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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 590 में से

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पृष्ठ 483

क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादि में अधिकार] भाषानुवादसहित ४५१


दिषु' इति 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणभाष्योक्तन्यायेन शूद्रवदप्रतिषिद्धयोस्तयोर्विधुरादीनामिव देहान्तरे विद्याप्रापकेणाऽमुख्याधिकारमात्रेण श्रवणाद्यनुमतिः । नहि 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणे विधुरादीनामङ्गीकृतश्रवणाद्यधिकारो मुख्य इति वक्तुं शक्यते; 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३९ )

अधिकृत करती है' इस प्रकारके 'अन्तरा चाऽपि' इत्यादि अधिकरणोक्त भाष्यके अभिप्रायसे शूद्रके समान अप्रतिषिद्ध क्षत्रिय और वैश्यका विधुर आदिके समान जन्मान्तरमें विद्याको× प्राप्त करानेवाले अमुख्याधिकारमात्रसे श्रवण आदिमें अनुमति दी गई है । और 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें विधुर आदि पुरुषका जो श्रवण आदिमें अधिकार स्वीकार किया गया है, वह मुख्य है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च'* इस प्रकार


संन्यासकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्रवणके प्रति संन्यास अङ्ग नहीं है, यह भाव है, यह भाष्यकी पंक्ति 'विशेषानुग्रहश्च' (ब्र० अ० ३ पा० ४ सू० ३८) इस सूत्रके अन्तिम भाष्यभागमें है ।

× तात्पर्य यह है कि मुख्य अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले श्रवण आदि जो शमदमान्वित ब्रह्मचर्य, अहिंसा, शम, दम आदिसे युक्त हैं, इसी जन्ममें प्रायः विद्याके उत्पादक हैं, और जो मुख्य अधिकारी नहीं हैं, उनके अनन्यव्यापारत्वके न होनेके कारण श्रवण आदि इस जन्ममें विद्याके उत्पादनमें योग्य नहीं हैं, किन्तु भावी अनेक जन्मोंसे विशिष्ट श्रवण आदिका सम्पादन करके अन्य देहमें विद्याकी उत्पत्ति होगी, इसलिए गौण और मुख्य अधिकारीमें महान् फलभेद है, इसमें प्रमाण स्मृति भी है—

'अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्' ।

अर्थात् अनेक जन्मोंमें सिद्ध (ज्ञानी) होकर उत्कृष्ट गतिको प्राप्त करता है ।

* 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' इस सूत्रका यह अर्थ है—अनाश्रमी पुरुषों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधनोंकी अपेक्षा आश्रमियों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधन श्रेष्ठ हैं, क्योंकि इस अर्थमें श्रुति और स्मृति प्रमाण हैं 'तेनेति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्' यह श्रुति और 'अनाश्रमी न तिष्ठेत' इत्यादि स्मृति प्रमाण है, पुण्यवान् पुरुष पुण्यसे प्राप्त ज्ञानसे ब्रह्म पाता है, यह उक्त श्रुतिका अर्थ है । इसमें पुण्यरूपसे प्रसिद्ध आश्रमधर्मोंकी ही विशेषरूपसे ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनताका प्रतिपादन किया गया है, इसलिए यद्यपि अनाश्रमी पुरुषोंसे सम्पादित धर्म 'विशेषानुग्रहश्च' इस सूत्रके अनुसार विद्याके उपयोगी हैं, तथापि उनका अपकर्ष ही प्रतीत होता है, और वह अपकर्ष विद्यार्थ श्रवण आदि कर्मोंमें विधुर आदिका अमुख्य अधिकार होनेसे ही है, क्योंकि ऐसा माननेमें और कोई कारण नहीं है और अनाश्रमित्वकी निन्दा भी की गई है, इससे कर्म और ज्ञानमें मुख्याधिकारी निन्दाका पात्र नहीं है, यह सूत्र और भाष्यका अभिप्राय है, यह भाव है ।

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