सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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मी० अ० ३ पा० ४ सू० ५१) तथा निर्णयाद्, एवममुख्याधिकारि-कृतस्यापि स्यादिति । यतश्शास्त्रीयाङ्गयुक्तं श्रवणमपूर्वविधित्वपक्षे फलपर्यन्तमपूर्वम्, नियमविधित्वपक्षे नियमादृष्टं वा जनयति । तच्च जातिस्मरत्वप्रापकादृष्टवत् प्राग्भवीयसंस्कारमुद्बोध्य तन्मूलभूतस्य विचारस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगितां घटयतीति युज्यते । शास्त्रीयाङ्गविधुरं श्रवणं नादृष्टोत्पादकमिति कुतस्तस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगित्वमुपपद्यते । घटकादृष्टं विना जन्मान्तरीयप्रमाणव्यापारस्य जन्मान्तरीयावगतिहेतुत्वोपगमे अतिप्रसङ्गात् ।
है, उसी प्रकार अमुख्य अधिकारीसे किये गये श्रवणमें भी जन्मान्तरीय विद्याकी हेतुता हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अङ्ग-संन्याससे युक्त श्रवण अर्थात् संन्यासी द्वारा अनुष्ठित श्रवण † अपूर्वविधिपक्षमें विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक अदृष्टकी उत्पत्ति करता है और नियमविधिपक्षमें ‡ नियमविशिष्ट होकर उक्त श्रवण फलपर्यन्त नियमादृष्टको उत्पन्न करता है, और इस प्रकारका श्रवणजन्य उभयविध अदृष्ट जैसे पूर्वजन्मका स्मरणसम्पादक अदृष्ट पूर्वजन्म और तदीय वृत्तान्तके अनुभवजन्य संस्कारके इस जन्ममें उद्बोधन द्वारा पूर्वजन्म और उसके वृत्तान्तका स्मरण कराता है, वैसे ही पूर्व जन्मके श्रवण आदिसे उत्पन्न हुए संस्कारका उद्बोधन करके उस संस्कारके कारणीभूत श्रवणकी भावी जन्ममें विद्याके प्रति उपयोगिताका सम्पादन कर सकता है । * शास्त्रीय अङ्गसे रहित श्रवण अदृष्टका उत्पादक नहीं होता है, इसलिए ऐसे श्रवणको जन्मान्तरीय विद्यामें उपयोगी मानना कैसे उपपन्न हो सकता है ? यदि घटक (सम्पादक) अदृष्टके बिना जन्मान्तरीय प्रमाणोंका व्यापार जन्मान्तरीय विद्याका हेतु माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् जन्मान्तरके अनुभूत सकल पदार्थोंका स्मरण प्रसक्त होगा, यह भाव है ।
रह जाय, तो जन्मान्तरमें होती है, क्योंकि प्रतिबन्धोंके इसी जन्ममें रहते जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति होती है, यह वामदेव प्रभृतिमें देखा जाता है ।
† जिस पक्षमें श्रवणविधि अपूर्वविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है ।
‡ जिस पक्षमें श्रवणविधि नियमविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है, इन दोनोंका उपपादन प्रथम परिच्छेदमें विधिनिरूपण के प्रसङ्गमें सविस्तर किया गया है ।