सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [तृतीय परिच्छेद |
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फलप्राप्तेर्वाक् प्रायेण तन्नियमादृष्टानुत्पत्तेः । तस्य फलपर्यन्तावृत्तिगुणक-श्रवणानुष्ठाननियमसाध्यत्वात् । नहि नियमादृष्टजनकश्रवणनियमः फलपर्यन्तमावर्तनीयस्य श्रवणस्योपक्रममात्रेण निर्वर्तितो भवति; येन तज्जन्य-नियमादृष्टस्याऽपि फलपर्यन्तश्रवणावृत्तेः प्रागेवोत्पत्तिः सम्भाव्येत । अवघात-वदावृत्तिगुणकस्यैव श्रवणस्य फलसाधनत्वेन फलसाधनपदार्थनिष्पत्तेः प्राक्
निर्वाह करना चाहिए, क्योंकि श्रवणका जो अभ्यास करता है, उसे प्रतिबन्ध-निवृत्तिरूप फलकी उत्पत्ति होनेके पूर्वमें प्रायः श्रवणनियमजन्य अदृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती है, कारण कि फलपर्यन्त श्रवणानुष्ठानकी आवृत्ति करनेसे उत्पन्न श्रवण नियमसे ही नियमादृष्ट उत्पन्न होता है, क्योंकि‡ नियमादृष्टका कारणीभूत श्रवणनियम फलनिष्पत्ति तक आवर्तनीय श्रवणके उपक्रममात्रसे उत्पन्न नहीं होता है, जिससे कि श्रवणनियमजन्य नियमादृष्ट भी फलपर्यन्त श्रवणकी आवृत्तिके पूर्वमें ही उत्पन्न हो जाय, क्योंकि अवघातकी नाईं ⁕
साधनसम्पत्तिके रहते भी प्रतिबन्धकसे विद्याकी उत्पत्ति नहीं हुई, तो पुनर्जन्मको प्राप्ति कर प्रतिबन्धोंके निरसन द्वारा फिर विचारकी अपेक्षा न करके ही विद्या उत्पन्न होती है, जैसे कि वामदेव, हिरण्यगर्भ आदिको हुई है, और जिस पुरुषको तथाकथित तीन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवण आदिकी आवृत्ति नहीं हुई है, और बीचमें मरण हुआ है, वह भले ही मुख्य अधिकारी हो, परन्तु नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए उसको दूसरे जन्ममें उन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवणादिका अभ्यास करके श्रवणादिके नियमादृष्टसे विद्या-प्रतिबन्धक पापोंके विनाश द्वारा विद्या प्राप्त होती है, इसीको भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है—
‘तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयस्संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥’
अर्थात् सच्चरित्र कुलमें जन्म प्राप्त करके पूर्वदेहसे उत्पन्न और इस शरीरमें संस्काररूपसे अनुवर्तमान बुद्धिसंयोग अर्थात् श्रवणादि कर्तव्यबुद्धिसे सम्बन्ध पाता है, इसलिए पूर्वजन्मके यत्नकी अपेक्षा इस जन्ममें सिद्धिके लिए अधिक यत्न करता है। इससे फलपर्यन्त आवृत्तिगुणसे रहित जो योगभ्रष्ट है, उसे तो नियमादृष्टके न होनेसे यज्ञ आदिसे जनित अदृष्टसे कथञ्चित् निर्वाह करना चाहिए ।
‡ नियमादृष्ट केवल श्रवणसे उत्पन्न नहीं होता है, किन्तु श्रवण-नियमसे उत्पन्न होता है, श्रवणनियम तभी हो सकता है, जबकि फलपर्यन्त श्रवणादिकी आवृत्ति की जाय, इसलिए फलकी उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणादि नियमके न होनेसे नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है।
⁕ जैसे तण्डुलकी उत्पत्तितक अवघातकी आवृत्ति करनी पड़ती है, अतः आवृत्तिविशिष्ट अवघात ही तण्डुलके प्रति जनक लोकमें देखा जाता है, आवृत्तिसे रहित नहीं देखा जाता,