भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 472
४४२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अत्र केचन ।

कर्माविनाश्यदुरितनाशद्वारेति चक्षते ॥ ९ ॥

इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं कि जिस पापका कर्मसे विनाश नहीं होता है, उस पापके विनाश द्वारा संन्यास विद्यामें उपयोगी है ॥ ९ ॥

केचिदाहुः—विद्योत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितानामनन्तत्वात् किञ्चिद् यज्ञाद्यनुष्ठाननिवर्त्यम्, किञ्चित् सन्न्यासापूर्वनिवर्त्यमिति कर्मवच्चित्तशुद्धिद्वारैव सन्न्यासस्याऽपि तदुपयोगः । तथा च गृहस्थादीनां कर्मच्छिद्रेषु श्रवणाद्यनुतिष्ठतां न तस्मिन् जन्मनि विद्यावाप्तिः, किं जन्मान्तरे


द्वारा संन्यास ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है या दृष्टद्वारा ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि विद्याकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापोंकी यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न अदृष्टसे ही निवृत्ति होती है, अतः संन्यास निरर्थक ही है, द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि कोई दृष्ट द्वार देखा ही नहीं जाता है, अतः संन्यासका विद्यामें कोई उपयोग नहीं है, यह आक्षेपकर्ताका अभिप्राय है । ]

ॐ इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—ब्रह्मविद्याके प्रादुर्भावमें प्रतिबन्धक अनेक पाप हैं, अतः उनमें से कई एक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे निवृत्त होते हैं और कई एक संन्यासजनित अपूर्वसे निवृत्त होते हैं, † इसलिए संन्यास भी चित्तकी शुद्धि द्वारा ही ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है । इस परिस्थितिमें गृहस्थ आदि कर्मोंके अवकाश कालमें श्रवण आदिका अनुष्ठान भले ही करें, तथापि उस जन्ममें उनको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं होती है, किन्तु


* अदृष्ट द्वारा संन्यास विद्यामें उपयोगी है, इस मतका इस ग्रन्थसे समर्थन करते हैं ।

† यदि इसमें किसीको शङ्का हो कि संन्यासजन्य अपूर्व विद्याकी उत्पत्तिमें हेतु नहीं है, क्योंकि जिन्होंने संन्यास नहीं लिया है, उनमें से कोई एक विद्याके उद्देश्यसे श्रवण आदिका अनुष्ठान करते हैं, और कई एकको संन्यासके बिना ही विद्या भी हुई है, ऐसा देखा जाता है । इस शङ्काका 'तथा च' इससे परिहार किया जाता है । विद्याके प्रति संन्यासका दृष्ट द्वार नहीं देखा जाता है, अतः संन्यासविधिसे अदृष्ट द्वारा ही विद्याप्राप्तिके प्रति संन्यासकी हेतुता सिद्ध होनेसे, यह अर्थ है । यदि शङ्का हो कि संन्यासका भी चित्तविक्षेपनिवृत्तिरूप दृष्ट द्वार हो सकता है, क्योंकि विक्षिप्तचित्त पुरुषको ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकवैदिक-कर्म करनेवाले पुरुषका भी चित्तविक्षेप प्रायः नहीं देखा जाता है, अतः संन्यास ही चित्तविक्षेपकी निवृत्तिमें कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है ।