सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ तृतीय परिच्छेद |
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किं तु 'दृष्टार्था च विद्या प्रतिषेधाभावमात्रेणाऽप्यर्थिनमधिकरोति श्रवणा- नहीं है । किन्तु 'प्रतिषेधाभावमात्रसे‡ दृष्टार्थ विद्या श्रवण आदिमें अर्थी पुरुषको
संन्यासाश्रममें ही हो सकती है, इस प्रकार संन्यासाधिकरण भाष्यमें प्रतिपादन किया गया है, इसलिए ब्रह्मनिष्ठाका संन्यासके धर्मरूपसे विधान होनेके कारण ब्राह्मणसंन्यासीकी ब्रह्मनिष्ठा धर्म है, अतः संन्यासीका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार है, क्योंकि ब्रह्मनिष्ठाके व्यतिक्रमसे प्रत्यवाय सुना जाता है—
'काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः ।
स याति नरकान् घोरान् महारौरवसंज्ञकान् ॥' ( परमहंसोपनिषत् )
अर्थात् संन्यास आश्रमका धारण करनेवाला पुरुष ज्ञानरहित होकर अपनी बाह्य, और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको यदि काबूमें नहीं रखता है, तो वह महारौरव आदि नरकोंमें गिरता है । और जैसे संन्यासीकी ज्ञाननिष्ठाका विधान करनेवाली 'संन्यस्य श्रवणं कुर्यात्' 'गच्छतस्तिष्ठतो वाऽपि' इत्यादि अनेक स्मृतियां हैं, वैसे ही उनका परित्याग करनेसे वह पतित होता है, इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृतियां भी अनेक हैं—
'त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् ।
श्रुत्या विधीयते यस्मात्तत्यागी पतितो भवेत् ॥
नित्यं कर्म परित्यज्य वेदान्तश्रवणं विना ।
वर्तमानस्तु संन्यासी पतत्येव न संशयः ॥'
अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यघटक त्वंपदके विवेकके लिए सब कर्मोंके त्यागरूप संन्यासका श्रुतिसे विधान किया गया है, इसलिए संन्यासके त्याग देनेसे पतित होता है, अपने नित्यकर्मका परित्याग करके वेदान्तश्रवण आदि कुछ नहीं करता है, तो वह संन्यासी पतित हो जाता है । और अपने आश्रमधर्मका परित्याग करनेसे महान् अनर्थ होता है । इस विषयमें सच्चिदानन्द आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णने अपने साक्षात् श्रीमुखसे भी कहा है कि—
'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥'
अर्थात् अपना स्वकीय धर्म भले ही विगुण हो, परन्तु दूसरे धर्मोसे अच्छा ही है, अतः अपने धर्ममें मरना भी अच्छा है, परन्तु परधर्मका अनुष्ठान भयावह है । इन सब प्रमाणोंके ऊपर दृष्टि रखते हुए भगवान् भाष्यकारने उस संन्यासीके लिए, जो संन्यासी अनन्यभावनासे श्रवण आदि नहीं करता है, पातित्यका भी सूचन किया है—'शम, दम आदिसे वर्धित ब्रह्मनिष्ठा ही संन्यासीका स्वकीय आश्रमविहित धर्म है, और अन्य लोगोंका यज्ञ आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान न करनेसे उनको प्रत्यवाय होता है' इत्यादि । इससे श्रवण आदिका भिक्षुके प्रति विधान होनेसे और उनके न करनेसे प्रत्यवायका श्रवण होनेसे संन्यासीका ही श्रवणादिमें मुख्य अधिकार है, और संन्यास-आश्रमसे जो विधुर हैं, उनके प्रति श्रवण आदिका विधान न होनेसे और प्रत्यवायकी श्रुति न होनेसे उनका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार नहीं है ।
‡ दृष्टफल—अज्ञाननिवृत्तिरूप दृष्ट फल है—जिसका, ऐसी विद्या प्रतिषेधाभावमात्रसे अर्थात् विघातक निषेधके अभावसे पुरुषको श्रवण आदिमें प्रवृत्त कराती है, श्रवणके लिए