भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 590 में से

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पृष्ठ 485

अमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५५


श्रवणं नन्वसंन्यासं जन्मान्तरफलं कथम् ।
दृष्टार्थत्वाददृष्टस्यासाङ्गत्वेनाप्यसंभवात् ॥१४॥

संन्याससे रहित श्रवण जन्मान्तरीय फलके प्रति हेतु कैसे होगा ? क्योंकि श्रवण दृष्टार्थक है, उसका फल अदृष्ट भी नहीं हो सकता है, क्योंकि वह संन्यासरूप अङ्गसे युक्त नहीं है ॥ १४ ॥

नन्वमुख्याधिकारिणा दृष्टफलभूतवाक्यार्थावगत्यर्थमविहितशास्त्रान्तरविचारवत् क्रियमाणो वेदान्तविचारः कथं जन्मान्तरविद्याऽवाप्तावुपयुज्यते । न खलु विचारस्य दिनान्तरीयविचार्यावगतिहेतुत्वमपि युज्यते । दूरे जन्मान्तरीयतद्धेतुत्वम् । न च वाच्यं मुख्याधिकारिणा परिव्राजकेन क्रियमाणमपि श्रवणं दृष्टार्थमेव, अवगतेर्दृष्टार्थत्वात् । तस्य यथा प्रारब्धकर्मविशेषरूपप्रतिबन्धादिह जन्मनि फलमजनयतो जन्मान्तरे प्रतिबन्धकापगमेन फलजनकत्वम् 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनाद्' इत्यधिकरणे ( उ०


अब शङ्का होती है कि प्रत्यक्ष फलरूप वाक्यार्थज्ञानके लिए अमुख्य अधिकारी द्वारा किया गया वेदान्त-विचार अविहित अन्य न्याय आदि शास्त्रोंके विचारके समान भावी जन्मान्तरकी विद्यामें उपयुक्त कैसे होगा ? क्योंकि ( आजका ) विचार ( कलके ) विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति भी हेतु नहीं हो सकता है, तो फिर ( इस जन्मके ) विचारमें जन्मान्तरके विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति हेतुता कैसे हो सकती है अर्थात् कभी नहीं हो सकती । यदि कोई कहे कि जिस प्रकार मुख्याधिकारी परिव्राजकसे ( संन्यासीसे ) किये गये श्रवणका भी फल दृष्ट ही है, क्योंकि अवगति—विद्या—दृष्ट अर्थ है, और प्रारब्ध कर्मविशेषके प्रतिबन्धसे इस जन्ममें वह श्रवण यद्यपि दृष्टफलकी उत्पत्ति नहीं कर सकता है, तथापि दूसरे जन्ममें प्रतिबन्धकके निरसनसे अवश्य उसमें फलजनकता है, ॐ ऐसा 'ऐहिकमप्य०' इत्यादि अधिकरणमें निर्णय किया गया


ॐ शङ्काका भाव यह है कि जैसे मुख्य अधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण किसी प्रतिबन्धककी सामर्थ्यसे इस जन्ममें विद्योदय नहीं करता है, और जन्मान्तरमें उस प्रतिबन्धकके निरसन द्वारा विद्याके प्रति कारण होता है, वैसे ही अमुख्याधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण जन्मान्तरमें प्रतिबन्धकके विगम द्वारा विद्याके प्रति साधन हो सकता है, इस अर्थका 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात्' इस सूत्रमें निर्णय भी किया गया है, सूत्रका अर्थ है कि किसी प्रस्तुत प्रतिबन्धके न रहते इसी जन्ममें विद्या उत्पन्न होती है, यदि कोई प्रतिबन्धक

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