भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 487

अमुख्याधिकारिके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५७


उच्यते यज्ञजादृष्टजातमेतत्फलावधि ।
उत्पाद्य तेन निर्वाह्यमिति न द्वारकल्पना ॥१५॥

कहते हैं— यज्ञजन्य विविदिषोत्पादक विद्यारूप फलपर्य्यन्तस्थायी अदृष्टकी उत्पत्ति करके उसी अदृष्ट द्वारा जन्मान्तरीय श्रवण जन्मान्तरीय फलका हेतु हो सकता है, फिर श्रवणविधिजन्य अपूर्वाख्य द्वारकी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥ १५ ॥

उच्यते— अमुख्याधिकारिणाऽपि उत्पन्नविविदिषेण क्रियमाणं श्रवणं द्वारभूतविविदिषोत्पादकप्राचीनविद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानजन्यापूर्वप्रयुक्तमिति* तदे-वाऽपूर्वं विद्यारूपफलपर्यन्तं व्याप्रीयमाणं जन्मान्तरीयायामपि विद्यायां स्वकारितश्रवणस्य उपकारितां घटयतीति नाऽनुपपत्तिः। श्रवणादौ विध्य-भावपक्षे तु सन्न्यासपूर्वकं कृतस्याऽपि श्रवणस्याऽदृष्टानुत्पादकत्वात् सति प्रतिबन्धे तस्य जन्मान्तरीयविद्याहेतुत्वमित्थमेव निर्वाह्यम् ।

आचार्यैश्चैवमेवाऽऽहुरादोषपरिसङ्ख्यात् ।
आवृत्तं नियमादृष्टं निष्पाद्य फलदं यतः ॥१६॥

आचार्य विवरणकार नियमविधिपक्षमें भी उसी प्रकारका समाधान करते हैं, क्योंकि दोषके विनाशपर्य्यन्त बार बार किया हुआ श्रवण नियमादृष्टकी उत्पत्ति करके फल देनेवाला होता है ॥ १६ ॥

आचार्यास्तु नियमविधिपक्षेऽपि अयमेव निर्वाहः। श्रवणमभ्यस्यतः


इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जिसको ब्रह्मज्ञानकी इच्छा हुई है, ऐसे अमुख्य अधिकारी द्वारा क्रियमाण श्रवण—द्वारीभूत ब्रह्मविविदिषाके उत्पादक प्राचीन ( पूर्वके ) विद्याप्रयोजक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न हुए अदृष्टसे ही—उत्पन्न होता है, इसलिए वही यज्ञादिके अनुष्ठानसे जन्य अदृष्ट विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक व्यापृत होता हुआ जन्मान्तरीय विद्यामें भी अपने प्रभावसे हुए श्रवणकी उपकारिताका सम्पादन कराता है, इसलिए कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

† विवरणाचार्य कहते हैं कि नियमविधिपक्षमें भी इसी उक्त प्रकारसे


* यज्ञादिभिर्विद्यायां सम्पादनीयायां द्वारभूता या विविदिषा तस्या उत्पादकं प्राचीनञ्च यत् विद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानम् तज्जन्येत्यर्थः, स्वपदं यज्ञानुष्ठानजन्यापूर्वपरमिति भावः ।
† विवरणाचार्यका तात्पर्य यह है—श्रवणका फल है—प्रमाणकी असम्भावनाकी निवृत्ति, मननका फल है—प्रमेयकी असम्भावनाकी निवृत्ति, निदिध्यासनका फल है—विपरीतभावनाकी निवृत्ति, जिस मुख्य अधिकारीके ये तीनों श्रवण आदि त्रिविध प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप फलोत्पत्तिके कालतक आवर्त्तमान हुए हैं, उसका नियमादृष्ट उत्पन्न हुआ ही है, इस प्रकार यदि

५८
ankurnagpal108@gmail.com