अननुष्ठानात्मक अप्रामाण्य प्रसक्त होगा । यदि शङ्का हो कि उक्त प्रकारसे यदि शूद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोंमें अधिकार माना जाय, तो अपशूद्राधिकरण निर्विषयक अर्थात् व्यर्थ-सा होगा ? तो यह भी युक्त नहीं † है, क्योंकि उस अधिकरणका— 'न शूद्रे पातकं किञ्चित्०' (शूद्रको अभक्ष्यभक्षण आदिसे कोई पाप नहीं होता है और अध्ययनाङ्ग उपनयनात्मक संस्कार अथवा विद्याङ्ग उपगमना- त्मक संस्कार भी उसके नहीं होते हैं) इत्यादि स्मृतिसे गुरूपसदनात्मक* विद्याके प्रति अङ्गभूत उपनयनरूप संस्कारसे रहित शूद्रका सगुण विद्यामें और निर्गुण विद्याके साधन वेदान्तके श्रवण आदिमें—अधिकारके निषेधमें ही तात्पर्य है, इससे निर्गुण विद्यामें विषयकी सुन्दरतासे होनेवाली शूद्रकी अर्थिताका निषेध नहीं कर सकते हैं । निर्गुण विद्याके विधेय† न होनेसे उससे भिन्न अधिकारिताकी प्रसक्ति नहीं है, अतः निर्गुण विद्यामें विषयसौन्दर्यप्रयुक्त अर्थित्वका निषेध


† अपशूद्राधिकरणमें शूद्रका विद्यामें अनधिकार बतलाया गया है, विद्यामें उपयुक्त कर्मोंमें शूद्रका अधिकार नहीं है, यह बतलानेके लिए नहीं है, किन्तु वेदान्तके श्रवण आदिमें शूद्रका अधिकार नहीं है, इस प्रकार प्रतिपादन करता है, इस अभिप्रायसे 'तस्य न शूद्रे' इत्यादि ग्रन्थसे परिहार करते हैं ।

* शिष्यरूपसे अङ्गीकार करके अपने समीपमें स्थापनरूप विद्याङ्ग उपनयन आचार्य करता है, इस उपनयनको गुरूपसदन इसलिए कहते हैं कि वह शिष्यकर्तृक गुरूपसदनपूर्वक है, 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' (ब्रह्मको जाननेके लिए गुरुजीके पास जाना चाहिए।) इस श्रुतिसे विद्याङ्गरूपसे गुरूपसदनका विधान है 'तं होपनिन्ये' (उसका उपनयन किया) इस श्रुतिसे विद्याङ्ग उपनयन भी प्रतीत होता है ।

† स्वर्गानुभवके समान ब्रह्मानन्दरूप निर्गुण विद्याके फलरूप होनेसे उसमें विधेयता नहीं है, क्योंकि जो फल होता है, वह विधेय नहीं होता, इसलिए जैसे स्वर्गानुभव आदि फलमें स्वर्गार्थितामात्र अधिकार है, वैसे निर्गुण विद्यामें भी निर्गुणविद्यार्थितारूप ही अधिकार है,