सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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त्वात्। अविधेयायां च तस्यां तदतिरिक्ताधिकाराप्रसक्त्या तन्निषेधायोगाच्च। न च तस्य वेदान्तश्रवणासम्भवे विद्यार्थकर्मानुष्ठानसम्भवेऽपि विद्यानुत्पत्तेस्तस्य तदर्थकर्मानुष्ठानं व्यर्थमिति वाच्यम्, तस्य वेदान्तश्रवणाधिकाराभावेऽपि भगवत्पादैः-‘श्रावयेच्चतुरो वर्णान्’ इति चेतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्याधिकारस्मरणाद् वेदपूर्वस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणामिति स्थितम्’ इति अपशूद्राधिकरणोपसंहारभाष्ये ब्रह्मात्मैक्यपरपुराणादिश्रवणे विद्यासाधनेऽधिकारस्य दर्शितत्वाद्। विद्योत्पत्तियोग्य-
नहीं कर सकते हैं। यदि शङ्का हो कि शूद्रका वेदान्तके श्रवणमें अपशूद्राधिकरणन्यायसे अधिकार न होनेके कारण विद्यार्थ जपादि कर्मोंका अनुष्ठान करनेपर भी विद्याकी उत्पत्ति नहीं होगी, इसलिए विद्याके लिए किया गया कर्म निरर्थक ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वेदान्त श्रवणमें शूद्रका अधिकार नहीं है, तथापि ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इस प्रकार इतिहास और पुराणके ज्ञानमें चारों वर्णोंके अधिकारप्रतिपादक स्मृतिवचन होनेसे शूद्रोंका वेदपूर्वक ही अधिकार नहीं है, यह बात ज्ञात होती है, इस प्रकारके अपशूद्राधिकरणके उपसंहारभाष्यमें भगवान् श्रीशङ्कराचार्यने जीव-ब्रह्मके ऐक्यबोधक पुराण आदिके श्रवणमें, जो कि ब्रह्मज्ञानका साधन है, अधिकार बतलाया है। विद्याकी उत्पत्तिमें योग्य‡ शुद्ध दिव्य शरीरके
उसका निषेध नहीं कर सकते हैं, क्योंकि विधेयभूत उपासना आदिमें अन्य अधिकारि विशेषणकी अपेक्षा होती है, इसलिए दृष्टान्त विषम है, यह भाव है।
‡ यद्यपि ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इस वचनसे शूद्रको पुराण आदिके श्रवणमें आज्ञा मिलती है, तथापि, मनन आदिमें आज्ञाके न होनेसे मनन आदिका अनुष्ठान नहीं हो सकता है, यदि शङ्का हो कि मनन आदि तो श्रवणके अङ्ग ही हैं, अतः उनका अङ्गीके अभ्यनुज्ञानसे ही अभ्यनुज्ञान होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रयाज और दर्शपूर्णमासके समान प्रकृतमें अङ्गाङ्गिभाववोधक प्रमाणके न रहनेसे श्रवण, मनन आदिमें परस्पर अङ्गाङ्गिभावव्यवहार केवल औपचारिक ही प्रतीत होता है, इसलिए शूद्रका अद्वैतवेदान्तश्रवणमें अधिकारके न रहनेपर भी उससे विद्याकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण विद्यार्थ कर्मोंके अनुष्ठानका नैरर्थक्य ज्यों का त्यों है, इस अस्वरससे इस ग्रन्थका उपक्रम है। अथवा ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्’ (इतिहास और पुराणोंसे वेदका उपबृंहण करे अर्थात् मीमांसानुसारी इतिहास और पुराणोंके वचनानुसार यथार्थ निर्णीतार्थमें वेदका स्थापन करे) इत्यादि वचनोंसे इतिहास आदिका ब्रह्मात्मैक्यवोधकभाग वेदान्तश्रवणजनित वेदान्तार्थ ज्ञानका उपकारकमात्र प्रतीत होता है, वेदान्तश्रवणकी उपेक्षा करके स्वतन्त्ररूपसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञानजनक प्रतीत नहीं होता है, इसीसे