सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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एवाऽधिकारनियमनिराकरणात् । एवं च ब्राह्मणानामेव श्रवणाद्यनुष्ठाने सन्न्यासोऽङ्गम् ; क्षत्रियवैश्ययोस्तन्निरपेक्षः श्रवणाद्यधिकार इति तयोः श्रवणाद्यनुष्ठाननिर्वाहः । नहि सन्न्यासस्य श्रवणापेक्षितत्वपक्षे श्रवणमात्रस्य तदपेक्षा नियन्तुं शक्यते; क्रममुक्तिफलकसगुणोपासनया देवभावं प्राप्तस्य श्रवणादौ सन्न्यासनिरपेक्षस्याऽवश्यं वक्तव्यत्वाद् देवानां कर्मानुष्ठानाप्रसक्त्या तत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य तेष्वसम्भवादित्याहुः ।
ब्रह्मसंस्थश्रुतेर्न्यासी मुख्यः श्रवणविद्ययोः ।
क्षत्रियादेरनुमतिं जन्मान्तरफलां परे ॥ १३ ॥
'ब्रह्मसंस्थो' इत्यादि श्रुतिसे श्रवण और विद्यामें संन्यासी ही मुख्य अधिकारी हैं, और क्षत्रिय आदिकी जन्मान्तरमें फलके लिए श्रवणकी अनुमति है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १३ ॥
नियमका खण्डन किया गया है । एवञ्च अर्थात् श्रवणके अङ्गरूपसे अथवा अधिकारीके विशेषणरूपसे विद्याके साधन विविदिषासंन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है, ऐसा सिद्ध होनेपर यह फलित होता है—ब्राह्मणोंके ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें संन्यास अङ्ग है और क्षत्रिय एवं वैश्यका संन्यासके बिना ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें अधिकार है, अतः उनके श्रवण आदिका अनुष्ठान उपपन्न हो सकता है, और संन्यासके श्रवणापेक्षितत्वपक्षमें अर्थात् श्रवणके अङ्गरूपसे या अधिकारीके विशेषणरूपसे श्रवण संन्यासकी अपेक्षा रखता है, इस पक्षमें श्रवणमात्रको ( अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि सभीके श्रवणको ) संन्यासकी अपेक्षा है, ऐसा नियम भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि क्रमसे मुक्ति जिसका फल है, ऐसी सगुण उपासनासे देवभावको† जो प्राप्त हुआ है, उसके श्रवण आदिमें संन्यासकी अपेक्षा अवश्य कहनी होगी, परन्तु देवताओंको कर्मानुष्ठानकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः उसका त्यागरूप संन्यास हो ही नहीं सकता है ।
† देवभावको प्राप्त हुए सगुण उपासकके श्रवणमें संन्यासका व्यभिचार है, यह कथन अयुक्त है, क्योंकि उसे सगुण विद्याकी सामर्थ्यसे ही निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार हो सकता है, इसलिए श्रवण आदिका अनुष्ठान व्यर्थ है, यदि इस प्रकार शङ्का हो, तो अयुक्त है, क्योंकि देवताधिकरणमें देवभावको प्राप्त हुए उपासकको लेकर श्रवणादिमें देव आदिके अधिकारका निरूपण किया गया है, अतः उनको भी श्रवण आदिके बिना विद्या नहीं हो सकती