सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४४५
विवरणोक्तेरनन्यव्यापारतया श्रवणादिनिष्पादनं कुर्वतस्तस्य विद्यायामु-
पयोगः, दृष्टद्वारे सम्भवति अदृष्टकल्पनायोगात् । यदि त्वनलसस्य धीमतः पुरुषधौरेयस्याऽऽश्रमान्तरस्थस्याऽपि कर्मच्छिद्रेषु श्रवणादि सम्पद्यते,
फल ब्रह्मज्ञान सिद्ध ही है' इस प्रकारकी विवरणकारकी उक्तिसे अनन्य-व्यापाररूपसे श्रवण आदिकी उत्पत्ति कराता हुआ सन्न्यास विद्यामें ही उपयोगी है, जब दृष्ट द्वार मिल सकता है, तब तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना करना अयुक्त ही है। यदि अन्य आश्रमस्थ होते हुए भी आलस्यरहित किसी बुद्धिमान् † धीर पुरुषको कर्मजालमें रहते श्रवण आदिकी उत्पत्ति हो
श्रवण ही अमृतत्वका (मोक्षका) साधन होता है, क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतियाँ हैं' इसलिए अनन्यव्यापाररूपसे श्रवण आदिके अनुष्ठानका विधान करनेवाला शास्त्र संन्यासकी अवश्य अपेक्षा रखता है, अतः गृहस्थाश्रमी-प्रभृति अपने आश्रमस्य कर्मोंमें सदा व्यग्र होनेके कारण श्रवण आदिका अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं, इसी प्रकार विद्याके साधनरूपसे संन्यासका विधान करनेवाला शास्त्र भी द्वाररूपसे निरन्तर श्रवण आदिकी अपेक्षा करता है, क्योंकि संन्यास साक्षात् विद्याका साधन नहीं है, और यह भी कारण है कि जब दृष्ट द्वार मिलता हो, तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना भी नहीं की जाती है, इसमें भी श्रवण आदि तत्त्वके व्यञ्जक होनेसे अर्थतः प्रधान हैं और तत्त्वका व्यञ्जक न होनेसे संन्यास गौण है, इस रीतिसे श्रवण आदिकी विधि और संन्यासकी विधिकी परस्पर अपेक्षा होनेके कारण एकवाक्यता होनेसे उन दो वाक्योंसे संन्यासरूप अङ्गसे युक्त मनन-निदिध्यासनसहित श्रवणका विधान होता है, अतः संन्यासके श्रवणाङ्गत्वबोधक शास्त्रके न होनेपर भी कोई हानि नहीं है।
अथवा उक्त विवरणकारके कथनका भाव यह है कि श्रवणविधि अपने साधनरूपसे विक्षेपकी निवृत्ति और विक्षेपनिवृत्तिके प्रति साधन संन्यासकी अपेक्षा करती है, क्योंकि विक्षिप्तचित्त पुरुषकी श्रवण आदिके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। गृहस्थ आदि भी अपने विहित कर्मोंके अनुष्ठान कालके अतिरिक्त कालमें भी अनेक विषयोंसे व्यग्र होनेके कारण विक्षिप्त ही रहते हैं, और संन्यासविधिसे भी, जो कि विक्षेपनिवृत्तिरूप दृष्ट द्वारा श्रवण आदिका सम्पादन कराकर विद्याका सम्पादन कराती है, संन्यासका विधान होनेसे उसका चरितार्थ हो सकता है, तो अदृष्टद्वारा विद्याके साधनीभूत संन्यासका विधान नहीं हो सकता, इसलिए पूर्वप्रतिपादनप्रकारके अनुसार विद्याके अङ्गरूपसे संन्यासकी ही विद्या फल है, अदृष्ट द्वारा नहीं है, यह सिद्ध है, इस पक्षमें 'अनन्यव्यापारतया' इसका विक्षेपनिवृत्तिद्वारा, यह अर्थ विवक्षित है।
† विषयोंसे इन्द्रियोंको हटानेकी अर्थात् इन्द्रियनिग्रह करनेकी सामर्थ्य जिस पुरुषमें है, और जो सत्त्वगुणप्रधान है एवं विषयोंमें दोषदर्शन जिसने किया है, ऐसे पुरुषको सांसारिक पदार्थोंसे गृहस्थाश्रममें रहनेपर भी विक्षेप नहीं हो सकता है, अतः संन्यासका फल जो