सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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तेषाममुख्याधिकारस्फुटीकरणात् । न च तत्र तेषां श्रवणाद्यधिकार एव नोक्तः, किन्तु तदीयकर्मणां विद्याऽनुग्राहकत्वमिति शङ्क्यम् ; 'दृष्टार्था च विद्या' इत्युदाहृततदधिकरणभाष्यविरोधात् । न च क्षत्रियवैश्ययोः सन्न्यासाभावाद् अमुख्याधिकारे तत एव देवाना-मपि श्रवणादिष्वमुख्य एवाऽधिकारः स्यात् , तथा च क्रममुक्तिफलक-सगुणविद्यया देवदेहं प्राप्य श्रवणाद्यनुतिष्ठतां विद्याप्राप्त्यर्थं सन्न्यासार्हं पुनर्ब्राह्मणजन्म वक्तव्यमिति 'ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते' 'न च पुनरावर्तते' 'अनावृत्तिश्शब्दाद्' इत्यादिश्रुतिसूत्रविरोध इति वाच्यम् , देवानामनुष्ठेयकर्मवैयग्र्याभावात् स्वत एवानन्यव्यापारत्वं सम्भवतीति क्रममुक्तिफलकसगुणविद्याभिधायिशास्त्रप्रामाण्याद्विनाऽपि संन्यासं तेषां मुख्याधिकाराभ्युपगमादित्याहुः ॥ ६ ॥
के सूत्रसे सूत्रकारने ही उनके अमुख्य अधिकारका स्पष्टीकरण किया है । यदि शङ्का हो कि विधुराधिकरणमें विधुर आदिका श्रवण आदिमें अधिकार ही नहीं कहा गया है, किन्तु उनके द्वारा किये गये कर्म विद्यानुग्राहक अर्थात् विद्योत्पादक हैं, यह कहा गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'दृष्ट प्रयोजनके लिए विद्या है' इत्यादि पूर्व कथित अन्तराधिकरणोक्त भाष्यसे विरोध होगा । यदि शङ्का हो कि क्षत्रिय और वैश्यका संन्यास न होनेसे यदि श्रवण आदिमें अधिकार मुख्य नहीं है, तो देवोंको संन्यासमें अधिकार न होनेके कारण उनका भी श्रवण आदिमें अमुख्य अधिकार ही होगा । इस परिस्थितिमें क्रमशः मुक्तिरूप फल देनेवाली सगुण विद्यासे देवताशरीरको प्राप्त करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करनेवाले जीवोंको विद्याकी प्राप्तिके लिए संन्यासयोग्य फिर ब्राह्मण जन्म होगा, यह कहना पड़ेगा, इस परिस्थितिमें 'ब्रह्मलोक०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ) 'न च पुन०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करके फिर इस लोकमें नहीं आता है ) 'अनावृत्तिः शब्दात् ०' ( उक्त दो श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि ब्रह्मलोकसे पुनः आना नहीं पड़ता है ) इत्यादि श्रुति और सूत्रके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंको विधेय कर्मोंसे व्यग्रता नहीं है, इससे स्वतः ही अनन्यव्यापारता हो सकती है, इसलिए क्रमशः मुक्ति देनेवाली सगुण विद्याका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रके प्रामाण्यसे संन्यासके बिना भी उनका श्रवणादि में अधिकार मुख्य है; ऐसा स्वीकार किया जाता है ॥६॥