सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपणं ] भाषानुवादसहित ४४३
सन्न्यासं लब्ध्वैव। येषां तु गृहस्थानामेव सतां जनकादीनां विद्या विद्यते, तेषां पूर्वजन्मनि सन्न्यासात् विद्याऽवाप्तिः। अतो न विद्यायां सन्न्यासापूर्वव्यभिचारशङ्काऽपीति।
अन्ये त्वदृष्टद्वारेण श्रवणेऽस्याऽङ्गतां जगुः।
कुछ लोग कहते हैं कि अदृष्ट द्वारा संन्यास श्रवणमें अङ्ग है।
अन्ये तु 'शान्तो दान्त उपरतः' इत्यादिश्रुतौ उपरतशब्दगृहीततया सन्न्यासस्य साधनचतुष्टयान्तर्गतत्वात्, 'सहकार्यन्तरविधिः' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ४७) सूत्रभाष्ये 'तद्वतो विद्यावतः सन्न्या-
दूसरे जन्ममें संन्यास लेकर ही ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति होती है। जिन जनक प्रभृति गृहस्थाश्रमियोंको ही ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हुई है, उनको पूर्व जन्मके संन्याससे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हुई है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए संन्यासजनित अपूर्वका ब्रह्मविद्यामें व्यभिचार नहीं है।
* कुछ लोग कहते हैं कि 'शान्तो दान्त उपरतः' (शमसे युक्त, दमसे युक्त, और नित्यकर्मोंके त्यागसे युक्त) इत्यादि श्रुतिमें संन्यासका उपरतशब्दसे कथन होनेके कारण, वह साधनचतुष्टयके अन्तर्गत ही है, अतः 'सहकार्यन्तरविधिः' इस सूत्रके भाष्यमें—'तद्वतो' अर्थात् श्रवण आदिके अनुष्ठानमें उपयोगी सामान्यज्ञानसे युक्त संन्यासीके लिए बाल्य और पाण्डित्यकी
• संन्यासके अदृष्टद्वारकात्वपक्षका अवलम्बन करके ही संन्यासपूर्वक श्रवण आदिके अधिकारीके विशेषणरूपसे विद्यामें उपयोग है, इसे सप्रमाण साबित करते हैं। 'शान्तो दान्त उपरतः' के आगे 'तितिक्षुः समाहितः श्रद्धावित्तो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इतना और श्रुतिका भाग है। शमः—आन्तर इन्द्रियोंका निग्रह, दमः—बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह, उपरतिः—नित्यकर्मोंका त्याग, तितिक्षुः—शीतोष्णादि-द्वन्द्वसहिष्णु अर्थात् शीतोष्णजन्य दुःखदिका सहन करनेवाला, समाहितः—श्रवण आदिके लिए अपेक्षित चित्तकी एकाग्रता, श्रद्धावित्त—देवता, वेदान्तवाक्य आदिमें विश्वास ही द्रव्य जिसका है, ऐसा होकर अपने कार्यकारणसंघातमें कार्यकारणसंघातके साक्षीरूप आत्माको 'मैं आत्मा हूँ' इस प्रकार देखे, यह उक्त श्रुतिका अर्थ है। यद्यपि 'शान्तो दान्तः' इस प्रकार शम और दमकी विधायक श्रुतिसे ही कर्ममात्रका निवारण हो सकता है, इससे उपरतिविधायक अग्रिम श्रुति व्यर्थसी भासती है, तथापि वह व्यर्थ नहीं है, क्योंकि शम, दम विधायकश्रुतिके सामान्य होनेसे उसका नित्यकर्मविधायक विशेषशास्त्रसे बाध हो सकता है, अतः उपरतिविधायकश्रुतिकी आवश्यकता है।