सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार ] भाषानुवादसहित ४४९
सङ्ग्राह्यत्वात् । यत्तु सन्न्यासस्य सर्वाधिकारित्वेन वार्त्तिकवचनं तत् 'विद्वत्संन्यासविषयम्, न तु आतुरविविदिषासन्यासे भाष्याभिप्रायविरुद्ध-सर्वाधिकारप्रतिपादनपरम् । 'सर्वाधिकारविच्छेदि विज्ञानं चेदुपैयते । कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात् ॥' इत्यनन्तरश्लोकेन ब्रह्मज्ञानोदयानन्तरं जीवन्मुक्तिकाले विद्वत्संन्यास
नहीं हो। और जो कि 'संन्यासमें सभी त्रैवर्णिकोंका अधिकार है' इस अर्थकी पुष्टिमें पूर्वमें वार्त्तिककारका वचन दिया गया है' वह तो विद्वत्संन्यासविषयक है, आतुर और विविदिषासंन्यासमें भाष्यसे असम्मत सभीके‡ अधिकारका प्रतिपादनविषयक नहीं है।
※'सर्वाधिकार०' (क्षत्रिय और वैश्यको यदि सर्वाधिकारविच्छेदी विज्ञान हो जाय, तो सम्पूर्ण कर्मकी निवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें भी विविदिषासंन्यासके समान ब्राह्मणोंका अधिकार है, यह नियम किस बलसे कर सकते हैं? अर्थात् किसी प्रमाणके बलसे नहीं कर सकते हैं' इस प्रकारके पीछेके श्लोकसे ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके बाद जीवन्मुक्तिकालमें विद्वत्संन्यासमें ही अधिकारके
भाष्यविरुद्ध अर्थमें माना जाय, तो संन्यासका सर्वसाधारणरूपसे प्रतिपादन करनेवाले स्मृतिवचनके समान वार्त्तिकवचन भी हेय-त्याज्य होगा, अतः वार्त्तिकवचन भी भाष्यके अविरुद्ध अर्थमें ही पर्यवसन्न है, इसी अभिप्रायसे 'तद् विद्वत्संन्यासविषयम्' इस अग्रिम मूलका उल्लेख किया गया है।
* विविदिषासंन्यासमें सभीका अधिकार नहीं है, इसमें यह दूसरा भी हेतु है, तात्पर्य यह है—क्षत्रिय और वैश्यके तत्त्वज्ञानका अधिकार है या नहीं? यदि नहीं है, तो जनक प्रभृतिके तत्त्वज्ञानके प्रतिपादक अनेक वचन विरुद्ध होंगे। यदि है, तो तत्त्वज्ञानसे कर्माधिकार प्रयोजक वर्णाश्रमादि अध्यासकी निवृत्ति होनेसे सकलकर्मनिवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें क्षत्रिय और वैश्यके अधिकारका वारण नहीं कर सकते हैं, अतः विविदिषासंन्यासके समान विद्वत्संन्यासमें भी ब्राह्मणका ही अधिकार है, यह नियम नहीं बनेगा, विविदिषासंन्यास उसको कहते हैं—जिसका कि इस जन्ममें या जन्मान्तरमें अनुष्ठित वेदानुवचन आदिसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानकी इच्छासे ग्रहण किया जाय अर्थात् जिसमें दण्ड आदिका ग्रहण किया जाता है, ऐसा परमहंसाश्रम। और विद्वत्संन्यास उसे कहते हैं—जिसका कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे परतत्त्वको जानकर ग्रहण किया जाता है, जैसे कि याज्ञवल्क्य प्रभृतिने ग्रहण किया था !
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