सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण] भाषानुवादसहित ४४१
विमलदेवशरीरनिष्पादनद्वारा मुक्त्यर्थत्वं भविष्यतीति त्रैवर्णिकानां क्रममुक्तिफलकसगुणविद्यार्थकर्मानुष्ठानवद् वेदान्तश्रवणयोग्यत्रैवर्णिकशरीरनिष्पादनद्वारा विद्योत्पत्त्यर्थत्वं भविष्यतीति शूद्रस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानाविरोधाच्च। तस्मात् विविदिषावाक्ये ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रविषयत्वेन शूद्रस्याऽपि विद्यार्थकर्माधिकारः सिध्यत्येवेति ॥ ४ ॥
संन्यासस्याऽत्र किन्द्वारेणोपयोगः—
विद्यामें संन्यासका किस द्वारा उपयोग है ?
नन्वस्तु कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा विद्योपयोगः, सन्न्यासस्य किंद्वारा तदुपयोगः ? ।
उत्पादन द्वारा सगुण ब्रह्मकी उपासना भी मुक्तिके लिए होगी, इस प्रकारके निश्चयसे तीनों वर्णोंका सगुण विद्याके लिए जिसका क्रमिक मुक्ति ही फल है, कर्मानुष्ठान जैसे होता है, वैसे ही वेदान्तश्रवणके लिए योग्य त्रैवर्णिक शरीरके निष्पादन द्वारा हमारे द्वारा किये गये धर्म विद्याकी उत्पत्तिमें हेतु होंगे, इस प्रकारके निश्चयसे शूद्रका विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें कोई विरोध नहीं है। इससे विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणशब्द सामान्यतः प्राप्त सम्पूर्ण विद्याधिकारीके लिए ही प्रयुक्त है, इसलिए शूद्रका भी ब्रह्मज्ञानमें हेतुभूत कर्मोंमें अधिकार सिद्ध ही है ॥ ४ ॥
अब शङ्का होती है कि कर्म चित्तशुद्धिके द्वारा ब्रह्मविद्यामें उपयोगी भले ही हों, परन्तु संन्यासका ब्रह्मविद्यामें किस द्वारा उपयोग है ? [ अर्थात् अदृष्ट
उक्त वचनका पूर्वार्ध—‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति’ सङ्गत होता है। इस पूर्वार्धका यह भाव है—जिस पुरुषने केवल वेदका ही विचार किया है और इतिहास तथा पुराण नहीं देखे हैं, ऐसे पुरुषसे वेद डरता है कि यह अल्पश्रुत पुरुष मुझे मार डालेगा अर्थात् मेरे विचाररूप मीमांसामें न्यायाभासत्वादिशाङ्काये हमारा अन्य अर्थ करेगा। इस अवस्थामें वेदान्तश्रवणसे रहित शूद्र कदाचित् पुराणादि विज्ञान सम्पादन करे, तथापि उससे उसको ज्ञान नहीं हो सकता है। ‘श्रावयेत् चतुरो वर्णान्’ इत्यादि वचन भी शूद्रके अद्वैतपरक पुराण आदिका श्रवण अदृष्टार्थक है इस अभ्यनुज्ञापरक हैं। अपशूद्राधिकरणके भाष्यमें भी शूद्रका अद्वैत प्रतिपादक पुराणादिश्रवणमें अधिकारका वर्णन ‘बिभेत्यल्पश्रुताद्’ इत्यादि वचन नहीं है, यह मान कर ही किया गया है, अतः भाष्यसे विरोध भी नहीं है। इसलिए वेदान्तश्रवणमात्रसे साध्य विद्या श्रवण आदिके अभावमें शूद्रको सिद्ध नहीं हो सकती है, इस अस्वरससे यह ‘विद्योत्पत्तियोग्य’ इत्यादि ग्रन्थ है, यह भाव है।
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