सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें' क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४५१
अपरे तु 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रुत्युदिता यस्य ब्रह्मणि संस्था—समाप्तिः—अनन्यव्यापारत्वरूपं तन्निष्ठत्वम्—तस्य श्रवणादिषु मुख्याधिकारः।
'गच्छतस्तिष्ठतो वाऽपि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा।
न विचारपरं चेतो यस्याऽसौ मृत उच्यते॥'
'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद् वेदान्तचिन्तया।'
इत्यादिस्मृतिषु सर्वदा विचारविधानात्। सा च ब्रह्मणि संस्था विना सन्न्यासमाश्रमान्तरस्थस्य न सम्भवति; स्वस्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानवैयग्र्यात् इति सन्न्यासरहितयोः क्षत्रियवैश्ययोर्न मुख्यः श्रवणाद्यधिकारः।
*कुछ लोग कहते हैं कि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस श्रुतिसे प्रतिपादित जिसकी ब्रह्ममें संस्था—समाप्ति अर्थात् दूसरे सब व्यापारको छोड़कर केवल ब्रह्ममें निष्ठा है, उसीका श्रवणमें अधिकार है।
'गच्छतः०' (जागते, सोते, जाते और बैठते हुए जिस पुरुषका चित्त ब्रह्म-विचारसे युक्त नहीं है, उसे मरा हुआ समझना चाहिए, सोने और मरने तक वेदान्तविचारसे ही समयका यापन करना चाहिए) इत्यादि स्मृतिसे सदा ब्रह्म-विचारका ही विधान किया गया है। और इस प्रकारकी जो ब्रह्ममें संस्था है, वह संन्यासके बिना अन्य आश्रममें रहकर नहीं हो सकती, क्योंकि अपने अपने आश्रममें विहित कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे चित्तकी व्यग्रता हो सकती है, अतः संन्याससे रहित क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार†
है, इसलिए व्यभिचार होनेके कारण संन्यास श्रवणमात्रका अङ्ग नहीं है, किन्तु ब्राह्मणकर्तृक श्रवणका ही संन्यासका अङ्ग है, अतः क्षत्रिय और वैश्यका संन्यासमें अधिकार न रहनेपर भी श्रवण आदिका निर्वाह हो सकता है, यह भाव है।
✪ देवकर्तृकश्रवणमें संन्यासाश्रमका यदि व्यभिचार है, तो उसका निवारण करनेके लिए त्रैवर्णिक मनुष्योंके श्रवणमें ही संन्यासाश्रमको हेतु मानना चाहिए, ब्राह्मणमात्रकर्तृक श्रवणमें संन्यासाश्रमकी हेतुता नहीं माननी चाहिए, क्योंकि वैसे संकोचमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि आगे ही कहा है कि चार आश्रमोंमें संन्यासाश्रमका परिग्रह करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए, और आश्रमविभाग तीनों वर्णोंके लिए साधारण है, केवल ब्राह्मणके लिए नहीं है। इस अवस्थामें ब्राह्मण-संन्यासीके समान संन्याससे हीन क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणमें अधिकार कैसे हो सकता है, इस अस्वरससे यह 'अपरे तु' मत कहा जाता है।
† तात्पर्य यह है 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस श्रुतिसे पाण्डित्य श्रुतिके समान ब्रह्मनिष्ठा-धर्मवाले संन्यासाश्रमका विधान होता है, क्योंकि ब्रह्मसंस्थशब्दसे कहलानेवाली ब्रह्मनिष्ठा