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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४४५


विवरणोक्तेरनन्यव्यापारतया श्रवणादिनिष्पादनं कुर्वतस्तस्य विद्यायामु-
पयोगः, दृष्टद्वारे सम्भवति अदृष्टकल्पनायोगात् । यदि त्वनलसस्य धीमतः पुरुषधौरेयस्याऽऽश्रमान्तरस्थस्याऽपि कर्मच्छिद्रेषु श्रवणादि सम्पद्यते,


फल ब्रह्मज्ञान सिद्ध ही है' इस प्रकारकी विवरणकारकी उक्तिसे अनन्य-व्यापाररूपसे श्रवण आदिकी उत्पत्ति कराता हुआ सन्न्यास विद्यामें ही उपयोगी है, जब दृष्ट द्वार मिल सकता है, तब तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना करना अयुक्त ही है। यदि अन्य आश्रमस्थ होते हुए भी आलस्यरहित किसी बुद्धिमान् † धीर पुरुषको कर्मजालमें रहते श्रवण आदिकी उत्पत्ति हो


श्रवण ही अमृतत्वका (मोक्षका) साधन होता है, क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतियाँ हैं' इसलिए अनन्यव्यापाररूपसे श्रवण आदिके अनुष्ठानका विधान करनेवाला शास्त्र संन्यासकी अवश्य अपेक्षा रखता है, अतः गृहस्थाश्रमी-प्रभृति अपने आश्रमस्य कर्मोंमें सदा व्यग्र होनेके कारण श्रवण आदिका अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं, इसी प्रकार विद्याके साधनरूपसे संन्यासका विधान करनेवाला शास्त्र भी द्वाररूपसे निरन्तर श्रवण आदिकी अपेक्षा करता है, क्योंकि संन्यास साक्षात् विद्याका साधन नहीं है, और यह भी कारण है कि जब दृष्ट द्वार मिलता हो, तो अदृष्ट द्वारकी कल्पना भी नहीं की जाती है, इसमें भी श्रवण आदि तत्त्वके व्यञ्जक होनेसे अर्थतः प्रधान हैं और तत्त्वका व्यञ्जक न होनेसे संन्यास गौण है, इस रीतिसे श्रवण आदिकी विधि और संन्यासकी विधिकी परस्पर अपेक्षा होनेके कारण एकवाक्यता होनेसे उन दो वाक्योंसे संन्यासरूप अङ्गसे युक्त मनन-निदिध्यासनसहित श्रवणका विधान होता है, अतः संन्यासके श्रवणाङ्गत्वबोधक शास्त्रके न होनेपर भी कोई हानि नहीं है।

अथवा उक्त विवरणकारके कथनका भाव यह है कि श्रवणविधि अपने साधनरूपसे विक्षेपकी निवृत्ति और विक्षेपनिवृत्तिके प्रति साधन संन्यासकी अपेक्षा करती है, क्योंकि विक्षिप्तचित्त पुरुषकी श्रवण आदिके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। गृहस्थ आदि भी अपने विहित कर्मोंके अनुष्ठान कालके अतिरिक्त कालमें भी अनेक विषयोंसे व्यग्र होनेके कारण विक्षिप्त ही रहते हैं, और संन्यासविधिसे भी, जो कि विक्षेपनिवृत्तिरूप दृष्ट द्वारा श्रवण आदिका सम्पादन कराकर विद्याका सम्पादन कराती है, संन्यासका विधान होनेसे उसका चरितार्थ हो सकता है, तो अदृष्टद्वारा विद्याके साधनीभूत संन्यासका विधान नहीं हो सकता, इसलिए पूर्वप्रतिपादनप्रकारके अनुसार विद्याके अङ्गरूपसे संन्यासकी ही विद्या फल है, अदृष्ट द्वारा नहीं है, यह सिद्ध है, इस पक्षमें 'अनन्यव्यापारतया' इसका विक्षेपनिवृत्तिद्वारा, यह अर्थ विवक्षित है।

† विषयोंसे इन्द्रियोंको हटानेकी अर्थात् इन्द्रियनिग्रह करनेकी सामर्थ्य जिस पुरुषमें है, और जो सत्त्वगुणप्रधान है एवं विषयोंमें दोषदर्शन जिसने किया है, ऐसे पुरुषको सांसारिक पदार्थोंसे गृहस्थाश्रममें रहनेपर भी विक्षेप नहीं हो सकता है, अतः संन्यासका फल जो

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४४६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद

तदा 'चतुर्ष्वाश्रमेषु संन्यासाश्रमपरिग्रहेणैव श्रवणादि निर्वर्तनीयम्' इति नियमोऽभ्युपेय इति ॥ ५ ॥

क्षत्रियादेरसन्न्यासाच्छ्रवणादि कथं भवेद् ।
संन्यास न होनेके कारण श्रवण क्षत्रियादिको कैसे हो सकता है ?

नन्वस्मिन् पक्षद्वये क्षत्रियवैश्ययोः कथं वेदान्तश्रवणाद्यनुष्ठानम् ; संन्यासस्य ब्राह्मणाधिकारित्वाद् 'ब्राह्मणो निर्वेदमायाद्' 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' 'ब्राह्मणः प्रव्रजेद्' इति संन्यासविधिषु ब्राह्मणग्रहणात् ।
'अधिकारिविशेषस्य ज्ञानाय ब्राह्मणग्रहः ।
न संन्यासविधिर्यस्माच्छ्रुतौ क्षत्रियवैश्ययोः ॥' इति-
वार्त्तिकोक्तेश्चेति चेत्,
तत्र केचन सन्न्यासमाहुः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ११ ॥
इस विषय कोई लोग कहते हैं कि क्षत्रिय और वैश्योंका भी संन्यास है ॥११॥

सकती है, तो यह नियम मानना चाहिए कि चारों आश्रमोंमें संन्यास आश्रमका ग्रहण करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए ॥५॥

अब शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें अर्थात् संन्यासके अधिकारीके प्रति विशेषणत्व और श्रवणाङ्गत्व पक्षमें क्षत्रिय और वैश्य वेदान्तके श्रवण आदिका अनुष्ठान कैसे कर सकते हैं, क्योंकि ब्राह्मण ही संन्यासमें अधिकारी है, कारण कि 'ब्राह्मणो०' ( ब्राह्मण ही वैराग्यपूर्वक संन्यास करे ) 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' (ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करके) 'ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' ( ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करे ) इत्यादि संन्यासके विधायक वाक्योंमें ब्राह्मणका ही ग्रहण किया गया है ।

और 'अधिकारिविशेषस्य०' ( विशेष अधिकारीके परिज्ञानके लिए ब्राह्मणका ग्रहण किया गया है, क्योंकि श्रुतिमें कहींपर भी क्षत्रिय और वैश्यकी संन्यासविधि नहीं है ) ऐसा वार्त्तिकका वचन भी है ।


विक्षेपका अभाव है, वह संन्याससे भिन्न साधन द्वारा भी प्राप्त होता है, इसलिए विधित्सितं (विधानके लिए अभीष्ट) संन्यासकी श्रवणादिमें अपेक्षित विक्षेप-निवृत्तिके प्रति पक्षमें प्राप्ति और पक्षमें अप्राप्ति दोनों हो सकती है, अतः संन्यासविधिको अपूर्वविधि नहीं मानना चाहिए, किन्तु नियमविधि ही माननी चाहिए ।

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क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४४७


अत्र केचित्—'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्, गृहाद्वा, वनाद्वा' इत्याद्यविशेषश्रुत्या,

'ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वैश्यो वा प्रव्रजेद् गृहात् ।
त्रयाणामपि वर्णानाममी चत्वार आश्रमाः॥'

इति स्मृत्यनुगृहीततया क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकारसिद्धेः श्रुत्यन्तरेषु ब्राह्मणग्रहणं त्रयाणामुपलक्षणम् ; अत एव वार्त्तिकेऽपि 'अधिकारिविशेषस्य' इति श्लोकेन भाष्याभिप्रायमुक्त्वा—

'त्रयाणामविशेषेण सन्न्यासः श्रूयते श्रुतौ ।
यदोपलक्षणार्थं स्यात् ब्राह्मणग्रहणं तदा ॥'

इत्यनन्तरश्लोकेन स्वमते क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकारो दर्शित इति तयोः श्रवणाद्यनुष्ठानसिद्धिं समर्थयन्ते ।

अन्ये तु ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासो बहुधा श्रुतेः ।
देवादिवदसन्न्यासश्रवणं क्षत्रवैश्ययोः ॥ १२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि अनेक श्रुतियोंसे संन्यास केवल ब्राह्मणके लिए है, क्षत्रिय और वैश्यको देवादिके समान संन्यासके बिना श्रवण है ॥ १२ ॥


इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते है कि 'यदि वेतरथा०' (यदि ब्रह्मचर्य अवस्थामें ही वैराग्य उत्पन्न हुआ, तो ब्रह्मचर्यावस्थासे ही संन्यासका परिग्रहण करना चाहिए अथवा गृहस्थाश्रमसे या वानप्रस्थसे संन्यास लेना चाहिए) इस श्रुतिसे,

'ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि०' (ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य गृहस्थाश्रमसे संन्यासी हो सकते हैं, क्योंकि तीनों वर्णोंके लिए ये चार आश्रम हैं) इस स्मृतिके अनुगृहीत रूपसे, क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यासमें अधिकार सिद्ध है, अतः अन्य श्रुतियोंमें ब्राह्मणग्रहण तीनों वर्णोंका उपलक्षण है, इसीलिए वार्त्तिकमें 'अधिकारिविशेषस्य' इत्यादिसे भाष्यके अभिप्रायको कहकर—

'त्रयाणाम्०' (जब कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनोंका श्रुतिमें सामान्यरूपसे श्रवण होता है, तब ब्राह्मणशब्द तीनों वर्णोंका उपलक्षण ही है) इस प्रकारके पीछेके श्लोकसे अपने मतमें वार्त्तिककारने क्षत्रिय और वैश्यके भी श्रवण आदिके अनुष्ठानमें अधिकारका समर्थन किया है।

४४८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अन्ये त्वनेकेषु सन्न्यासविधिवाक्येषु ब्राह्मणग्रहणात् उदाहृतजावालश्रुतौ सन्न्यासविधिवाक्ये ब्राह्मणग्रहणाभावेऽपि श्रुत्यन्तरसिद्धं ब्राह्मणाधिकारमेव सिद्धं कृत्वा 'सन्न्यासावस्थायाममयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मणः' इति ब्राह्मणपरामर्शाच्च ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासाधिकारः । विरोधाधिकरणन्यायेन ( पू० मी० अ० १ पा० ३ अधि० २ ) श्रुत्यविरुद्धस्यैव स्मृत्यर्थस्य


-भाष्यका अनुसरण करनेवाले कई लोग कहते हैं कि संन्यासके विधायक अनेक वाक्योंमें ब्राह्मणशब्दके ग्रहणसे 'यदि वेतरथा' इत्यादि जावालश्रुतिके संन्यासविधायक वाक्यमें ब्राह्मणग्रहणके न होनेपर भी अन्य श्रुतिसे सिद्ध अर्थात् 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' इत्यादि श्रुतिसे ब्राह्मणका अधिकार निश्चित करके 'संन्यासावस्थायाम्' ( संन्यासावस्थामें यज्ञोपवीत न होनेके कारण वह कैसे ब्राह्मण* हो सकता है ? ) इस प्रकार ब्राह्मणका परामर्श करके संन्यासमें ब्राह्मणके ही अधिकारका प्रतिपादन किया गया है । क्योंकि विरोधाधिकरणन्यायसे† उसी स्मृतिके अर्थका परिग्रहण करना चाहिए, जो श्रुतिसे विरुद्ध


* अर्थात् तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदि ही ब्राह्मणत्वके व्यञ्जक हैं, अतः तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदिके न होनेसे यह परमहंस संन्यासी ब्राह्मण कैसे हो सकता है, यह आक्षेपका अभिप्राय है, यदि प्रकृतमें क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यास विवक्षित होता, तो 'कथं ब्राह्मणः' इसके समान 'कथं क्षत्रियः' 'कथं वैश्यः' ऐसा भी सुना जाता, परन्तु नहीं सुना जाता है, अतः उनका संन्यासमें अधिकार नहीं है, यह समुदितका भाव है ।

† इस अधिकरणमें श्रुति और स्मृतिके विरोधमें श्रुतिका ही प्रामाण्य अङ्गीकार किया गया है, जैसे कि ऐन्द्र यागमें सुना जाता है कि 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' और 'औदुम्बरी सर्वा वेष्टयितव्या' पूर्वोक्त श्रुति है और दूसरी कात्यायनस्मृति है। औदुम्बरीसे उदुम्बरकी शाखा अथवा उदुम्बरकी बनाई हुई पशु बन्धनके लिए स्थूणा—यूप—विवक्षित है, इस अवस्थामें दोनोंका एक समय यागमें अनुष्ठान नहीं हो सकता, क्योंकि यदि स्मृतिके अनुसार औदुम्बरीका वस्त्रसे वेष्टन करेंगे, तो उसका स्पर्श नहीं हो सकेगा, श्रुतिके अनुसार स्पर्श माने, तो वेष्टन नहीं होगा, इसपर सिद्धान्त किया गया है—'श्रुत्या स्मृतिर्बाध्यते' अर्थात् श्रुतिसे स्मृतिका बाध होता है, इससे कात्यायनस्मृतिका उक्त श्रुतिसे बाध होगा, क्योंकि स्मृतिका प्रामाण्य श्रुतिमूलक है, स्वतः नहीं, और उक्त स्मृतिसे श्रुतिकी कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' इत्यादि श्रुतिसे उसकी कल्पकत्वशक्ति व्याहत होगी, प्रकृतमें भी 'तस्माद् ब्राह्मणः' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासके अनुरोधसे 'ब्राह्मण संन्यास लेकर पाण्डित्य आदिका अनुष्ठान करे' इस प्रकारके वाक्यार्थका लाभ होनेसे 'विविदिषु द्वारा क्रियमाण विद्धार्थ संन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है' यह भगवान् वार्तिककारका मत है, यदि वार्तिकवचनका तात्पर्य

क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४४९


सङ्ग्राह्यत्वात् । यत्तु सन्न्यासस्य सर्वाधिकारित्वेन वार्त्तिकवचनं तत् 'विद्वत्संन्यासविषयम्, न तु आतुरविविदिषासन्यासे भाष्याभिप्रायविरुद्ध-सर्वाधिकारप्रतिपादनपरम् । 'सर्वाधिकारविच्छेदि विज्ञानं चेदुपैयते । कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥' इत्यनन्तरश्लोकेन ब्रह्मज्ञानोदयानन्तरं जीवन्मुक्तिकाले विद्वत्संन्यास


नहीं हो। और जो कि 'संन्यासमें सभी त्रैवर्णिकोंका अधिकार है' इस अर्थकी पुष्टिमें पूर्वमें वार्त्तिककारका वचन दिया गया है' वह तो विद्वत्संन्यासविषयक है, आतुर और विविदिषासंन्यासमें भाष्यसे असम्मत सभीके‡ अधिकारका प्रतिपादनविषयक नहीं है।

※'सर्वाधिकार०' (क्षत्रिय और वैश्यको यदि सर्वाधिकारविच्छेदी विज्ञान हो जाय, तो सम्पूर्ण कर्मकी निवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें भी विविदिषासंन्यासके समान ब्राह्मणोंका अधिकार है, यह नियम किस बलसे कर सकते हैं? अर्थात् किसी प्रमाणके बलसे नहीं कर सकते हैं' इस प्रकारके पीछेके श्लोकसे ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके बाद जीवन्मुक्तिकालमें विद्वत्संन्यासमें ही अधिकारके


भाष्यविरुद्ध अर्थमें माना जाय, तो संन्यासका सर्वसाधारणरूपसे प्रतिपादन करनेवाले स्मृतिवचनके समान वार्त्तिकवचन भी हेय-त्याज्य होगा, अतः वार्त्तिकवचन भी भाष्यके अविरुद्ध अर्थमें ही पर्यवसन्न है, इसी अभिप्रायसे 'तद् विद्वत्संन्यासविषयम्' इस अग्रिम मूलका उल्लेख किया गया है।

* विविदिषासंन्यासमें सभीका अधिकार नहीं है, इसमें यह दूसरा भी हेतु है, तात्पर्य यह है—क्षत्रिय और वैश्यके तत्त्वज्ञानका अधिकार है या नहीं? यदि नहीं है, तो जनक प्रभृतिके तत्त्वज्ञानके प्रतिपादक अनेक वचन विरुद्ध होंगे। यदि है, तो तत्त्वज्ञानसे कर्माधिकार प्रयोजक वर्णाश्रमादि अध्यासकी निवृत्ति होनेसे सकलकर्मनिवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें क्षत्रिय और वैश्यके अधिकारका वारण नहीं कर सकते हैं, अतः विविदिषासंन्यासके समान विद्वत्संन्यासमें भी ब्राह्मणका ही अधिकार है, यह नियम नहीं बनेगा, विविदिषासंन्यास उसको कहते हैं—जिसका कि इस जन्ममें या जन्मान्तरमें अनुष्ठित वेदानुवचन आदिसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानकी इच्छासे ग्रहण किया जाय अर्थात् जिसमें दण्ड आदिका ग्रहण किया जाता है, ऐसा परमहंसाश्रम। और विद्वत्संन्यास उसे कहते हैं—जिसका कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे परतत्त्वको जानकर ग्रहण किया जाता है, जैसे कि याज्ञवल्क्य प्रभृतिने ग्रहण किया था !

५७

४५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

एवाऽधिकारनियमनिराकरणात् । एवं च ब्राह्मणानामेव श्रवणाद्यनुष्ठाने सन्न्यासोऽङ्गम् ; क्षत्रियवैश्ययोस्तन्निरपेक्षः श्रवणाद्यधिकार इति तयोः श्रवणाद्यनुष्ठाननिर्वाहः । नहि सन्न्यासस्य श्रवणापेक्षितत्वपक्षे श्रवणमात्रस्य तदपेक्षा नियन्तुं शक्यते; क्रममुक्तिफलकसगुणोपासनया देवभावं प्राप्तस्य श्रवणादौ सन्न्यासनिरपेक्षस्याऽवश्यं वक्तव्यत्वाद् देवानां कर्मानुष्ठानाप्रसक्त्या तत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य तेष्वसम्भवादित्याहुः ।

ब्रह्मसंस्थश्रुतेर्न्यासी मुख्यः श्रवणविद्ययोः ।
क्षत्रियादेरनुमतिं जन्मान्तरफलां परे ॥ १३ ॥

'ब्रह्मसंस्थो' इत्यादि श्रुतिसे श्रवण और विद्यामें संन्यासी ही मुख्य अधिकारी हैं, और क्षत्रिय आदिकी जन्मान्तरमें फलके लिए श्रवणकी अनुमति है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १३ ॥

नियमका खण्डन किया गया है । एवञ्च अर्थात् श्रवणके अङ्गरूपसे अथवा अधिकारीके विशेषणरूपसे विद्याके साधन विविदिषासंन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है, ऐसा सिद्ध होनेपर यह फलित होता है—ब्राह्मणोंके ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें संन्यास अङ्ग है और क्षत्रिय एवं वैश्यका संन्यासके बिना ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें अधिकार है, अतः उनके श्रवण आदिका अनुष्ठान उपपन्न हो सकता है, और संन्यासके श्रवणापेक्षितत्वपक्षमें अर्थात् श्रवणके अङ्गरूपसे या अधिकारीके विशेषणरूपसे श्रवण संन्यासकी अपेक्षा रखता है, इस पक्षमें श्रवणमात्रको ( अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि सभीके श्रवणको ) संन्यासकी अपेक्षा है, ऐसा नियम भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि क्रमसे मुक्ति जिसका फल है, ऐसी सगुण उपासनासे देवभावको† जो प्राप्त हुआ है, उसके श्रवण आदिमें संन्यासकी अपेक्षा अवश्य कहनी होगी, परन्तु देवताओंको कर्मानुष्ठानकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः उसका त्यागरूप संन्यास हो ही नहीं सकता है ।


† देवभावको प्राप्त हुए सगुण उपासकके श्रवणमें संन्यासका व्यभिचार है, यह कथन अयुक्त है, क्योंकि उसे सगुण विद्याकी सामर्थ्यसे ही निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार हो सकता है, इसलिए श्रवण आदिका अनुष्ठान व्यर्थ है, यदि इस प्रकार शङ्का हो, तो अयुक्त है, क्योंकि देवताधिकरणमें देवभावको प्राप्त हुए उपासकको लेकर श्रवणादिमें देव आदिके अधिकारका निरूपण किया गया है, अतः उनको भी श्रवण आदिके बिना विद्या नहीं हो सकती

' क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४५१

अपरे तु 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रुत्युदिता यस्य ब्रह्मणि संस्था—समाप्तिः—अनन्यव्यापारत्वरूपं तन्निष्ठत्वम्—तस्य श्रवणादिषु मुख्याधिकारः। 'गच्छतस्तिष्ठतो वाऽपि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा।
न विचारपरं चेतो यस्याऽसौ मृत उच्यते॥'
'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद् वेदान्तचिन्तया।'
इत्यादिस्मृतिषु सर्वदा विचारविधानात्। सा च ब्रह्मणि संस्था विना सन्न्यासमाश्रमान्तरस्थस्य न सम्भवति; स्वस्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानवैयग्र्यात् इति सन्न्यासरहितयोः क्षत्रियवैश्ययोर्न मुख्यः श्रवणाद्यधिकारः।

*कुछ लोग कहते हैं कि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस श्रुतिसे प्रतिपादित जिसकी ब्रह्ममें संस्था—समाप्ति अर्थात् दूसरे सब व्यापारको छोड़कर केवल ब्रह्ममें निष्ठा है, उसीका श्रवणमें अधिकार है।

'गच्छतः०' (जागते, सोते, जाते और बैठते हुए जिस पुरुषका चित्त ब्रह्म-विचारसे युक्त नहीं है, उसे मरा हुआ समझना चाहिए, सोने और मरने तक वेदान्तविचारसे ही समयका यापन करना चाहिए) इत्यादि स्मृतिसे सदा ब्रह्म-विचारका ही विधान किया गया है। और इस प्रकारकी जो ब्रह्ममें संस्था है, वह संन्यासके बिना अन्य आश्रममें रहकर नहीं हो सकती, क्योंकि अपने अपने आश्रममें विहित कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे चित्तकी व्यग्रता हो सकती है, अतः संन्याससे रहित क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार†


है, इसलिए व्यभिचार होनेके कारण संन्यास श्रवणमात्रका अङ्ग नहीं है, किन्तु ब्राह्मणकर्तृक श्रवणका ही संन्यासका अङ्ग है, अतः क्षत्रिय और वैश्यका संन्यासमें अधिकार न रहनेपर भी श्रवण आदिका निर्वाह हो सकता है, यह भाव है।

✪ देवकर्तृकश्रवणमें संन्यासाश्रमका यदि व्यभिचार है, तो उसका निवारण करनेके लिए त्रैवर्णिक मनुष्योंके श्रवणमें ही संन्यासाश्रमको हेतु मानना चाहिए, ब्राह्मणमात्रकर्तृक श्रवणमें संन्यासाश्रमकी हेतुता नहीं माननी चाहिए, क्योंकि वैसे संकोचमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि आगे ही कहा है कि चार आश्रमोंमें संन्यासाश्रमका परिग्रह करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए, और आश्रमविभाग तीनों वर्णोंके लिए साधारण है, केवल ब्राह्मणके लिए नहीं है। इस अवस्थामें ब्राह्मण-संन्यासीके समान संन्याससे हीन क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणमें अधिकार कैसे हो सकता है, इस अस्वरससे यह 'अपरे तु' मत कहा जाता है।

† तात्पर्य यह है 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस श्रुतिसे पाण्डित्य श्रुतिके समान ब्रह्मनिष्ठा-धर्मवाले संन्यासाश्रमका विधान होता है, क्योंकि ब्रह्मसंस्थशब्दसे कहलानेवाली ब्रह्मनिष्ठा

४५२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

किं तु 'दृष्टार्था च विद्या प्रतिषेधाभावमात्रेणाऽप्यर्थिनमधिकरोति श्रवणा- नहीं है । किन्तु 'प्रतिषेधाभावमात्रसे‡ दृष्टार्थ विद्या श्रवण आदिमें अर्थी पुरुषको

संन्यासाश्रममें ही हो सकती है, इस प्रकार संन्यासाधिकरण भाष्यमें प्रतिपादन किया गया है, इसलिए ब्रह्मनिष्ठाका संन्यासके धर्मरूपसे विधान होनेके कारण ब्राह्मणसंन्यासीकी ब्रह्मनिष्ठा धर्म है, अतः संन्यासीका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार है, क्योंकि ब्रह्मनिष्ठाके व्यतिक्रमसे प्रत्यवाय सुना जाता है—

'काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः ।
स याति नरकान् घोरान् महारौरवसंज्ञकान् ॥' ( परमहंसोपनिषत् )

अर्थात् संन्यास आश्रमका धारण करनेवाला पुरुष ज्ञानरहित होकर अपनी बाह्य, और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको यदि काबूमें नहीं रखता है, तो वह महारौरव आदि नरकोंमें गिरता है । और जैसे संन्यासीकी ज्ञाननिष्ठाका विधान करनेवाली 'संन्यस्य श्रवणं कुर्यात्' 'गच्छतस्तिष्ठतो वाऽपि' इत्यादि अनेक स्मृतियां हैं, वैसे ही उनका परित्याग करनेसे वह पतित होता है, इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृतियां भी अनेक हैं—

'त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् ।
श्रुत्या विधीयते यस्मात्तत्यागी पतितो भवेत् ॥
नित्यं कर्म परित्यज्य वेदान्तश्रवणं विना ।
वर्तमानस्तु संन्यासी पतत्येव न संशयः ॥'

अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यघटक त्वंपदके विवेकके लिए सब कर्मोंके त्यागरूप संन्यासका श्रुतिसे विधान किया गया है, इसलिए संन्यासके त्याग देनेसे पतित होता है, अपने नित्यकर्मका परित्याग करके वेदान्तश्रवण आदि कुछ नहीं करता है, तो वह संन्यासी पतित हो जाता है । और अपने आश्रमधर्मका परित्याग करनेसे महान् अनर्थ होता है । इस विषयमें सच्चिदानन्द आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णने अपने साक्षात् श्रीमुखसे भी कहा है कि—

'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥'

अर्थात् अपना स्वकीय धर्म भले ही विगुण हो, परन्तु दूसरे धर्मोसे अच्छा ही है, अतः अपने धर्ममें मरना भी अच्छा है, परन्तु परधर्मका अनुष्ठान भयावह है । इन सब प्रमाणोंके ऊपर दृष्टि रखते हुए भगवान् भाष्यकारने उस संन्यासीके लिए, जो संन्यासी अनन्यभावनासे श्रवण आदि नहीं करता है, पातित्यका भी सूचन किया है—'शम, दम आदिसे वर्धित ब्रह्मनिष्ठा ही संन्यासीका स्वकीय आश्रमविहित धर्म है, और अन्य लोगोंका यज्ञ आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान न करनेसे उनको प्रत्यवाय होता है' इत्यादि । इससे श्रवण आदिका भिक्षुके प्रति विधान होनेसे और उनके न करनेसे प्रत्यवायका श्रवण होनेसे संन्यासीका ही श्रवणादिमें मुख्य अधिकार है, और संन्यास-आश्रमसे जो विधुर हैं, उनके प्रति श्रवण आदिका विधान न होनेसे और प्रत्यवायकी श्रुति न होनेसे उनका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार नहीं है ।

‡ दृष्टफल—अज्ञाननिवृत्तिरूप दृष्ट फल है—जिसका, ऐसी विद्या प्रतिषेधाभावमात्रसे अर्थात् विघातक निषेधके अभावसे पुरुषको श्रवण आदिमें प्रवृत्त कराती है, श्रवणके लिए

क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादि में अधिकार] भाषानुवादसहित ४५१


दिषु' इति 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणभाष्योक्तन्यायेन शूद्रवदप्रतिषिद्धयोस्तयोर्विधुरादीनामिव देहान्तरे विद्याप्रापकेणाऽमुख्याधिकारमात्रेण श्रवणाद्यनुमतिः । नहि 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणे विधुरादीनामङ्गीकृतश्रवणाद्यधिकारो मुख्य इति वक्तुं शक्यते; 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३९ )

अधिकृत करती है' इस प्रकारके 'अन्तरा चाऽपि' इत्यादि अधिकरणोक्त भाष्यके अभिप्रायसे शूद्रके समान अप्रतिषिद्ध क्षत्रिय और वैश्यका विधुर आदिके समान जन्मान्तरमें विद्याको× प्राप्त करानेवाले अमुख्याधिकारमात्रसे श्रवण आदिमें अनुमति दी गई है । और 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें विधुर आदि पुरुषका जो श्रवण आदिमें अधिकार स्वीकार किया गया है, वह मुख्य है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च'* इस प्रकार


संन्यासकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्रवणके प्रति संन्यास अङ्ग नहीं है, यह भाव है, यह भाष्यकी पंक्ति 'विशेषानुग्रहश्च' (ब्र० अ० ३ पा० ४ सू० ३८) इस सूत्रके अन्तिम भाष्यभागमें है ।

× तात्पर्य यह है कि मुख्य अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले श्रवण आदि जो शमदमान्वित ब्रह्मचर्य, अहिंसा, शम, दम आदिसे युक्त हैं, इसी जन्ममें प्रायः विद्याके उत्पादक हैं, और जो मुख्य अधिकारी नहीं हैं, उनके अनन्यव्यापारत्वके न होनेके कारण श्रवण आदि इस जन्ममें विद्याके उत्पादनमें योग्य नहीं हैं, किन्तु भावी अनेक जन्मोंसे विशिष्ट श्रवण आदिका सम्पादन करके अन्य देहमें विद्याकी उत्पत्ति होगी, इसलिए गौण और मुख्य अधिकारीमें महान् फलभेद है, इसमें प्रमाण स्मृति भी है—

'अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्' ।

अर्थात् अनेक जन्मोंमें सिद्ध (ज्ञानी) होकर उत्कृष्ट गतिको प्राप्त करता है ।

* 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' इस सूत्रका यह अर्थ है—अनाश्रमी पुरुषों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधनोंकी अपेक्षा आश्रमियों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधन श्रेष्ठ हैं, क्योंकि इस अर्थमें श्रुति और स्मृति प्रमाण हैं 'तेनेति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्' यह श्रुति और 'अनाश्रमी न तिष्ठेत' इत्यादि स्मृति प्रमाण है, पुण्यवान् पुरुष पुण्यसे प्राप्त ज्ञानसे ब्रह्म पाता है, यह उक्त श्रुतिका अर्थ है । इसमें पुण्यरूपसे प्रसिद्ध आश्रमधर्मोंकी ही विशेषरूपसे ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनताका प्रतिपादन किया गया है, इसलिए यद्यपि अनाश्रमी पुरुषोंसे सम्पादित धर्म 'विशेषानुग्रहश्च' इस सूत्रके अनुसार विद्याके उपयोगी हैं, तथापि उनका अपकर्ष ही प्रतीत होता है, और वह अपकर्ष विद्यार्थ श्रवण आदि कर्मोंमें विधुर आदिका अमुख्य अधिकार होनेसे ही है, क्योंकि ऐसा माननेमें और कोई कारण नहीं है और अनाश्रमित्वकी निन्दा भी की गई है, इससे कर्म और ज्ञानमें मुख्याधिकारी निन्दाका पात्र नहीं है, यह सूत्र और भाष्यका अभिप्राय है, यह भाव है ।

४५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

तेषाममुख्याधिकारस्फुटीकरणात् । न च तत्र तेषां श्रवणाद्यधिकार एव नोक्तः, किन्तु तदीयकर्मणां विद्याऽनुग्राहकत्वमिति शङ्क्यम् ; 'दृष्टार्था च विद्या' इत्युदाहृततदधिकरणभाष्यविरोधात् । न च क्षत्रियवैश्ययोः सन्न्यासाभावाद् अमुख्याधिकारे तत एव देवाना-मपि श्रवणादिष्वमुख्य एवाऽधिकारः स्यात् , तथा च क्रममुक्तिफलक-सगुणविद्यया देवदेहं प्राप्य श्रवणाद्यनुतिष्ठतां विद्याप्राप्त्यर्थं सन्न्यासार्हं पुनर्ब्राह्मणजन्म वक्तव्यमिति 'ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते' 'न च पुनरावर्तते' 'अनावृत्तिश्शब्दाद्' इत्यादिश्रुतिसूत्रविरोध इति वाच्यम् , देवानामनुष्ठेयकर्मवैयग्र्याभावात् स्वत एवानन्यव्यापारत्वं सम्भवतीति क्रममुक्तिफलकसगुणविद्याभिधायिशास्त्रप्रामाण्याद्विनाऽपि संन्यासं तेषां मुख्याधिकाराभ्युपगमादित्याहुः ॥ ६ ॥


के सूत्रसे सूत्रकारने ही उनके अमुख्य अधिकारका स्पष्टीकरण किया है । यदि शङ्का हो कि विधुराधिकरणमें विधुर आदिका श्रवण आदिमें अधिकार ही नहीं कहा गया है, किन्तु उनके द्वारा किये गये कर्म विद्यानुग्राहक अर्थात् विद्योत्पादक हैं, यह कहा गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'दृष्ट प्रयोजनके लिए विद्या है' इत्यादि पूर्व कथित अन्तराधिकरणोक्त भाष्यसे विरोध होगा । यदि शङ्का हो कि क्षत्रिय और वैश्यका संन्यास न होनेसे यदि श्रवण आदिमें अधिकार मुख्य नहीं है, तो देवोंको संन्यासमें अधिकार न होनेके कारण उनका भी श्रवण आदिमें अमुख्य अधिकार ही होगा । इस परिस्थितिमें क्रमशः मुक्तिरूप फल देनेवाली सगुण विद्यासे देवताशरीरको प्राप्त करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करनेवाले जीवोंको विद्याकी प्राप्तिके लिए संन्यासयोग्य फिर ब्राह्मण जन्म होगा, यह कहना पड़ेगा, इस परिस्थितिमें 'ब्रह्मलोक०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ) 'न च पुन०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करके फिर इस लोकमें नहीं आता है ) 'अनावृत्तिः शब्दात् ०' ( उक्त दो श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि ब्रह्मलोकसे पुनः आना नहीं पड़ता है ) इत्यादि श्रुति और सूत्रके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंको विधेय कर्मोंसे व्यग्रता नहीं है, इससे स्वतः ही अनन्यव्यापारता हो सकती है, इसलिए क्रमशः मुक्ति देनेवाली सगुण विद्याका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रके प्रामाण्यसे संन्यासके बिना भी उनका श्रवणादि में अधिकार मुख्य है; ऐसा स्वीकार किया जाता है ॥६॥

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अमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५५


श्रवणं नन्वसंन्यासं जन्मान्तरफलं कथम् ।
दृष्टार्थत्वाददृष्टस्यासाङ्गत्वेनाप्यसंभवात् ॥१४॥

संन्याससे रहित श्रवण जन्मान्तरीय फलके प्रति हेतु कैसे होगा ? क्योंकि श्रवण दृष्टार्थक है, उसका फल अदृष्ट भी नहीं हो सकता है, क्योंकि वह संन्यासरूप अङ्गसे युक्त नहीं है ॥ १४ ॥

नन्वमुख्याधिकारिणा दृष्टफलभूतवाक्यार्थावगत्यर्थमविहितशास्त्रान्तरविचारवत् क्रियमाणो वेदान्तविचारः कथं जन्मान्तरविद्याऽवाप्तावुपयुज्यते । न खलु विचारस्य दिनान्तरीयविचार्यावगतिहेतुत्वमपि युज्यते । दूरे जन्मान्तरीयतद्धेतुत्वम् । न च वाच्यं मुख्याधिकारिणा परिव्राजकेन क्रियमाणमपि श्रवणं दृष्टार्थमेव, अवगतेर्दृष्टार्थत्वात् । तस्य यथा प्रारब्धकर्मविशेषरूपप्रतिबन्धादिह जन्मनि फलमजनयतो जन्मान्तरे प्रतिबन्धकापगमेन फलजनकत्वम् 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनाद्' इत्यधिकरणे ( उ०


अब शङ्का होती है कि प्रत्यक्ष फलरूप वाक्यार्थज्ञानके लिए अमुख्य अधिकारी द्वारा किया गया वेदान्त-विचार अविहित अन्य न्याय आदि शास्त्रोंके विचारके समान भावी जन्मान्तरकी विद्यामें उपयुक्त कैसे होगा ? क्योंकि ( आजका ) विचार ( कलके ) विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति भी हेतु नहीं हो सकता है, तो फिर ( इस जन्मके ) विचारमें जन्मान्तरके विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति हेतुता कैसे हो सकती है अर्थात् कभी नहीं हो सकती । यदि कोई कहे कि जिस प्रकार मुख्याधिकारी परिव्राजकसे ( संन्यासीसे ) किये गये श्रवणका भी फल दृष्ट ही है, क्योंकि अवगति—विद्या—दृष्ट अर्थ है, और प्रारब्ध कर्मविशेषके प्रतिबन्धसे इस जन्ममें वह श्रवण यद्यपि दृष्टफलकी उत्पत्ति नहीं कर सकता है, तथापि दूसरे जन्ममें प्रतिबन्धकके निरसनसे अवश्य उसमें फलजनकता है, ॐ ऐसा 'ऐहिकमप्य०' इत्यादि अधिकरणमें निर्णय किया गया


ॐ शङ्काका भाव यह है कि जैसे मुख्य अधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण किसी प्रतिबन्धककी सामर्थ्यसे इस जन्ममें विद्योदय नहीं करता है, और जन्मान्तरमें उस प्रतिबन्धकके निरसन द्वारा विद्याके प्रति कारण होता है, वैसे ही अमुख्याधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण जन्मान्तरमें प्रतिबन्धकके विगम द्वारा विद्याके प्रति साधन हो सकता है, इस अर्थका 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात्' इस सूत्रमें निर्णय भी किया गया है, सूत्रका अर्थ है कि किसी प्रस्तुत प्रतिबन्धके न रहते इसी जन्ममें विद्या उत्पन्न होती है, यदि कोई प्रतिबन्धक

४५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मी० अ० ३ पा० ४ सू० ५१) तथा निर्णयाद्, एवममुख्याधिकारि-कृतस्यापि स्यादिति । यतश्शास्त्रीयाङ्गयुक्तं श्रवणमपूर्वविधित्वपक्षे फलपर्यन्तमपूर्वम्, नियमविधित्वपक्षे नियमादृष्टं वा जनयति । तच्च जातिस्मरत्वप्रापकादृष्टवत् प्राग्भवीयसंस्कारमुद्बोध्य तन्मूलभूतस्य विचारस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगितां घटयतीति युज्यते । शास्त्रीयाङ्गविधुरं श्रवणं नादृष्टोत्पादकमिति कुतस्तस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगित्वमुपपद्यते । घटकादृष्टं विना जन्मान्तरीयप्रमाणव्यापारस्य जन्मान्तरीयावगतिहेतुत्वोपगमे अतिप्रसङ्गात् ।


है, उसी प्रकार अमुख्य अधिकारीसे किये गये श्रवणमें भी जन्मान्तरीय विद्याकी हेतुता हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अङ्ग-संन्याससे युक्त श्रवण अर्थात् संन्यासी द्वारा अनुष्ठित श्रवण † अपूर्वविधिपक्षमें विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक अदृष्टकी उत्पत्ति करता है और नियमविधिपक्षमें ‡ नियमविशिष्ट होकर उक्त श्रवण फलपर्यन्त नियमादृष्टको उत्पन्न करता है, और इस प्रकारका श्रवणजन्य उभयविध अदृष्ट जैसे पूर्वजन्मका स्मरणसम्पादक अदृष्ट पूर्वजन्म और तदीय वृत्तान्तके अनुभवजन्य संस्कारके इस जन्ममें उद्बोधन द्वारा पूर्वजन्म और उसके वृत्तान्तका स्मरण कराता है, वैसे ही पूर्व जन्मके श्रवण आदिसे उत्पन्न हुए संस्कारका उद्बोधन करके उस संस्कारके कारणीभूत श्रवणकी भावी जन्ममें विद्याके प्रति उपयोगिताका सम्पादन कर सकता है । * शास्त्रीय अङ्गसे रहित श्रवण अदृष्टका उत्पादक नहीं होता है, इसलिए ऐसे श्रवणको जन्मान्तरीय विद्यामें उपयोगी मानना कैसे उपपन्न हो सकता है ? यदि घटक (सम्पादक) अदृष्टके बिना जन्मान्तरीय प्रमाणोंका व्यापार जन्मान्तरीय विद्याका हेतु माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् जन्मान्तरके अनुभूत सकल पदार्थोंका स्मरण प्रसक्त होगा, यह भाव है ।


रह जाय, तो जन्मान्तरमें होती है, क्योंकि प्रतिबन्धोंके इसी जन्ममें रहते जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति होती है, यह वामदेव प्रभृतिमें देखा जाता है ।

† जिस पक्षमें श्रवणविधि अपूर्वविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है ।
‡ जिस पक्षमें श्रवणविधि नियमविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है, इन दोनोंका उपपादन प्रथम परिच्छेदमें विधिनिरूपण के प्रसङ्गमें सविस्तर किया गया है ।

अमुख्याधिकारिके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५७


उच्यते यज्ञजादृष्टजातमेतत्फलावधि ।
उत्पाद्य तेन निर्वाह्यमिति न द्वारकल्पना ॥१५॥

कहते हैं— यज्ञजन्य विविदिषोत्पादक विद्यारूप फलपर्य्यन्तस्थायी अदृष्टकी उत्पत्ति करके उसी अदृष्ट द्वारा जन्मान्तरीय श्रवण जन्मान्तरीय फलका हेतु हो सकता है, फिर श्रवणविधिजन्य अपूर्वाख्य द्वारकी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥ १५ ॥

उच्यते— अमुख्याधिकारिणाऽपि उत्पन्नविविदिषेण क्रियमाणं श्रवणं द्वारभूतविविदिषोत्पादकप्राचीनविद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानजन्यापूर्वप्रयुक्तमिति* तदे-वाऽपूर्वं विद्यारूपफलपर्यन्तं व्याप्रीयमाणं जन्मान्तरीयायामपि विद्यायां स्वकारितश्रवणस्य उपकारितां घटयतीति नाऽनुपपत्तिः। श्रवणादौ विध्य-भावपक्षे तु सन्न्यासपूर्वकं कृतस्याऽपि श्रवणस्याऽदृष्टानुत्पादकत्वात् सति प्रतिबन्धे तस्य जन्मान्तरीयविद्याहेतुत्वमित्थमेव निर्वाह्यम् ।

आचार्यैश्चैवमेवाऽऽहुरादोषपरिसङ्ख्यात् ।
आवृत्तं नियमादृष्टं निष्पाद्य फलदं यतः ॥१६॥

आचार्य विवरणकार नियमविधिपक्षमें भी उसी प्रकारका समाधान करते हैं, क्योंकि दोषके विनाशपर्य्यन्त बार बार किया हुआ श्रवण नियमादृष्टकी उत्पत्ति करके फल देनेवाला होता है ॥ १६ ॥

आचार्यास्तु नियमविधिपक्षेऽपि अयमेव निर्वाहः। श्रवणमभ्यस्यतः


इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जिसको ब्रह्मज्ञानकी इच्छा हुई है, ऐसे अमुख्य अधिकारी द्वारा क्रियमाण श्रवण—द्वारीभूत ब्रह्मविविदिषाके उत्पादक प्राचीन ( पूर्वके ) विद्याप्रयोजक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न हुए अदृष्टसे ही—उत्पन्न होता है, इसलिए वही यज्ञादिके अनुष्ठानसे जन्य अदृष्ट विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक व्यापृत होता हुआ जन्मान्तरीय विद्यामें भी अपने प्रभावसे हुए श्रवणकी उपकारिताका सम्पादन कराता है, इसलिए कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

† विवरणाचार्य कहते हैं कि नियमविधिपक्षमें भी इसी उक्त प्रकारसे


* यज्ञादिभिर्विद्यायां सम्पादनीयायां द्वारभूता या विविदिषा तस्या उत्पादकं प्राचीनञ्च यत् विद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानम् तज्जन्येत्यर्थः, स्वपदं यज्ञानुष्ठानजन्यापूर्वपरमिति भावः ।
† विवरणाचार्यका तात्पर्य यह है—श्रवणका फल है—प्रमाणकी असम्भावनाकी निवृत्ति, मननका फल है—प्रमेयकी असम्भावनाकी निवृत्ति, निदिध्यासनका फल है—विपरीतभावनाकी निवृत्ति, जिस मुख्य अधिकारीके ये तीनों श्रवण आदि त्रिविध प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप फलोत्पत्तिके कालतक आवर्त्तमान हुए हैं, उसका नियमादृष्ट उत्पन्न हुआ ही है, इस प्रकार यदि

५८
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४५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[तृतीय परिच्छेद

फलप्राप्तेर्वाक् प्रायेण तन्नियमादृष्टानुत्पत्तेः । तस्य फलपर्यन्तावृत्तिगुणक-श्रवणानुष्ठाननियमसाध्यत्वात् । नहि नियमादृष्टजनकश्रवणनियमः फलपर्यन्तमावर्तनीयस्य श्रवणस्योपक्रममात्रेण निर्वर्तितो भवति; येन तज्जन्य-नियमादृष्टस्याऽपि फलपर्यन्तश्रवणावृत्तेः प्रागेवोत्पत्तिः सम्भाव्येत । अवघात-वदावृत्तिगुणकस्यैव श्रवणस्य फलसाधनत्वेन फलसाधनपदार्थनिष्पत्तेः प्राक्


निर्वाह करना चाहिए, क्योंकि श्रवणका जो अभ्यास करता है, उसे प्रतिबन्ध-निवृत्तिरूप फलकी उत्पत्ति होनेके पूर्वमें प्रायः श्रवणनियमजन्य अदृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती है, कारण कि फलपर्यन्त श्रवणानुष्ठानकी आवृत्ति करनेसे उत्पन्न श्रवण नियमसे ही नियमादृष्ट उत्पन्न होता है, क्योंकि‡ नियमादृष्टका कारणीभूत श्रवणनियम फलनिष्पत्ति तक आवर्तनीय श्रवणके उपक्रममात्रसे उत्पन्न नहीं होता है, जिससे कि श्रवणनियमजन्य नियमादृष्ट भी फलपर्यन्त श्रवणकी आवृत्तिके पूर्वमें ही उत्पन्न हो जाय, क्योंकि अवघातकी नाईं ⁕


साधनसम्पत्तिके रहते भी प्रतिबन्धकसे विद्याकी उत्पत्ति नहीं हुई, तो पुनर्जन्मको प्राप्ति कर प्रतिबन्धोंके निरसन द्वारा फिर विचारकी अपेक्षा न करके ही विद्या उत्पन्न होती है, जैसे कि वामदेव, हिरण्यगर्भ आदिको हुई है, और जिस पुरुषको तथाकथित तीन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवण आदिकी आवृत्ति नहीं हुई है, और बीचमें मरण हुआ है, वह भले ही मुख्य अधिकारी हो, परन्तु नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए उसको दूसरे जन्ममें उन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवणादिका अभ्यास करके श्रवणादिके नियमादृष्टसे विद्या-प्रतिबन्धक पापोंके विनाश द्वारा विद्या प्राप्त होती है, इसीको भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है—

‘तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयस्संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥’

अर्थात् सच्चरित्र कुलमें जन्म प्राप्त करके पूर्वदेहसे उत्पन्न और इस शरीरमें संस्काररूपसे अनुवर्तमान बुद्धिसंयोग अर्थात् श्रवणादि कर्तव्यबुद्धिसे सम्बन्ध पाता है, इसलिए पूर्वजन्मके यत्नकी अपेक्षा इस जन्ममें सिद्धिके लिए अधिक यत्न करता है। इससे फलपर्यन्त आवृत्तिगुणसे रहित जो योगभ्रष्ट है, उसे तो नियमादृष्टके न होनेसे यज्ञ आदिसे जनित अदृष्टसे कथञ्चित् निर्वाह करना चाहिए ।


‡ नियमादृष्ट केवल श्रवणसे उत्पन्न नहीं होता है, किन्तु श्रवण-नियमसे उत्पन्न होता है, श्रवणनियम तभी हो सकता है, जबकि फलपर्यन्त श्रवणादिकी आवृत्ति की जाय, इसलिए फलकी उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणादि नियमके न होनेसे नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है।

⁕ जैसे तण्डुलकी उत्पत्तितक अवघातकी आवृत्ति करनी पड़ती है, अतः आवृत्तिविशिष्ट अवघात ही तण्डुलके प्रति जनक लोकमें देखा जाता है, आवृत्तिसे रहित नहीं देखा जाता,


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अमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५९

तन्नियमनिर्वर्तितवचनस्य निरालम्बनत्वात्, श्रवणावघाताद्युपक्रममात्रेण नियमनिष्पत्तौ तावतैव नियमशास्त्रानुष्ठानं सिद्धमिति तदनावृत्तावप्यवै-कल्यप्रसङ्गाच्चेत्याहुः।

कृच्छ्राशीतिफलस्मृत्याऽऽधानवत् कर्तृसंस्कृतेः । तद्द्वारा श्रवणं केचिज्जन्मान्तरफलं जगुः ॥ १७ ॥

श्रवणसे अस्सी कृच्छ्रका फल होता है, ऐसी स्मृति होनेके कारण आधानके समान कर्त्ताके संस्कारार्थ भी होनेसे उसी संस्कार द्वारा श्रवण जन्मान्तरका फल देनेवाला है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १७ ॥

केचित्तु दृष्टार्थस्यैव वेदान्तश्रवणस्य— 'दिने दिने तु वेदान्तश्रवणाद् भक्तिसंयुतात् । गुरुशुश्रूषया लब्धात् कृच्छ्राशीतिफलं लभेद् ॥' इत्यादिवचनप्रामाण्यात् स्वतन्त्रादृष्टोत्पादकत्वमप्यस्ति । यथा अग्नि-


आवृत्तिगुणसे युक्त श्रवण ही अपने फलके प्रति जनक होता है, इससे फलके साधन पदार्थकी—आवृत्तियुक्त श्रवणकी—उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणनियम निष्पन्न हो जाता है—यह वाक्य निरालम्बन है और श्रवण एवं अवघात आदिके उपक्रममात्रसे यदि नियमकी उत्पत्ति मानी जाय, तो उसीसे नियमशास्त्रके अनुष्ठानकी सिद्धि होनेसे उसकी आवृत्ति न करनेपर भी वैकल्य प्रसक्त नहीं होगा।

† कुछ लोग तो कहते हैं कि दृष्टार्थ ही वेदान्तश्रवण—'दिने दिने०' (गुरुशुश्रूषासे प्राप्त भक्तियुक्त वेदान्तके श्रवणसे प्रतिदिन पुरुष अस्सी कृच्छ्रका ‡ पुण्य प्राप्त करता है) इत्यादि वचन प्रमाण होनेसे—स्वतन्त्र अदृष्ट-


इसी प्रकार आवृत्तितद्विशिष्ट श्रवण ही विद्यात्मक फलके प्रति जनक होगा, यदि इसे न माना जाय, तो 'फलपर्य्यन्त श्रवणसे ही अप्राप्तांश परिपूर्णरूप नियम सम्पन्न होता है, पूर्वमें नहीं, इस प्रकारका वचन निरालम्बन अर्थात् निर्विषयक हो जायगा, यह भाव है।

† मुख्य या अमुख्य अधिकारी द्वारा प्रतिदिन किया जानेवाला वेदान्तश्रवण जैसे प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप दृष्ट फल उत्पन्न करता है, वैसे ही अदृष्टकी उत्पत्ति भी करता है, इस-लिए अदृष्टके बलसे जन्मान्तरमें विचारकी विद्योपयोगिता घट सकती है, इस अभिप्रायसे यह 'केचित्तु' का मत है, यह भाव है।

‡ यह कृच्छ्रनामक व्रत अनेक प्रकारसे होता है, इसका निर्वचन मिताक्षरा आदि धर्मशास्त्रके निबन्धोंमें अनेक प्रकारसे मिलता है।

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४६०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

संस्कारार्थस्याऽऽधानस्य पुरुषसंस्कारेषु परिगणनात् तदर्थत्वमपि, एवं वचनबलादुभयार्थत्वोपपत्तेः । तथा च प्रतिदिनश्रवणजनितादृष्टमहिम्नैवाऽऽमुष्मिकविद्योपयोगित्वं श्रवणमननादिसाधनानामित्याहुः ॥ ७ ॥

श्रवणादेरिव ज्ञानसाधनत्वं समर्थितम् ।
प्रमाणैर्भारतीतीर्थैर्निर्गुणोपास्तिकर्मणः ॥ १८ ॥

अनेक श्रुत्यादि प्रमाणोंके आधारपर श्रीभारतीतीर्थ मुनिजीने श्रवण आदिके समान निर्गुण उपासनामें भी ज्ञानकी साधनता मानी है ॥ १८ ॥

एवं 'श्रवणमननादिसाधनानुष्ठानप्रणाल्या विद्याऽवाप्तिः' इत्यस्मिन्नर्थे सर्वसम्प्रतिपन्ने स्थिते भारतीतीर्था ध्यानदीपे विद्याऽवाप्तौ उपायान्तरमप्याहुः । 'तत् कारणं साङ्ख्ययोगाभिपन्नम्' 'यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं

की उत्पत्ति करता है, जैसे × अग्निके संस्कारके लिए किया हुआ आधान पुरुषके संस्कारोंमें परिगणित होनेसे पुरुषार्थ भी है, वैसे प्रकृतमें भी अनेक वचन मिलते हैं, अतः उभयार्थता हो सकती है, इसलिए प्रतिदिन श्रवणसे उत्पन्न अदृष्टकी सामर्थ्यसे ही श्रवण, मनन आदि आमुष्मिक विद्याके प्रति उपयोगी हैं ॥ ७ ॥

उक्त प्रकारसे श्रवण, मनन और निदिध्यासनके अनुष्ठान द्वारा विद्याकी प्राप्ति होती है, इस प्रकारसे सब श्रुति और स्मृतियोंसे सम्मत अर्थके निश्चित होनेपर विद्याकी प्राप्तिमें अन्य उपायका भी ध्यानदीपमें * भारतीतीर्थ स्वामीजीने निरूपण किया है—'तत् कारणं०' (वह कारणत्वरूपसे उपलक्षित ब्रह्म साङ्ख्य और योगसे † विद्या द्वारा प्राप्त होता है) 'यत् साङ्ख्यैः०' (जिस


× जैसे 'अग्नीनादधीत' इत्यादि वाक्योंसे विहित आधान अग्निके संस्कारके लिए है, वैसे ही 'अग्न्याधेयमग्निहोत्रम्' इत्यादि पुरुष संस्कारके बोधक सूत्रमें अग्न्याधानका भी पाठ होनेसे पुरुषसंस्कारार्थ भी है, यह प्रतीत होता है, इसी प्रकार श्रवण भी उभयार्थ हो सकता है, यह भाव है।

* पञ्चदशीके नवम ध्यानदीपप्रकरणमें 'संवादिभ्रमवद् ब्रह्म' इत्यादि श्लोकोंसे योगशब्दसे कहलानेवाली उपासनासे भी ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है, इसका सविस्तर निरूपण किया गया है, अतः इस विचारका विस्तार वहींपर देखना चाहिए।

† सांख्यशब्दका अर्थ है—मनन आदिसे संस्कृत वेदान्तविचार अथवा उस विचारसे युक्त पुरुष, योगशब्दार्थ है—निर्गुण ब्रह्मकी उपासना अथवा उसका उपासक।

विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४६१


, तद्योगैरपि गम्यते' इतिश्रुतिस्मृतिदर्शनात् । यथा साङ्ख्यं नाम वेदान्तविचारः श्रवणशब्दितो मननादिसहकृतो विद्याऽवाप्त्युपायः, एवं योगशब्दितं निर्गुणब्रह्मोपासनमपि । न च निर्गुणस्योपासनमेव नाऽस्तीति शङ्क्यम् , प्रश्नोपनिषदि शैव्यप्रश्ने 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोङ्कारेण परं पुरुषमभिध्यायीत' इति निर्गुणस्यैवोपासनप्रतिपादनात् । तदनन्तरम् 'स


ब्रह्मकी प्राप्ति साङ्ख्य—श्रवण आदिसे युक्त पुरुष—करते हैं, उसी ब्रह्मकी निर्गुण ब्रह्मोपासक भी प्राप्ति करते हैं ) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतिके पर्यालोचनसे यह ज्ञात होता है कि जैसे साङ्ख्यनामक श्रवणशब्दसे कहलानेवाला मनन आदिसहकृत वेदान्तविचार ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु है, वैसे ही योगशब्दसे कहलानेवाली निर्गुणब्रह्मोपासना भी ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है। यदि शङ्का ‡ हो कि जो निर्गुण पदार्थ है, उसकी उपासना ही नहीं हो सकती। तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रश्नोपनिषद्में शैब्यके प्रश्नमें 'यः पुनरेतम्०' ( जो कि इस अकार, उकार और मकारात्मक तीन मात्राओंसे युक्त ओंकारसे सूर्यान्तर्गत परम पुरुषका ध्यान करता है ) इस श्रुतिसे निर्गुण ब्रह्मकी उपा-


‡ यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि निर्गुणपदार्थकी उपासना नहीं होती है, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'तत्कारणं साङ्ख्ययोगाभिप्रन्नम्' और 'यत्साङ्ख्यैः' इत्यादि श्रुति और स्मृतिका प्रमाणरूपसे उपन्यास किया गया है। यदि इसका उत्तर दें कि उक्त श्रुति और स्मृतिमें वर्तमान योगशब्दका अर्थ सगुणोपासना है, अतः यह शङ्का हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भिन्नविषयक उपासना और साक्षात्कारका आपसमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता है, अतः निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति निर्गुण उपासनाको ही हेतु मानना होगा। यदि इसमें भी शङ्का हो कि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वाक्यमें योगशब्दका अर्थ उपासना नहीं है, किन्तु उसके भाष्यमें योगशब्द कर्मयोगपरक माना गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वचनका वस्तुतः निर्गुणोपासनामें तात्पर्य रहते ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कर्मके विषयमें उदाहरण दिया है, इस अभिप्रायसे उक्त व्याख्यान किया है। और योगशब्दकी ध्यानमें ही रूढ़ि होनेसे वस्तुतः वह कर्मका बोधक है भी नहीं, इससे उस स्मृतिकी मूलभूत 'तत्कारणम्' इत्यादि श्रुतिमें योगशब्दकी ध्यानार्थमें भगवान् भाष्यकारने शारीरकभाष्यमें वृत्ति मानी है, अतः कर्मयोग मुख्ययोग द्वारा ब्रह्मप्राप्तिका साधन है, साक्षात् नहीं—इस अर्थको सूचन करनेके लिए भगवान्ने उक्त वचनका कर्मपरकरूपसे उदाहरण दिया है, इसलिए प्रमाणाभावकी शङ्का युक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहृत श्रुति और स्मृतिको छोड़कर अन्यत्र कहींपर भी निर्गुण उपासनाका प्रतिपादन नहीं किया गया है, अतः शङ्का उपपन्न हो सकती है।

४६२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ तृतीय परिच्छेद

एतस्माज्जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति उपासना-फलवाक्ये 'ईक्षितिकर्मत्वेन निर्दिष्टं यन्निर्गुणं ब्रह्म, तदेवोपासनावाक्येऽपि ध्यायतिकर्म, नान्यत्; ईक्षितिध्यानयोः कार्यकारणभूतयोरेकविषयत्व-नियमाद्' इत्यस्याऽर्थस्य ईक्षितिकर्माधिकरणे भाष्यकारादिभिरङ्गीकृतत्वात् । अन्यत्राऽपि तापनीयकठवल्ल्यादिश्रुत्यन्तरे निर्गुणोपास्तेः प्रपञ्चितत्वात् ।


सनाका प्रतिपादन किया गया है । और ध्यानवाक्यके अनन्तर 'स एतस्मात्०' ( इस जीवघनसे * उत्कृष्ट बुद्धिके साक्षीरूपसे हृदयाकाशमें वर्तमान निरुपाधिक पुरुषका वह ध्याता पुरुष साक्षात्कार करता है ) इस प्रकारके उपासनाके फलवोधक वाक्यमें 'ईक्षितिके कर्मरूपसे निर्दिष्ट जो निर्गुण ब्रह्म है, वही † उपासनावाक्यमें ध्यानका कर्म ( विषय ) है, अन्य नहीं, क्योंकि कार्यकारणात्मक जो ईक्षति और ध्यान है, उनका एक विषय होता है, यह नियम है', इस प्रकारसे उक्त ही अर्थका ‡ ईक्षितिकर्माधिकरणमें भगवान् भाष्यकारने भी स्वीकार किया है । तापनीय, × कठवल्ली आदि अन्य श्रुतियों-


* जीवघनः—जीवरूपो घनः—परमात्मनो मूर्तिः—घटाकाशवत् उपाधिपरिच्छिन्नश्चिदात्मा, तस्मात् जीवघनात् अर्थात् जीवरूप परमात्माकी मूर्ति ( ब्रह्मलोक ) जीवघनशब्दका अर्थ है ।
† 'परं पुरुषमभ्यध्यायीत' इस प्रकारके उपासनावाक्यमें यह अर्थ है ।
‡ 'ईक्षितिकर्मव्यपदेशात् सः' ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० १३ ) इस सूत्रके भाष्यमें इस विषयका उपपादन किया गया है, क्योंकि अन्यके ध्यानसे अन्यका साक्षात्कार नहीं देखा जाता है । इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि कल्पतरुकारके मतसे निर्गुण पदार्थकी उपासना नहीं हो सकती है, क्योंकि 'स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' इत्यादि सम्पत्तिप्रतिपादक वचनके अनुसार ध्येय पदार्थका सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण उन्होंने दिया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त सूर्यसम्पत्तिबोधक वचन अर्चिरादि मार्गका बोधक है, ऐसा व्यवस्थापन स्वयं कल्पतरुकारने चतुर्थाध्यायमें किया है । सूर्य अथवा तदन्तःस्थ ईश्वरप्राप्तिका बोधक नहीं है, और वस्तुतः कल्पतरुकारके अन्य वचनको देखनेसे और उक्त श्रुतिके मार्गघटक होनेसे सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण देनेमें तात्पर्य नहीं है, यह भी ज्ञात होता है ।
× 'देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् अणोरणीयांसमिममात्मानमोङ्कारं नो व्याचक्ष्व' ( प्रजापतिके पास जाकर देवताओंने कहा कि सूक्ष्मसे सूक्ष्म ओंकारगम्य प्रत्यगात्माको कहो ) इत्यादि तापनीयोपनिषद्की श्रुति है । 'एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म' ( यही अक्षर ब्रह्म है ) 'ॐ मित्येदक्षरमिदं सर्वम्' ( यह सब ॐकार अक्षर ही है ) 'ॐमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्' ( ओंकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए ) इस प्रकारकी क्रमशः कठवल्ली और आदिशब्दसे गृहीत माण्डूक्य और मुण्डककी श्रुतियाँ भी हैं ।


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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६३


सूत्रकृताऽप्युपास्यगुणपरिच्छेदार्थमारब्धे गुणोपसंहारपादे निर्गुणेऽपि 'आनन्दादयः प्रधानस्य'—इति सूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ११ ) भावरूपाणां ज्ञानानन्दादिगुणानाम्, 'अक्षरधियां त्ववरोधः' इत्यादिसूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३३ ) अभावरूपाणामस्थूलत्वादिगुणानां चोपसंहारस्य दर्शितत्वाच्च । ननु आनन्दादिगुणोपसंहारे उपास्यं निर्गुणमेव न स्यादिति चेद्, न; आनन्दादिभिरस्थूलत्वादिभिश्चोपलक्षितमखण्डैकरसं ब्रह्माऽस्मीति निर्गुणत्वानुपमर्देन उपासनासम्भवात् ।

में भी निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका अङ्गीकार किया गया है, सूत्रकारने भी—उपास्य गुणोंका निश्चय करनेके लिए आरब्ध गुणोपसंहार पादमें 'आनन्दादयः प्रधानस्य'* इस सूत्रसे निर्गुण ब्रह्ममें ज्ञान, आनन्द आदि भावरूप गुणोंका और 'अक्षरधियान्त्ववरोधः'† इत्यादि सूत्रसे अस्थूलत्व आदि अभावरूप धर्मोंका—उपसंहार दिखलाया है। यदि शङ्का हो कि आनन्दादि गुणोंका यदि उक्त सूत्रोंसे ब्रह्ममें उपसंहार किया गया है, तो फिर इसीसे उपास्य ब्रह्म निर्गुण नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आनन्द आदि और अस्थूलत्व आदि गुणोंसे‡ उपलक्षित अखण्डैकरस 'मैं ही ब्रह्म हूं' इस प्रकार निर्गुणत्वके अनुपमर्दसे उपासना हो सकती है। यदि शङ्का हो कि


* 'आनन्दादयः प्रधानस्य' आनन्द, सत्य, ज्ञान आदि धर्म भले ही कहींपर सुने गये हों, परन्तु उनका उपसंहार ब्रह्ममें सर्वत्र समझ लेना चाहिए, क्योंकि प्रधानभूत ब्रह्मके एक होनेसे ब्रह्मविद्या भी सब वेदान्तोंमें एक है, यह भाव है।

† यह सूत्रका एक भागमात्र है, परन्तु सूत्रका स्वरूप तो 'अक्षरधियान्त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम्' इतना बड़ा है अक्षरार्थ यह है—अक्षर ब्रह्ममें द्वैतनिषेध बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार करना चाहिए, क्योंकि द्वैतके निषेधसे सर्वत्र श्रुतियोंमें ब्रह्मका प्रतिपादन और प्रतिपाद्य ब्रह्मका एकत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञान भी समान है, जैसे पुरोडाशके अङ्गभूत औपसद मन्त्रोंका अन्यत्र श्रवण होनेपर अध्वर्युके साथ सम्बन्ध होता है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि उपास्यकोटिमें आनन्दादि गुणोंका प्रवेश नहीं किया गया है, जिससे कि उपास्य ब्रह्ममें सगुणत्वकी सिद्धि हो, किन्तु उपास्य पदार्थके निर्गुणत्व-निर्णय द्वारा केवल उपासनामें उनका उपयोगमात्र स्वीकार किया गया है, इसलिए आनन्दादि गुणोंके उपसंहारसे केवल आनन्दादिगुणवाचक पदोंका साथ उच्चारणमात्र विवक्षित है। इस परिस्थितिमें उपाधिविशिष्ट चैतन्यवाचक आनन्दादिशब्दोंसे और स्थौल्याभावविशिष्टवाचक अस्थूल आदि पदोंसे सब वाच्यार्थोंमें अनुगत अखण्डैकरस जिस ब्रह्मकी लक्षणासे प्रतीति

४६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

ननु 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति श्रुतेः न परं ब्रह्मोपास्यमिति चेत्, 'अन्यदेव तद्विदिताद्' इति श्रुतेस्तस्य वेद्यत्वस्याऽप्यसिद्ध्यापातात् । श्रुत्यन्तरेषु ब्रह्मवेदनप्रसिद्धेरवेद्यत्वश्रुतिर्वास्तवावेद्यत्वपरा चेद्, आथर्वणादौ तदुपासनाप्रसिद्धेस्तदनुपास्यत्वश्रुतिरपि वस्तुवृत्तपराऽस्तु । एवं च 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' इति श्रवणाद् येषां बुद्धिमान्द्याद्, न्यायव्युत्पादनकुशलविशिष्टगुर्वलाभाद्वा श्रवणादि न

'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि०' (बुद्धि आदिके साक्षी चैतन्यको ही ब्रह्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी उपासना होती है) इस श्रुतिसे परब्रह्म उपास्य नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अन्यदेव तद्विदितात्' (वेदन-विषयसे ब्रह्म अन्य ही है, अर्थात् ब्रह्म वेद्य नहीं है) इस श्रुतिसे ब्रह्ममें वेद्यत्वकी असिद्धि भी है। यदि शङ्का हो कि अन्य श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानकी प्रसिद्धि होनेसे अवेद्यत्वश्रुतिका भी तात्पर्य वस्तुतः अवेद्यत्वबोधनमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या आथर्वण श्रुतिमें ब्रह्मोपासनाकी प्रसिद्धि होनेसे ब्रह्मकी अनुपास्यत्वश्रुतिका भी वस्तुतः अनुपास्यत्वमें ही तात्पर्य क्यों न हो, अर्थात् ब्रह्ममें उपास्यत्व या वेद्यत्व वस्तुतः नहीं है, यही निषेधश्रुतिका तात्पर्य है, यह भाव है। निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके सप्रमाण सिद्ध होनेपर * 'श्रवणायापि०' (अनेक लोगोंको आत्माका श्रवण भी प्राप्त नहीं होता) इत्यादि श्रुतिके बलसे जिनको बुद्धिकी मन्दतासे † अथवा न्याय-


होती है 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना हो सकती है, अतः ध्यानदीपमें कहा भी है—

'आनन्दादिभिरस्थूलादिभिश्चात्माऽत्र लक्षितः ।
योऽखण्डैकरसस्सोऽहमस्मीत्येवमुपासते ॥'

अर्थात् वेदान्तोंमें आनन्दादि और अस्थूलादि शब्दोंसे जो अखण्डैकरस आत्मा लक्षित है, 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना करते हैं।

* कुछ मुमुक्षुओंको श्रवणका लाभ नहीं होता है, उसमें यह प्रमाण दिखलाते हैं। अर्थात्

† अनेक पुरुषोंको श्रवण नहीं होता, इस प्रकार श्रुतिने जो प्रतिपादन किया है, उसमें श्रुत्युक्त ये दोनों कारण हैं, अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे श्रवण नहीं होता है, अथवा कदाचित् परिष्कृत बुद्धि है, परन्तु सामग्री नहीं है, तो भी श्रवण नहीं होता, इसमें ध्यानदीपका यह श्लोक भी प्रमाण है—

'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥'