सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 474, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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सिनो बाल्यपाण्डित्यापेक्षया तृतीयमिदं मौनं विधीयते, 'तस्मात् ब्राह्मणः पाण्डित्यम्' इत्यादिश्रुतौ ततः प्राग् 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' इति 'सन्न्यासाधिकाराद्' इति प्रतिपादनात्,
'त्यक्ताशेषक्रियस्यैव संसारं प्रजिहासतः ।
जिज्ञासोरेव चैकात्म्यं त्रय्यन्तेष्वधिकारिता ॥'
इति वार्त्तिकोक्तेश्च सन्न्यासापूर्वस्य ज्ञानसाधनवेदान्तश्रवणाद्यधिकारि-विशेषणत्वमिति तस्य विद्योपयोगमाहुः ।
दृष्टेन निर्विक्षेपेण नियमं त्वितरे बुधाः ॥ १० ॥
कई एक विद्वान् कहते हैं कि विक्षेपाभावरूप दृष्ट द्वारा अर्थात् अनन्यव्यापारता-रूप दृष्टद्वारा संन्यासका विद्यामें उपयोग है ॥ १० ॥
अपरे तु 'श्रवणाद्यङ्गतयाऽऽत्मज्ञानफलता सन्न्यासस्य सिद्धा' इति
(श्रवण और मननकी) अपेक्षा तीसरे निदिध्यासनका विधान किया जाता है, क्योंकि 'भूतकालीन ब्राह्मणोंने साधारणरूपसे आत्माको जानकर तत्त्वसाक्षात्कारके लिए संन्यासका ग्रहण किया था, इससे आधुनिक मुमुक्षु ब्राह्मण भी संन्यासका ग्रहण करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करें' इस प्रकारकी श्रुतिमें 'तस्मात् ब्राह्मणः' इसके पूर्व 'भिक्षाचर्यां चरन्ति' (भिक्षावृत्तिका अनुष्ठान करते हैं) इस तरह संन्यासका अधिकार है—ऐसा प्रतिपादन किया गया है।
और * 'त्यक्ताशेष०' (जो ऐहिक आमुष्मिक विषयभोगका त्याग करनेकी इच्छा रखता है, जो सम्पूर्ण नित्यनैमित्तिक क्रियाओंका परित्याग करके स्थित है और जो जीव ब्रह्मके ऐक्यको जाननेकी इच्छा करता है, उसीका वेदान्तशास्त्रोंमें अधिकार है) इस प्रकार वार्त्तिककारकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि संन्यासजनित अपूर्वका ज्ञानके प्रति साधनभूत वेदान्तके श्रवण आदिमें अधिकारीके विशेषणरूपसे कथन है, अतः संन्यासका विद्यामें ही उपयोग है।
† कुछ लोग कहते हैं कि 'श्रवण आदिके अङ्ग होनेके कारण संन्यासका
* सम्बन्ध वार्त्तिकके १० वें पृष्ठमें यह श्लोक है [ आनन्दाश्रम, पूना मुद्रित ] ।
† संन्यासका दृष्ट द्वारा विद्यामें उपयोग है, इस द्वितीय पक्षका अवलम्बन करके उसका समर्थन करते हैं। 'श्रवणाद्यङ्गतया' इत्यादि विवरणका तात्पर्य यह है कि कुछ समयके लिए अनुष्ठित श्रवण विद्योदयद्वारा अमृतत्वका साधन नहीं हो सकता, किन्तु सर्वदा किया हुआ