सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
|---|
अन्ये त्वनेकेषु सन्न्यासविधिवाक्येषु ब्राह्मणग्रहणात् उदाहृतजावालश्रुतौ सन्न्यासविधिवाक्ये ब्राह्मणग्रहणाभावेऽपि श्रुत्यन्तरसिद्धं ब्राह्मणाधिकारमेव सिद्धं कृत्वा 'सन्न्यासावस्थायाममयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मणः' इति ब्राह्मणपरामर्शाच्च ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासाधिकारः । विरोधाधिकरणन्यायेन ( पू० मी० अ० १ पा० ३ अधि० २ ) श्रुत्यविरुद्धस्यैव स्मृत्यर्थस्य
-भाष्यका अनुसरण करनेवाले कई लोग कहते हैं कि संन्यासके विधायक अनेक वाक्योंमें ब्राह्मणशब्दके ग्रहणसे 'यदि वेतरथा' इत्यादि जावालश्रुतिके संन्यासविधायक वाक्यमें ब्राह्मणग्रहणके न होनेपर भी अन्य श्रुतिसे सिद्ध अर्थात् 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' इत्यादि श्रुतिसे ब्राह्मणका अधिकार निश्चित करके 'संन्यासावस्थायाम्' ( संन्यासावस्थामें यज्ञोपवीत न होनेके कारण वह कैसे ब्राह्मण* हो सकता है ? ) इस प्रकार ब्राह्मणका परामर्श करके संन्यासमें ब्राह्मणके ही अधिकारका प्रतिपादन किया गया है । क्योंकि विरोधाधिकरणन्यायसे† उसी स्मृतिके अर्थका परिग्रहण करना चाहिए, जो श्रुतिसे विरुद्ध
* अर्थात् तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदि ही ब्राह्मणत्वके व्यञ्जक हैं, अतः तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदिके न होनेसे यह परमहंस संन्यासी ब्राह्मण कैसे हो सकता है, यह आक्षेपका अभिप्राय है, यदि प्रकृतमें क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यास विवक्षित होता, तो 'कथं ब्राह्मणः' इसके समान 'कथं क्षत्रियः' 'कथं वैश्यः' ऐसा भी सुना जाता, परन्तु नहीं सुना जाता है, अतः उनका संन्यासमें अधिकार नहीं है, यह समुदितका भाव है ।
† इस अधिकरणमें श्रुति और स्मृतिके विरोधमें श्रुतिका ही प्रामाण्य अङ्गीकार किया गया है, जैसे कि ऐन्द्र यागमें सुना जाता है कि 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' और 'औदुम्बरी सर्वा वेष्टयितव्या' पूर्वोक्त श्रुति है और दूसरी कात्यायनस्मृति है। औदुम्बरीसे उदुम्बरकी शाखा अथवा उदुम्बरकी बनाई हुई पशु बन्धनके लिए स्थूणा—यूप—विवक्षित है, इस अवस्थामें दोनोंका एक समय यागमें अनुष्ठान नहीं हो सकता, क्योंकि यदि स्मृतिके अनुसार औदुम्बरीका वस्त्रसे वेष्टन करेंगे, तो उसका स्पर्श नहीं हो सकेगा, श्रुतिके अनुसार स्पर्श माने, तो वेष्टन नहीं होगा, इसपर सिद्धान्त किया गया है—'श्रुत्या स्मृतिर्बाध्यते' अर्थात् श्रुतिसे स्मृतिका बाध होता है, इससे कात्यायनस्मृतिका उक्त श्रुतिसे बाध होगा, क्योंकि स्मृतिका प्रामाण्य श्रुतिमूलक है, स्वतः नहीं, और उक्त स्मृतिसे श्रुतिकी कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' इत्यादि श्रुतिसे उसकी कल्पकत्वशक्ति व्याहत होगी, प्रकृतमें भी 'तस्माद् ब्राह्मणः' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासके अनुरोधसे 'ब्राह्मण संन्यास लेकर पाण्डित्य आदिका अनुष्ठान करे' इस प्रकारके वाक्यार्थका लाभ होनेसे 'विविदिषु द्वारा क्रियमाण विद्धार्थ संन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है' यह भगवान् वार्तिककारका मत है, यदि वार्तिकवचनका तात्पर्य