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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
४५२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

किं तु 'दृष्टार्था च विद्या प्रतिषेधाभावमात्रेणाऽप्यर्थिनमधिकरोति श्रवणा- नहीं है । किन्तु 'प्रतिषेधाभावमात्रसे‡ दृष्टार्थ विद्या श्रवण आदिमें अर्थी पुरुषको

संन्यासाश्रममें ही हो सकती है, इस प्रकार संन्यासाधिकरण भाष्यमें प्रतिपादन किया गया है, इसलिए ब्रह्मनिष्ठाका संन्यासके धर्मरूपसे विधान होनेके कारण ब्राह्मणसंन्यासीकी ब्रह्मनिष्ठा धर्म है, अतः संन्यासीका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार है, क्योंकि ब्रह्मनिष्ठाके व्यतिक्रमसे प्रत्यवाय सुना जाता है—

'काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः ।
स याति नरकान् घोरान् महारौरवसंज्ञकान् ॥' ( परमहंसोपनिषत् )

अर्थात् संन्यास आश्रमका धारण करनेवाला पुरुष ज्ञानरहित होकर अपनी बाह्य, और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको यदि काबूमें नहीं रखता है, तो वह महारौरव आदि नरकोंमें गिरता है । और जैसे संन्यासीकी ज्ञाननिष्ठाका विधान करनेवाली 'संन्यस्य श्रवणं कुर्यात्' 'गच्छतस्तिष्ठतो वाऽपि' इत्यादि अनेक स्मृतियां हैं, वैसे ही उनका परित्याग करनेसे वह पतित होता है, इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृतियां भी अनेक हैं—

'त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् ।
श्रुत्या विधीयते यस्मात्तत्यागी पतितो भवेत् ॥
नित्यं कर्म परित्यज्य वेदान्तश्रवणं विना ।
वर्तमानस्तु संन्यासी पतत्येव न संशयः ॥'

अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यघटक त्वंपदके विवेकके लिए सब कर्मोंके त्यागरूप संन्यासका श्रुतिसे विधान किया गया है, इसलिए संन्यासके त्याग देनेसे पतित होता है, अपने नित्यकर्मका परित्याग करके वेदान्तश्रवण आदि कुछ नहीं करता है, तो वह संन्यासी पतित हो जाता है । और अपने आश्रमधर्मका परित्याग करनेसे महान् अनर्थ होता है । इस विषयमें सच्चिदानन्द आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णने अपने साक्षात् श्रीमुखसे भी कहा है कि—

'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥'

अर्थात् अपना स्वकीय धर्म भले ही विगुण हो, परन्तु दूसरे धर्मोसे अच्छा ही है, अतः अपने धर्ममें मरना भी अच्छा है, परन्तु परधर्मका अनुष्ठान भयावह है । इन सब प्रमाणोंके ऊपर दृष्टि रखते हुए भगवान् भाष्यकारने उस संन्यासीके लिए, जो संन्यासी अनन्यभावनासे श्रवण आदि नहीं करता है, पातित्यका भी सूचन किया है—'शम, दम आदिसे वर्धित ब्रह्मनिष्ठा ही संन्यासीका स्वकीय आश्रमविहित धर्म है, और अन्य लोगोंका यज्ञ आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान न करनेसे उनको प्रत्यवाय होता है' इत्यादि । इससे श्रवण आदिका भिक्षुके प्रति विधान होनेसे और उनके न करनेसे प्रत्यवायका श्रवण होनेसे संन्यासीका ही श्रवणादिमें मुख्य अधिकार है, और संन्यास-आश्रमसे जो विधुर हैं, उनके प्रति श्रवण आदिका विधान न होनेसे और प्रत्यवायकी श्रुति न होनेसे उनका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार नहीं है ।

‡ दृष्टफल—अज्ञाननिवृत्तिरूप दृष्ट फल है—जिसका, ऐसी विद्या प्रतिषेधाभावमात्रसे अर्थात् विघातक निषेधके अभावसे पुरुषको श्रवण आदिमें प्रवृत्त कराती है, श्रवणके लिए

क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादि में अधिकार] भाषानुवादसहित ४५१


दिषु' इति 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणभाष्योक्तन्यायेन शूद्रवदप्रतिषिद्धयोस्तयोर्विधुरादीनामिव देहान्तरे विद्याप्रापकेणाऽमुख्याधिकारमात्रेण श्रवणाद्यनुमतिः । नहि 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणे विधुरादीनामङ्गीकृतश्रवणाद्यधिकारो मुख्य इति वक्तुं शक्यते; 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३९ )

अधिकृत करती है' इस प्रकारके 'अन्तरा चाऽपि' इत्यादि अधिकरणोक्त भाष्यके अभिप्रायसे शूद्रके समान अप्रतिषिद्ध क्षत्रिय और वैश्यका विधुर आदिके समान जन्मान्तरमें विद्याको× प्राप्त करानेवाले अमुख्याधिकारमात्रसे श्रवण आदिमें अनुमति दी गई है । और 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें विधुर आदि पुरुषका जो श्रवण आदिमें अधिकार स्वीकार किया गया है, वह मुख्य है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च'* इस प्रकार


संन्यासकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्रवणके प्रति संन्यास अङ्ग नहीं है, यह भाव है, यह भाष्यकी पंक्ति 'विशेषानुग्रहश्च' (ब्र० अ० ३ पा० ४ सू० ३८) इस सूत्रके अन्तिम भाष्यभागमें है ।

× तात्पर्य यह है कि मुख्य अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले श्रवण आदि जो शमदमान्वित ब्रह्मचर्य, अहिंसा, शम, दम आदिसे युक्त हैं, इसी जन्ममें प्रायः विद्याके उत्पादक हैं, और जो मुख्य अधिकारी नहीं हैं, उनके अनन्यव्यापारत्वके न होनेके कारण श्रवण आदि इस जन्ममें विद्याके उत्पादनमें योग्य नहीं हैं, किन्तु भावी अनेक जन्मोंसे विशिष्ट श्रवण आदिका सम्पादन करके अन्य देहमें विद्याकी उत्पत्ति होगी, इसलिए गौण और मुख्य अधिकारीमें महान् फलभेद है, इसमें प्रमाण स्मृति भी है—

'अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्' ।

अर्थात् अनेक जन्मोंमें सिद्ध (ज्ञानी) होकर उत्कृष्ट गतिको प्राप्त करता है ।

* 'अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च' इस सूत्रका यह अर्थ है—अनाश्रमी पुरुषों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधनोंकी अपेक्षा आश्रमियों द्वारा अनुष्ठित विद्यासाधन श्रेष्ठ हैं, क्योंकि इस अर्थमें श्रुति और स्मृति प्रमाण हैं 'तेनेति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्' यह श्रुति और 'अनाश्रमी न तिष्ठेत' इत्यादि स्मृति प्रमाण है, पुण्यवान् पुरुष पुण्यसे प्राप्त ज्ञानसे ब्रह्म पाता है, यह उक्त श्रुतिका अर्थ है । इसमें पुण्यरूपसे प्रसिद्ध आश्रमधर्मोंकी ही विशेषरूपसे ब्रह्मप्राप्तिके प्रति साधनताका प्रतिपादन किया गया है, इसलिए यद्यपि अनाश्रमी पुरुषोंसे सम्पादित धर्म 'विशेषानुग्रहश्च' इस सूत्रके अनुसार विद्याके उपयोगी हैं, तथापि उनका अपकर्ष ही प्रतीत होता है, और वह अपकर्ष विद्यार्थ श्रवण आदि कर्मोंमें विधुर आदिका अमुख्य अधिकार होनेसे ही है, क्योंकि ऐसा माननेमें और कोई कारण नहीं है और अनाश्रमित्वकी निन्दा भी की गई है, इससे कर्म और ज्ञानमें मुख्याधिकारी निन्दाका पात्र नहीं है, यह सूत्र और भाष्यका अभिप्राय है, यह भाव है ।

४५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

तेषाममुख्याधिकारस्फुटीकरणात् । न च तत्र तेषां श्रवणाद्यधिकार एव नोक्तः, किन्तु तदीयकर्मणां विद्याऽनुग्राहकत्वमिति शङ्क्यम् ; 'दृष्टार्था च विद्या' इत्युदाहृततदधिकरणभाष्यविरोधात् । न च क्षत्रियवैश्ययोः सन्न्यासाभावाद् अमुख्याधिकारे तत एव देवाना-मपि श्रवणादिष्वमुख्य एवाऽधिकारः स्यात् , तथा च क्रममुक्तिफलक-सगुणविद्यया देवदेहं प्राप्य श्रवणाद्यनुतिष्ठतां विद्याप्राप्त्यर्थं सन्न्यासार्हं पुनर्ब्राह्मणजन्म वक्तव्यमिति 'ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते' 'न च पुनरावर्तते' 'अनावृत्तिश्शब्दाद्' इत्यादिश्रुतिसूत्रविरोध इति वाच्यम् , देवानामनुष्ठेयकर्मवैयग्र्याभावात् स्वत एवानन्यव्यापारत्वं सम्भवतीति क्रममुक्तिफलकसगुणविद्याभिधायिशास्त्रप्रामाण्याद्विनाऽपि संन्यासं तेषां मुख्याधिकाराभ्युपगमादित्याहुः ॥ ६ ॥


के सूत्रसे सूत्रकारने ही उनके अमुख्य अधिकारका स्पष्टीकरण किया है । यदि शङ्का हो कि विधुराधिकरणमें विधुर आदिका श्रवण आदिमें अधिकार ही नहीं कहा गया है, किन्तु उनके द्वारा किये गये कर्म विद्यानुग्राहक अर्थात् विद्योत्पादक हैं, यह कहा गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'दृष्ट प्रयोजनके लिए विद्या है' इत्यादि पूर्व कथित अन्तराधिकरणोक्त भाष्यसे विरोध होगा । यदि शङ्का हो कि क्षत्रिय और वैश्यका संन्यास न होनेसे यदि श्रवण आदिमें अधिकार मुख्य नहीं है, तो देवोंको संन्यासमें अधिकार न होनेके कारण उनका भी श्रवण आदिमें अमुख्य अधिकार ही होगा । इस परिस्थितिमें क्रमशः मुक्तिरूप फल देनेवाली सगुण विद्यासे देवताशरीरको प्राप्त करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करनेवाले जीवोंको विद्याकी प्राप्तिके लिए संन्यासयोग्य फिर ब्राह्मण जन्म होगा, यह कहना पड़ेगा, इस परिस्थितिमें 'ब्रह्मलोक०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करता है ) 'न च पुन०' ( ब्रह्मलोक प्राप्त करके फिर इस लोकमें नहीं आता है ) 'अनावृत्तिः शब्दात् ०' ( उक्त दो श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि ब्रह्मलोकसे पुनः आना नहीं पड़ता है ) इत्यादि श्रुति और सूत्रके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंको विधेय कर्मोंसे व्यग्रता नहीं है, इससे स्वतः ही अनन्यव्यापारता हो सकती है, इसलिए क्रमशः मुक्ति देनेवाली सगुण विद्याका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रके प्रामाण्यसे संन्यासके बिना भी उनका श्रवणादि में अधिकार मुख्य है; ऐसा स्वीकार किया जाता है ॥६॥

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अमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५५


श्रवणं नन्वसंन्यासं जन्मान्तरफलं कथम् ।
दृष्टार्थत्वाददृष्टस्यासाङ्गत्वेनाप्यसंभवात् ॥१४॥

संन्याससे रहित श्रवण जन्मान्तरीय फलके प्रति हेतु कैसे होगा ? क्योंकि श्रवण दृष्टार्थक है, उसका फल अदृष्ट भी नहीं हो सकता है, क्योंकि वह संन्यासरूप अङ्गसे युक्त नहीं है ॥ १४ ॥

नन्वमुख्याधिकारिणा दृष्टफलभूतवाक्यार्थावगत्यर्थमविहितशास्त्रान्तरविचारवत् क्रियमाणो वेदान्तविचारः कथं जन्मान्तरविद्याऽवाप्तावुपयुज्यते । न खलु विचारस्य दिनान्तरीयविचार्यावगतिहेतुत्वमपि युज्यते । दूरे जन्मान्तरीयतद्धेतुत्वम् । न च वाच्यं मुख्याधिकारिणा परिव्राजकेन क्रियमाणमपि श्रवणं दृष्टार्थमेव, अवगतेर्दृष्टार्थत्वात् । तस्य यथा प्रारब्धकर्मविशेषरूपप्रतिबन्धादिह जन्मनि फलमजनयतो जन्मान्तरे प्रतिबन्धकापगमेन फलजनकत्वम् 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनाद्' इत्यधिकरणे ( उ०


अब शङ्का होती है कि प्रत्यक्ष फलरूप वाक्यार्थज्ञानके लिए अमुख्य अधिकारी द्वारा किया गया वेदान्त-विचार अविहित अन्य न्याय आदि शास्त्रोंके विचारके समान भावी जन्मान्तरकी विद्यामें उपयुक्त कैसे होगा ? क्योंकि ( आजका ) विचार ( कलके ) विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति भी हेतु नहीं हो सकता है, तो फिर ( इस जन्मके ) विचारमें जन्मान्तरके विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति हेतुता कैसे हो सकती है अर्थात् कभी नहीं हो सकती । यदि कोई कहे कि जिस प्रकार मुख्याधिकारी परिव्राजकसे ( संन्यासीसे ) किये गये श्रवणका भी फल दृष्ट ही है, क्योंकि अवगति—विद्या—दृष्ट अर्थ है, और प्रारब्ध कर्मविशेषके प्रतिबन्धसे इस जन्ममें वह श्रवण यद्यपि दृष्टफलकी उत्पत्ति नहीं कर सकता है, तथापि दूसरे जन्ममें प्रतिबन्धकके निरसनसे अवश्य उसमें फलजनकता है, ॐ ऐसा 'ऐहिकमप्य०' इत्यादि अधिकरणमें निर्णय किया गया


ॐ शङ्काका भाव यह है कि जैसे मुख्य अधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण किसी प्रतिबन्धककी सामर्थ्यसे इस जन्ममें विद्योदय नहीं करता है, और जन्मान्तरमें उस प्रतिबन्धकके निरसन द्वारा विद्याके प्रति कारण होता है, वैसे ही अमुख्याधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण जन्मान्तरमें प्रतिबन्धकके विगम द्वारा विद्याके प्रति साधन हो सकता है, इस अर्थका 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात्' इस सूत्रमें निर्णय भी किया गया है, सूत्रका अर्थ है कि किसी प्रस्तुत प्रतिबन्धके न रहते इसी जन्ममें विद्या उत्पन्न होती है, यदि कोई प्रतिबन्धक

४५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

मी० अ० ३ पा० ४ सू० ५१) तथा निर्णयाद्, एवममुख्याधिकारि-कृतस्यापि स्यादिति । यतश्शास्त्रीयाङ्गयुक्तं श्रवणमपूर्वविधित्वपक्षे फलपर्यन्तमपूर्वम्, नियमविधित्वपक्षे नियमादृष्टं वा जनयति । तच्च जातिस्मरत्वप्रापकादृष्टवत् प्राग्भवीयसंस्कारमुद्बोध्य तन्मूलभूतस्य विचारस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगितां घटयतीति युज्यते । शास्त्रीयाङ्गविधुरं श्रवणं नादृष्टोत्पादकमिति कुतस्तस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगित्वमुपपद्यते । घटकादृष्टं विना जन्मान्तरीयप्रमाणव्यापारस्य जन्मान्तरीयावगतिहेतुत्वोपगमे अतिप्रसङ्गात् ।


है, उसी प्रकार अमुख्य अधिकारीसे किये गये श्रवणमें भी जन्मान्तरीय विद्याकी हेतुता हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अङ्ग-संन्याससे युक्त श्रवण अर्थात् संन्यासी द्वारा अनुष्ठित श्रवण † अपूर्वविधिपक्षमें विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक अदृष्टकी उत्पत्ति करता है और नियमविधिपक्षमें ‡ नियमविशिष्ट होकर उक्त श्रवण फलपर्यन्त नियमादृष्टको उत्पन्न करता है, और इस प्रकारका श्रवणजन्य उभयविध अदृष्ट जैसे पूर्वजन्मका स्मरणसम्पादक अदृष्ट पूर्वजन्म और तदीय वृत्तान्तके अनुभवजन्य संस्कारके इस जन्ममें उद्बोधन द्वारा पूर्वजन्म और उसके वृत्तान्तका स्मरण कराता है, वैसे ही पूर्व जन्मके श्रवण आदिसे उत्पन्न हुए संस्कारका उद्बोधन करके उस संस्कारके कारणीभूत श्रवणकी भावी जन्ममें विद्याके प्रति उपयोगिताका सम्पादन कर सकता है । * शास्त्रीय अङ्गसे रहित श्रवण अदृष्टका उत्पादक नहीं होता है, इसलिए ऐसे श्रवणको जन्मान्तरीय विद्यामें उपयोगी मानना कैसे उपपन्न हो सकता है ? यदि घटक (सम्पादक) अदृष्टके बिना जन्मान्तरीय प्रमाणोंका व्यापार जन्मान्तरीय विद्याका हेतु माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् जन्मान्तरके अनुभूत सकल पदार्थोंका स्मरण प्रसक्त होगा, यह भाव है ।


रह जाय, तो जन्मान्तरमें होती है, क्योंकि प्रतिबन्धोंके इसी जन्ममें रहते जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति होती है, यह वामदेव प्रभृतिमें देखा जाता है ।

† जिस पक्षमें श्रवणविधि अपूर्वविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है ।
‡ जिस पक्षमें श्रवणविधि नियमविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है, इन दोनोंका उपपादन प्रथम परिच्छेदमें विधिनिरूपण के प्रसङ्गमें सविस्तर किया गया है ।

अमुख्याधिकारिके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५७


उच्यते यज्ञजादृष्टजातमेतत्फलावधि ।
उत्पाद्य तेन निर्वाह्यमिति न द्वारकल्पना ॥१५॥

कहते हैं— यज्ञजन्य विविदिषोत्पादक विद्यारूप फलपर्य्यन्तस्थायी अदृष्टकी उत्पत्ति करके उसी अदृष्ट द्वारा जन्मान्तरीय श्रवण जन्मान्तरीय फलका हेतु हो सकता है, फिर श्रवणविधिजन्य अपूर्वाख्य द्वारकी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥ १५ ॥

उच्यते— अमुख्याधिकारिणाऽपि उत्पन्नविविदिषेण क्रियमाणं श्रवणं द्वारभूतविविदिषोत्पादकप्राचीनविद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानजन्यापूर्वप्रयुक्तमिति* तदे-वाऽपूर्वं विद्यारूपफलपर्यन्तं व्याप्रीयमाणं जन्मान्तरीयायामपि विद्यायां स्वकारितश्रवणस्य उपकारितां घटयतीति नाऽनुपपत्तिः। श्रवणादौ विध्य-भावपक्षे तु सन्न्यासपूर्वकं कृतस्याऽपि श्रवणस्याऽदृष्टानुत्पादकत्वात् सति प्रतिबन्धे तस्य जन्मान्तरीयविद्याहेतुत्वमित्थमेव निर्वाह्यम् ।

आचार्यैश्चैवमेवाऽऽहुरादोषपरिसङ्ख्यात् ।
आवृत्तं नियमादृष्टं निष्पाद्य फलदं यतः ॥१६॥

आचार्य विवरणकार नियमविधिपक्षमें भी उसी प्रकारका समाधान करते हैं, क्योंकि दोषके विनाशपर्य्यन्त बार बार किया हुआ श्रवण नियमादृष्टकी उत्पत्ति करके फल देनेवाला होता है ॥ १६ ॥

आचार्यास्तु नियमविधिपक्षेऽपि अयमेव निर्वाहः। श्रवणमभ्यस्यतः


इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जिसको ब्रह्मज्ञानकी इच्छा हुई है, ऐसे अमुख्य अधिकारी द्वारा क्रियमाण श्रवण—द्वारीभूत ब्रह्मविविदिषाके उत्पादक प्राचीन ( पूर्वके ) विद्याप्रयोजक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न हुए अदृष्टसे ही—उत्पन्न होता है, इसलिए वही यज्ञादिके अनुष्ठानसे जन्य अदृष्ट विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक व्यापृत होता हुआ जन्मान्तरीय विद्यामें भी अपने प्रभावसे हुए श्रवणकी उपकारिताका सम्पादन कराता है, इसलिए कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

† विवरणाचार्य कहते हैं कि नियमविधिपक्षमें भी इसी उक्त प्रकारसे


* यज्ञादिभिर्विद्यायां सम्पादनीयायां द्वारभूता या विविदिषा तस्या उत्पादकं प्राचीनञ्च यत् विद्यार्थयज्ञाद्यनुष्ठानम् तज्जन्येत्यर्थः, स्वपदं यज्ञानुष्ठानजन्यापूर्वपरमिति भावः ।
† विवरणाचार्यका तात्पर्य यह है—श्रवणका फल है—प्रमाणकी असम्भावनाकी निवृत्ति, मननका फल है—प्रमेयकी असम्भावनाकी निवृत्ति, निदिध्यासनका फल है—विपरीतभावनाकी निवृत्ति, जिस मुख्य अधिकारीके ये तीनों श्रवण आदि त्रिविध प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप फलोत्पत्तिके कालतक आवर्त्तमान हुए हैं, उसका नियमादृष्ट उत्पन्न हुआ ही है, इस प्रकार यदि

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४५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[तृतीय परिच्छेद

फलप्राप्तेर्वाक् प्रायेण तन्नियमादृष्टानुत्पत्तेः । तस्य फलपर्यन्तावृत्तिगुणक-श्रवणानुष्ठाननियमसाध्यत्वात् । नहि नियमादृष्टजनकश्रवणनियमः फलपर्यन्तमावर्तनीयस्य श्रवणस्योपक्रममात्रेण निर्वर्तितो भवति; येन तज्जन्य-नियमादृष्टस्याऽपि फलपर्यन्तश्रवणावृत्तेः प्रागेवोत्पत्तिः सम्भाव्येत । अवघात-वदावृत्तिगुणकस्यैव श्रवणस्य फलसाधनत्वेन फलसाधनपदार्थनिष्पत्तेः प्राक्


निर्वाह करना चाहिए, क्योंकि श्रवणका जो अभ्यास करता है, उसे प्रतिबन्ध-निवृत्तिरूप फलकी उत्पत्ति होनेके पूर्वमें प्रायः श्रवणनियमजन्य अदृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती है, कारण कि फलपर्यन्त श्रवणानुष्ठानकी आवृत्ति करनेसे उत्पन्न श्रवण नियमसे ही नियमादृष्ट उत्पन्न होता है, क्योंकि‡ नियमादृष्टका कारणीभूत श्रवणनियम फलनिष्पत्ति तक आवर्तनीय श्रवणके उपक्रममात्रसे उत्पन्न नहीं होता है, जिससे कि श्रवणनियमजन्य नियमादृष्ट भी फलपर्यन्त श्रवणकी आवृत्तिके पूर्वमें ही उत्पन्न हो जाय, क्योंकि अवघातकी नाईं ⁕


साधनसम्पत्तिके रहते भी प्रतिबन्धकसे विद्याकी उत्पत्ति नहीं हुई, तो पुनर्जन्मको प्राप्ति कर प्रतिबन्धोंके निरसन द्वारा फिर विचारकी अपेक्षा न करके ही विद्या उत्पन्न होती है, जैसे कि वामदेव, हिरण्यगर्भ आदिको हुई है, और जिस पुरुषको तथाकथित तीन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवण आदिकी आवृत्ति नहीं हुई है, और बीचमें मरण हुआ है, वह भले ही मुख्य अधिकारी हो, परन्तु नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए उसको दूसरे जन्ममें उन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवणादिका अभ्यास करके श्रवणादिके नियमादृष्टसे विद्या-प्रतिबन्धक पापोंके विनाश द्वारा विद्या प्राप्त होती है, इसीको भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है—

‘तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयस्संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥’

अर्थात् सच्चरित्र कुलमें जन्म प्राप्त करके पूर्वदेहसे उत्पन्न और इस शरीरमें संस्काररूपसे अनुवर्तमान बुद्धिसंयोग अर्थात् श्रवणादि कर्तव्यबुद्धिसे सम्बन्ध पाता है, इसलिए पूर्वजन्मके यत्नकी अपेक्षा इस जन्ममें सिद्धिके लिए अधिक यत्न करता है। इससे फलपर्यन्त आवृत्तिगुणसे रहित जो योगभ्रष्ट है, उसे तो नियमादृष्टके न होनेसे यज्ञ आदिसे जनित अदृष्टसे कथञ्चित् निर्वाह करना चाहिए ।


‡ नियमादृष्ट केवल श्रवणसे उत्पन्न नहीं होता है, किन्तु श्रवण-नियमसे उत्पन्न होता है, श्रवणनियम तभी हो सकता है, जबकि फलपर्यन्त श्रवणादिकी आवृत्ति की जाय, इसलिए फलकी उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणादि नियमके न होनेसे नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है।

⁕ जैसे तण्डुलकी उत्पत्तितक अवघातकी आवृत्ति करनी पड़ती है, अतः आवृत्तिविशिष्ट अवघात ही तण्डुलके प्रति जनक लोकमें देखा जाता है, आवृत्तिसे रहित नहीं देखा जाता,


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अमुख्याधिकारीके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भाषानुवादसहित ४५९

तन्नियमनिर्वर्तितवचनस्य निरालम्बनत्वात्, श्रवणावघाताद्युपक्रममात्रेण नियमनिष्पत्तौ तावतैव नियमशास्त्रानुष्ठानं सिद्धमिति तदनावृत्तावप्यवै-कल्यप्रसङ्गाच्चेत्याहुः।

कृच्छ्राशीतिफलस्मृत्याऽऽधानवत् कर्तृसंस्कृतेः । तद्द्वारा श्रवणं केचिज्जन्मान्तरफलं जगुः ॥ १७ ॥

श्रवणसे अस्सी कृच्छ्रका फल होता है, ऐसी स्मृति होनेके कारण आधानके समान कर्त्ताके संस्कारार्थ भी होनेसे उसी संस्कार द्वारा श्रवण जन्मान्तरका फल देनेवाला है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १७ ॥

केचित्तु दृष्टार्थस्यैव वेदान्तश्रवणस्य— 'दिने दिने तु वेदान्तश्रवणाद् भक्तिसंयुतात् । गुरुशुश्रूषया लब्धात् कृच्छ्राशीतिफलं लभेद् ॥' इत्यादिवचनप्रामाण्यात् स्वतन्त्रादृष्टोत्पादकत्वमप्यस्ति । यथा अग्नि-


आवृत्तिगुणसे युक्त श्रवण ही अपने फलके प्रति जनक होता है, इससे फलके साधन पदार्थकी—आवृत्तियुक्त श्रवणकी—उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणनियम निष्पन्न हो जाता है—यह वाक्य निरालम्बन है और श्रवण एवं अवघात आदिके उपक्रममात्रसे यदि नियमकी उत्पत्ति मानी जाय, तो उसीसे नियमशास्त्रके अनुष्ठानकी सिद्धि होनेसे उसकी आवृत्ति न करनेपर भी वैकल्य प्रसक्त नहीं होगा।

† कुछ लोग तो कहते हैं कि दृष्टार्थ ही वेदान्तश्रवण—'दिने दिने०' (गुरुशुश्रूषासे प्राप्त भक्तियुक्त वेदान्तके श्रवणसे प्रतिदिन पुरुष अस्सी कृच्छ्रका ‡ पुण्य प्राप्त करता है) इत्यादि वचन प्रमाण होनेसे—स्वतन्त्र अदृष्ट-


इसी प्रकार आवृत्तितद्विशिष्ट श्रवण ही विद्यात्मक फलके प्रति जनक होगा, यदि इसे न माना जाय, तो 'फलपर्य्यन्त श्रवणसे ही अप्राप्तांश परिपूर्णरूप नियम सम्पन्न होता है, पूर्वमें नहीं, इस प्रकारका वचन निरालम्बन अर्थात् निर्विषयक हो जायगा, यह भाव है।

† मुख्य या अमुख्य अधिकारी द्वारा प्रतिदिन किया जानेवाला वेदान्तश्रवण जैसे प्रतिबन्धककी निवृत्तिरूप दृष्ट फल उत्पन्न करता है, वैसे ही अदृष्टकी उत्पत्ति भी करता है, इस-लिए अदृष्टके बलसे जन्मान्तरमें विचारकी विद्योपयोगिता घट सकती है, इस अभिप्रायसे यह 'केचित्तु' का मत है, यह भाव है।

‡ यह कृच्छ्रनामक व्रत अनेक प्रकारसे होता है, इसका निर्वचन मिताक्षरा आदि धर्मशास्त्रके निबन्धोंमें अनेक प्रकारसे मिलता है।

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४६०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ तृतीय परिच्छेद

संस्कारार्थस्याऽऽधानस्य पुरुषसंस्कारेषु परिगणनात् तदर्थत्वमपि, एवं वचनबलादुभयार्थत्वोपपत्तेः । तथा च प्रतिदिनश्रवणजनितादृष्टमहिम्नैवाऽऽमुष्मिकविद्योपयोगित्वं श्रवणमननादिसाधनानामित्याहुः ॥ ७ ॥

श्रवणादेरिव ज्ञानसाधनत्वं समर्थितम् ।
प्रमाणैर्भारतीतीर्थैर्निर्गुणोपास्तिकर्मणः ॥ १८ ॥

अनेक श्रुत्यादि प्रमाणोंके आधारपर श्रीभारतीतीर्थ मुनिजीने श्रवण आदिके समान निर्गुण उपासनामें भी ज्ञानकी साधनता मानी है ॥ १८ ॥

एवं 'श्रवणमननादिसाधनानुष्ठानप्रणाल्या विद्याऽवाप्तिः' इत्यस्मिन्नर्थे सर्वसम्प्रतिपन्ने स्थिते भारतीतीर्था ध्यानदीपे विद्याऽवाप्तौ उपायान्तरमप्याहुः । 'तत् कारणं साङ्ख्ययोगाभिपन्नम्' 'यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं

की उत्पत्ति करता है, जैसे × अग्निके संस्कारके लिए किया हुआ आधान पुरुषके संस्कारोंमें परिगणित होनेसे पुरुषार्थ भी है, वैसे प्रकृतमें भी अनेक वचन मिलते हैं, अतः उभयार्थता हो सकती है, इसलिए प्रतिदिन श्रवणसे उत्पन्न अदृष्टकी सामर्थ्यसे ही श्रवण, मनन आदि आमुष्मिक विद्याके प्रति उपयोगी हैं ॥ ७ ॥

उक्त प्रकारसे श्रवण, मनन और निदिध्यासनके अनुष्ठान द्वारा विद्याकी प्राप्ति होती है, इस प्रकारसे सब श्रुति और स्मृतियोंसे सम्मत अर्थके निश्चित होनेपर विद्याकी प्राप्तिमें अन्य उपायका भी ध्यानदीपमें * भारतीतीर्थ स्वामीजीने निरूपण किया है—'तत् कारणं०' (वह कारणत्वरूपसे उपलक्षित ब्रह्म साङ्ख्य और योगसे † विद्या द्वारा प्राप्त होता है) 'यत् साङ्ख्यैः०' (जिस


× जैसे 'अग्नीनादधीत' इत्यादि वाक्योंसे विहित आधान अग्निके संस्कारके लिए है, वैसे ही 'अग्न्याधेयमग्निहोत्रम्' इत्यादि पुरुष संस्कारके बोधक सूत्रमें अग्न्याधानका भी पाठ होनेसे पुरुषसंस्कारार्थ भी है, यह प्रतीत होता है, इसी प्रकार श्रवण भी उभयार्थ हो सकता है, यह भाव है।

* पञ्चदशीके नवम ध्यानदीपप्रकरणमें 'संवादिभ्रमवद् ब्रह्म' इत्यादि श्लोकोंसे योगशब्दसे कहलानेवाली उपासनासे भी ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है, इसका सविस्तर निरूपण किया गया है, अतः इस विचारका विस्तार वहींपर देखना चाहिए।

† सांख्यशब्दका अर्थ है—मनन आदिसे संस्कृत वेदान्तविचार अथवा उस विचारसे युक्त पुरुष, योगशब्दार्थ है—निर्गुण ब्रह्मकी उपासना अथवा उसका उपासक।

विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४६१


, तद्योगैरपि गम्यते' इतिश्रुतिस्मृतिदर्शनात् । यथा साङ्ख्यं नाम वेदान्तविचारः श्रवणशब्दितो मननादिसहकृतो विद्याऽवाप्त्युपायः, एवं योगशब्दितं निर्गुणब्रह्मोपासनमपि । न च निर्गुणस्योपासनमेव नाऽस्तीति शङ्क्यम् , प्रश्नोपनिषदि शैव्यप्रश्ने 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोङ्कारेण परं पुरुषमभिध्यायीत' इति निर्गुणस्यैवोपासनप्रतिपादनात् । तदनन्तरम् 'स


ब्रह्मकी प्राप्ति साङ्ख्य—श्रवण आदिसे युक्त पुरुष—करते हैं, उसी ब्रह्मकी निर्गुण ब्रह्मोपासक भी प्राप्ति करते हैं ) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतिके पर्यालोचनसे यह ज्ञात होता है कि जैसे साङ्ख्यनामक श्रवणशब्दसे कहलानेवाला मनन आदिसहकृत वेदान्तविचार ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु है, वैसे ही योगशब्दसे कहलानेवाली निर्गुणब्रह्मोपासना भी ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है। यदि शङ्का ‡ हो कि जो निर्गुण पदार्थ है, उसकी उपासना ही नहीं हो सकती। तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रश्नोपनिषद्में शैब्यके प्रश्नमें 'यः पुनरेतम्०' ( जो कि इस अकार, उकार और मकारात्मक तीन मात्राओंसे युक्त ओंकारसे सूर्यान्तर्गत परम पुरुषका ध्यान करता है ) इस श्रुतिसे निर्गुण ब्रह्मकी उपा-


‡ यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि निर्गुणपदार्थकी उपासना नहीं होती है, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'तत्कारणं साङ्ख्ययोगाभिप्रन्नम्' और 'यत्साङ्ख्यैः' इत्यादि श्रुति और स्मृतिका प्रमाणरूपसे उपन्यास किया गया है। यदि इसका उत्तर दें कि उक्त श्रुति और स्मृतिमें वर्तमान योगशब्दका अर्थ सगुणोपासना है, अतः यह शङ्का हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भिन्नविषयक उपासना और साक्षात्कारका आपसमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता है, अतः निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति निर्गुण उपासनाको ही हेतु मानना होगा। यदि इसमें भी शङ्का हो कि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वाक्यमें योगशब्दका अर्थ उपासना नहीं है, किन्तु उसके भाष्यमें योगशब्द कर्मयोगपरक माना गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वचनका वस्तुतः निर्गुणोपासनामें तात्पर्य रहते ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कर्मके विषयमें उदाहरण दिया है, इस अभिप्रायसे उक्त व्याख्यान किया है। और योगशब्दकी ध्यानमें ही रूढ़ि होनेसे वस्तुतः वह कर्मका बोधक है भी नहीं, इससे उस स्मृतिकी मूलभूत 'तत्कारणम्' इत्यादि श्रुतिमें योगशब्दकी ध्यानार्थमें भगवान् भाष्यकारने शारीरकभाष्यमें वृत्ति मानी है, अतः कर्मयोग मुख्ययोग द्वारा ब्रह्मप्राप्तिका साधन है, साक्षात् नहीं—इस अर्थको सूचन करनेके लिए भगवान्ने उक्त वचनका कर्मपरकरूपसे उदाहरण दिया है, इसलिए प्रमाणाभावकी शङ्का युक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहृत श्रुति और स्मृतिको छोड़कर अन्यत्र कहींपर भी निर्गुण उपासनाका प्रतिपादन नहीं किया गया है, अतः शङ्का उपपन्न हो सकती है।

४६२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ तृतीय परिच्छेद

एतस्माज्जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति उपासना-फलवाक्ये 'ईक्षितिकर्मत्वेन निर्दिष्टं यन्निर्गुणं ब्रह्म, तदेवोपासनावाक्येऽपि ध्यायतिकर्म, नान्यत्; ईक्षितिध्यानयोः कार्यकारणभूतयोरेकविषयत्व-नियमाद्' इत्यस्याऽर्थस्य ईक्षितिकर्माधिकरणे भाष्यकारादिभिरङ्गीकृतत्वात् । अन्यत्राऽपि तापनीयकठवल्ल्यादिश्रुत्यन्तरे निर्गुणोपास्तेः प्रपञ्चितत्वात् ।


सनाका प्रतिपादन किया गया है । और ध्यानवाक्यके अनन्तर 'स एतस्मात्०' ( इस जीवघनसे * उत्कृष्ट बुद्धिके साक्षीरूपसे हृदयाकाशमें वर्तमान निरुपाधिक पुरुषका वह ध्याता पुरुष साक्षात्कार करता है ) इस प्रकारके उपासनाके फलवोधक वाक्यमें 'ईक्षितिके कर्मरूपसे निर्दिष्ट जो निर्गुण ब्रह्म है, वही † उपासनावाक्यमें ध्यानका कर्म ( विषय ) है, अन्य नहीं, क्योंकि कार्यकारणात्मक जो ईक्षति और ध्यान है, उनका एक विषय होता है, यह नियम है', इस प्रकारसे उक्त ही अर्थका ‡ ईक्षितिकर्माधिकरणमें भगवान् भाष्यकारने भी स्वीकार किया है । तापनीय, × कठवल्ली आदि अन्य श्रुतियों-


* जीवघनः—जीवरूपो घनः—परमात्मनो मूर्तिः—घटाकाशवत् उपाधिपरिच्छिन्नश्चिदात्मा, तस्मात् जीवघनात् अर्थात् जीवरूप परमात्माकी मूर्ति ( ब्रह्मलोक ) जीवघनशब्दका अर्थ है ।
† 'परं पुरुषमभ्यध्यायीत' इस प्रकारके उपासनावाक्यमें यह अर्थ है ।
‡ 'ईक्षितिकर्मव्यपदेशात् सः' ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० १३ ) इस सूत्रके भाष्यमें इस विषयका उपपादन किया गया है, क्योंकि अन्यके ध्यानसे अन्यका साक्षात्कार नहीं देखा जाता है । इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि कल्पतरुकारके मतसे निर्गुण पदार्थकी उपासना नहीं हो सकती है, क्योंकि 'स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' इत्यादि सम्पत्तिप्रतिपादक वचनके अनुसार ध्येय पदार्थका सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण उन्होंने दिया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त सूर्यसम्पत्तिबोधक वचन अर्चिरादि मार्गका बोधक है, ऐसा व्यवस्थापन स्वयं कल्पतरुकारने चतुर्थाध्यायमें किया है । सूर्य अथवा तदन्तःस्थ ईश्वरप्राप्तिका बोधक नहीं है, और वस्तुतः कल्पतरुकारके अन्य वचनको देखनेसे और उक्त श्रुतिके मार्गघटक होनेसे सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण देनेमें तात्पर्य नहीं है, यह भी ज्ञात होता है ।
× 'देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् अणोरणीयांसमिममात्मानमोङ्कारं नो व्याचक्ष्व' ( प्रजापतिके पास जाकर देवताओंने कहा कि सूक्ष्मसे सूक्ष्म ओंकारगम्य प्रत्यगात्माको कहो ) इत्यादि तापनीयोपनिषद्की श्रुति है । 'एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म' ( यही अक्षर ब्रह्म है ) 'ॐ मित्येदक्षरमिदं सर्वम्' ( यह सब ॐकार अक्षर ही है ) 'ॐमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्' ( ओंकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए ) इस प्रकारकी क्रमशः कठवल्ली और आदिशब्दसे गृहीत माण्डूक्य और मुण्डककी श्रुतियाँ भी हैं ।


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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६३


सूत्रकृताऽप्युपास्यगुणपरिच्छेदार्थमारब्धे गुणोपसंहारपादे निर्गुणेऽपि 'आनन्दादयः प्रधानस्य'—इति सूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ११ ) भावरूपाणां ज्ञानानन्दादिगुणानाम्, 'अक्षरधियां त्ववरोधः' इत्यादिसूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३३ ) अभावरूपाणामस्थूलत्वादिगुणानां चोपसंहारस्य दर्शितत्वाच्च । ननु आनन्दादिगुणोपसंहारे उपास्यं निर्गुणमेव न स्यादिति चेद्, न; आनन्दादिभिरस्थूलत्वादिभिश्चोपलक्षितमखण्डैकरसं ब्रह्माऽस्मीति निर्गुणत्वानुपमर्देन उपासनासम्भवात् ।

में भी निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका अङ्गीकार किया गया है, सूत्रकारने भी—उपास्य गुणोंका निश्चय करनेके लिए आरब्ध गुणोपसंहार पादमें 'आनन्दादयः प्रधानस्य'* इस सूत्रसे निर्गुण ब्रह्ममें ज्ञान, आनन्द आदि भावरूप गुणोंका और 'अक्षरधियान्त्ववरोधः'† इत्यादि सूत्रसे अस्थूलत्व आदि अभावरूप धर्मोंका—उपसंहार दिखलाया है। यदि शङ्का हो कि आनन्दादि गुणोंका यदि उक्त सूत्रोंसे ब्रह्ममें उपसंहार किया गया है, तो फिर इसीसे उपास्य ब्रह्म निर्गुण नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आनन्द आदि और अस्थूलत्व आदि गुणोंसे‡ उपलक्षित अखण्डैकरस 'मैं ही ब्रह्म हूं' इस प्रकार निर्गुणत्वके अनुपमर्दसे उपासना हो सकती है। यदि शङ्का हो कि


* 'आनन्दादयः प्रधानस्य' आनन्द, सत्य, ज्ञान आदि धर्म भले ही कहींपर सुने गये हों, परन्तु उनका उपसंहार ब्रह्ममें सर्वत्र समझ लेना चाहिए, क्योंकि प्रधानभूत ब्रह्मके एक होनेसे ब्रह्मविद्या भी सब वेदान्तोंमें एक है, यह भाव है।

† यह सूत्रका एक भागमात्र है, परन्तु सूत्रका स्वरूप तो 'अक्षरधियान्त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम्' इतना बड़ा है अक्षरार्थ यह है—अक्षर ब्रह्ममें द्वैतनिषेध बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार करना चाहिए, क्योंकि द्वैतके निषेधसे सर्वत्र श्रुतियोंमें ब्रह्मका प्रतिपादन और प्रतिपाद्य ब्रह्मका एकत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञान भी समान है, जैसे पुरोडाशके अङ्गभूत औपसद मन्त्रोंका अन्यत्र श्रवण होनेपर अध्वर्युके साथ सम्बन्ध होता है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि उपास्यकोटिमें आनन्दादि गुणोंका प्रवेश नहीं किया गया है, जिससे कि उपास्य ब्रह्ममें सगुणत्वकी सिद्धि हो, किन्तु उपास्य पदार्थके निर्गुणत्व-निर्णय द्वारा केवल उपासनामें उनका उपयोगमात्र स्वीकार किया गया है, इसलिए आनन्दादि गुणोंके उपसंहारसे केवल आनन्दादिगुणवाचक पदोंका साथ उच्चारणमात्र विवक्षित है। इस परिस्थितिमें उपाधिविशिष्ट चैतन्यवाचक आनन्दादिशब्दोंसे और स्थौल्याभावविशिष्टवाचक अस्थूल आदि पदोंसे सब वाच्यार्थोंमें अनुगत अखण्डैकरस जिस ब्रह्मकी लक्षणासे प्रतीति

४६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

ननु 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति श्रुतेः न परं ब्रह्मोपास्यमिति चेत्, 'अन्यदेव तद्विदिताद्' इति श्रुतेस्तस्य वेद्यत्वस्याऽप्यसिद्ध्यापातात् । श्रुत्यन्तरेषु ब्रह्मवेदनप्रसिद्धेरवेद्यत्वश्रुतिर्वास्तवावेद्यत्वपरा चेद्, आथर्वणादौ तदुपासनाप्रसिद्धेस्तदनुपास्यत्वश्रुतिरपि वस्तुवृत्तपराऽस्तु । एवं च 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' इति श्रवणाद् येषां बुद्धिमान्द्याद्, न्यायव्युत्पादनकुशलविशिष्टगुर्वलाभाद्वा श्रवणादि न

'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि०' (बुद्धि आदिके साक्षी चैतन्यको ही ब्रह्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी उपासना होती है) इस श्रुतिसे परब्रह्म उपास्य नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अन्यदेव तद्विदितात्' (वेदन-विषयसे ब्रह्म अन्य ही है, अर्थात् ब्रह्म वेद्य नहीं है) इस श्रुतिसे ब्रह्ममें वेद्यत्वकी असिद्धि भी है। यदि शङ्का हो कि अन्य श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानकी प्रसिद्धि होनेसे अवेद्यत्वश्रुतिका भी तात्पर्य वस्तुतः अवेद्यत्वबोधनमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या आथर्वण श्रुतिमें ब्रह्मोपासनाकी प्रसिद्धि होनेसे ब्रह्मकी अनुपास्यत्वश्रुतिका भी वस्तुतः अनुपास्यत्वमें ही तात्पर्य क्यों न हो, अर्थात् ब्रह्ममें उपास्यत्व या वेद्यत्व वस्तुतः नहीं है, यही निषेधश्रुतिका तात्पर्य है, यह भाव है। निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके सप्रमाण सिद्ध होनेपर * 'श्रवणायापि०' (अनेक लोगोंको आत्माका श्रवण भी प्राप्त नहीं होता) इत्यादि श्रुतिके बलसे जिनको बुद्धिकी मन्दतासे † अथवा न्याय-


होती है 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना हो सकती है, अतः ध्यानदीपमें कहा भी है—

'आनन्दादिभिरस्थूलादिभिश्चात्माऽत्र लक्षितः ।
योऽखण्डैकरसस्सोऽहमस्मीत्येवमुपासते ॥'

अर्थात् वेदान्तोंमें आनन्दादि और अस्थूलादि शब्दोंसे जो अखण्डैकरस आत्मा लक्षित है, 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना करते हैं।

* कुछ मुमुक्षुओंको श्रवणका लाभ नहीं होता है, उसमें यह प्रमाण दिखलाते हैं। अर्थात्

† अनेक पुरुषोंको श्रवण नहीं होता, इस प्रकार श्रुतिने जो प्रतिपादन किया है, उसमें श्रुत्युक्त ये दोनों कारण हैं, अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे श्रवण नहीं होता है, अथवा कदाचित् परिष्कृत बुद्धि है, परन्तु सामग्री नहीं है, तो भी श्रवण नहीं होता, इसमें ध्यानदीपका यह श्लोक भी प्रमाण है—

'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥'

विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६५


सम्भवति, तेषामध्ययनगृहीतैः वेदान्तैरापाततोऽधिगमितब्रह्मात्मभावानां तद्विचारं विनैव प्रश्नोपनिषदाद्युक्तमार्षग्रन्थेषु ब्राह्मवासिष्ठादिकल्पेषु पञ्चीकरणादिषु चानेकशाखाविप्रकीर्णसर्वार्थोपसंहारेण कल्पसूत्रेष्वग्निहोत्रादिविधोरिवानुष्ठानप्रकारं निर्गुणोपासनं सम्प्रदायमात्रविद्द्भ्यो गुरुभ्योऽवधार्य तदनुष्ठानात् क्रमेणोपास्यभूतनिर्गुणब्रह्मसाक्षात्कारः सम्पद्यते। अवि-


व्युत्पत्तिके सम्पादनमें कुशल आचार्यके प्राप्त न होनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते, अध्ययनसम्पादित वेदान्तोंसे सामान्यतः जीवब्रह्मैक्य जाननेवाले उन पुरुषोंको—उसके विचारके बिना ही जैसे अनेक शाखाओंमें विप्रकीर्ण-विशकलित-रूपसे उपलब्ध पदार्थोंके उपसंहारसे अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान प्रकार निश्चित होता है, वैसे ही † ब्राह्म, वासिष्ठ आदि ऋषिनिर्मित ग्रन्थोंमें और पञ्चीकरण आदि ग्रन्थोंमें ‡ विशकलितरूपसे अवस्थित अर्थोंका उपसंहार द्वारा प्रश्नोपनिषत् आदिमें उक्त निर्गुण ब्रह्मोपासनाका प्रकारविशेष सम्प्रदायवेत्ता गुरुओंसे जानकर उसके अनुष्ठान करनेसे—क्रमशः उपास्यभूत निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अविसंवादिभ्रम न्यायसे × उपासना भी कदाचित् फलकालमें


अर्थात् जो बुद्धिकी मन्दतासे अथवा ग्रामप्रोष्ठ अभावसे वेदान्त श्रवणकी प्राप्ति न कर सकें, वे अहर्निश ब्रह्मकी उपासना करें, तात्पर्य यह है कि भले ही वे वेदान्ताध्ययणसे रहित हों, परन्तु अध्ययनसे सामान्यतः उन्हें आत्माका परिज्ञान हो, तो श्रवणके बिना ही गुरुओंसे आत्माका सद्विशेष निर्णय करके उसकी उपासनासे ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकते हैं।

† ब्राह्मपुराण और योगवासिष्ठ इत्यादि आर्ष ग्रन्थ, यह भाव है।

‡ यदि प्रश्नमें शङ्का हो कि पञ्चीकरणमें कहा है कि वेदान्तके लक्ष्यभूत अखण्डैकरस प्रत्यगब्रह्मात्मक मनका ज्ञानके प्रतिलोपनपूर्वक 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अभेदभावनासे अवस्थान ही समाधि है, इससे और 'योऽसावखण्डैकरसः सोऽहमस्मि' इत्यादि उदाहृत ध्यानदीपके वचनसे प्रकृत निर्गुण ब्रह्मदृष्टिही की विवक्षा की गई है, प्रश्नोपनिषत्में शैव्यके प्रश्नमें तो ओंकाररूप प्रतीकमें निर्गुण ब्रह्मदृष्टि विवक्षित है, वैसे कठवल्लीमें भी इसी प्रकारकी उपासना निकली है। इस परिस्थितिमें प्रकृत निर्गुणोपासनामें यह प्रश्नोपनिषत्का वाक्य प्रमाणरूपसे कैसे ग्राह्य हो सकता है, सो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत उपासनामें तापनी, माण्डूक्य आदि उपनिषद् ही प्रमाणरूपसे विवक्षित हैं और प्रश्न, कठवल्ली आदिका उदाहरण तो यह बतलानेके लिए दिया गया है कि निर्गुण उपासना अन्यत्र भी दृष्ट है, यह भाव है।

× अविसंवादिभ्रम न्याय इस प्रकारका है—किसी एक घरमें श्रीकृष्णचन्द्रकी मूर्ति है, उसके प्रतिबिम्बका घरसे बाहर प्रदेशमें स्थित पुरुषको आभास होनेपर 'ये श्रीकृष्णचन्द्र हैं'

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४६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

संवादिभ्रमन्यायेन उपास्तेरपि क्वचित् फलकाले प्रमापर्यवसानसम्भवात् । पाणौ पञ्च वराटकाः पिधाय केनचित् 'करे कति वराटकाः' ? इति पृष्टे 'पञ्च वराटकाः' इति तदुत्तरवक्तृवाक्यप्रयोगमूलभूतसङ्ख्याविशेष- ज्ञानस्य मूलप्रमाणशून्यस्याऽऽहार्यारोपरूपस्यापि यथार्थत्ववन्निर्गुणब्रह्मोपासन- स्याऽर्थतथात्वविवेचकनिर्विकित्समूलप्रमाणनिरपेक्षस्य दहराद्युपासनवदु- पासनाशास्त्रमात्रमवलम्ब्य क्रियमाणस्यापि वस्तुतो यथार्थत्वेन दहराद्यु-


प्रमाणमें पर्यवसित होती है । जैसे कोई अपने हाथमें पाँच कौड़ियोंको बन्द करके * पूछे कि बतलाओ मेरे हाथमें कितनी कौड़ियाँ हैं ? इसके जवाबमें किसीने अटकलसे कहा कि पाँच कौड़ियाँ हैं । इसमें जिस पुरुषने उत्तर दिया उसके वाक्यप्रयोगमें हेतुभूत जो संख्याविशेषज्ञान है, वह यद्यपि मूल प्रमाणसे शून्य और आहार्यारोप है, तथापि वह जैसे यथार्थ माना जाता है, वैसे ही † अर्थतथात्वनिश्चायक मूल प्रमाणसे निरपेक्ष क्रियमाण ब्रह्मोपासना भी दहरादि उपासनाके समान ‡ केवल शास्त्रका अवलम्बन करके वस्तुतः


इस प्रकार भ्रम उत्पन्न होता है, इस भ्रमके बाद उस पुरुषके प्रतिबिम्बाध्यासकी उपाधिकी सन्निधिमें जानेसे सत्य कृष्णचन्द्रविषयक प्रमा होती है, यह देखा जाता है । इस स्थलमें प्रतिबिम्ब स्थलमें उत्पन्न बिम्बभूत कृष्णचन्द्रका भ्रम अविसंवादी (सफल) कहलाता है । प्रकृतमें जैसे उस भ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको श्रीकृष्णप्राप्तिरूप फलके समयमें श्रीकृष्णकी प्रमा उत्पन्न होती है, वैसे ही निर्गुण उपासनामें प्रवृत्त पुरुषको ब्रह्मप्राप्तिरूप फलकालमें निर्गुण ब्रह्मकी प्रमा होती है, यह भाव है ।

* पूर्वमें संवादिभ्रमके दृष्टान्तसे निर्गुण उपासनका प्रमामें पर्यवसान है, यह जो कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त विषम है, कारण कि कृष्णके प्रतिबिम्ब-विभ्रमस्थलमें उपाधिके पास जानेके बाद चक्षुके सन्निकर्षसे श्रीकृष्णकी प्रमा होती, संवादी भ्रमसे नहीं होती, प्रकृतमें प्रमाके उत्पादनमें निर्गुण उपासनाकी सामर्थ्य नहीं है और न तो कोई अन्य सामग्री है, इसलिए उसका प्रमामें पर्यवसान कैसे हो सकता है ? इस प्रकारकी आशङ्का करके निर्गुण उपासनामें स्वसमान विषयकी प्रमाके उत्पादनमें सामर्थ्य है, उसका प्रतिपादन करनेके लिए उसकी यथार्थताका सदृष्टान्त उपपादन इस ग्रन्थसे करते हैं ।

† ब्रह्मरूप अर्थके प्रत्यग्रूपत्व, निष्प्रपञ्चत्वरूप तथात्वका निर्णायक जो अन्यार्थबोधकत्व-शून्य मूलभूत श्रुति प्रमाण है उसकी अपेक्षा नहीं रखनेवाली अर्थात् निदिध्यासनके समान प्रकृत निर्गुणोपासना विचारपूर्वक नहीं है, अतः निर्विचिकित्स तत्त्वनिर्णयपूर्वकत्वप्रयुक्त यह यथार्थता नहीं है, यह भाव है ।

‡ सगुण उपासनामें जैसे सगुण ईश्वरमें विचारपूर्वक जीवाभिन्नताका निर्णय नहीं

[ ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४६७


पासनेनेव निर्गुणोपासनेन जन्यस्य स्वविषयसाक्षात्कारस्य श्रवणादि- प्रणालीजन्यसाक्षात्कारवदेव तत्त्वार्थविषयत्वावश्यंभावाच्च ।

इयांस्तु विशेषः—प्रतिबन्धरहितस्य पुंसः श्रवणादिप्रणाल्या ब्रह्मसा- क्षात्कारो झटिति सिध्यतीति साङ्ख्यमार्गो मुख्यः कल्पः, उपास्त्या तु विलम्बेनेति योगमार्गोऽनुकल्प इति ॥ ८ ॥

ननु किं करणं ब्रह्मसाक्षात्कारे ब्रह्मके साक्षात्कारमें करण क्या है ?

नन्वस्मिन् पक्षद्वयेऽपि ब्रह्मसाक्षात्कारे किं करणम् ? । अत्र केचन ।

प्रत्ययावृत्तिमाहुरग्र्युः साङ्ख्ये योगे च सम्भवात् ॥ १९ ॥

इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं कि साङ्ख्य और योग दोनों मार्गमें प्रत्ययावृत्ति ही ब्रह्मके साक्षात्कारमें करण है ॥ १९ ॥


यथार्थ होनेके कारण दहरादि उपासनाके समान निर्गुण उपासनासे जन्य स्वविषयक साक्षात्कार श्रवणादि क्रमसे उत्पन्न साक्षात्कारके समान तत्त्वार्थ- विषयकत्व अवश्य हो सकता है ।

विशेष केवल इतना ही है कि प्रतिबन्धकोंसे शून्य पुरुषको श्रवणादि क्रमसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार शीघ्र होता है, इसलिए सांख्यमार्ग मुख्य कल्प है और उपा- सनासे ब्रह्मसाक्षात्कार विलम्बसे होता है, अतः योगमार्ग गौण कल्प है ॥८॥

यहांपर * शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें भी अर्थात् सांख्यमार्ग और योगमार्गमें भी ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण कौन है ?


है, तथापि 'सगुण ईश्वरकी अभिप्रीतये अपनी उपासना करनी चाहिए' इस प्रकारके उपासना- विधिशास्त्रके सामर्थ्यसे सगुण उपासना की जाती है, वैसे ही 'निर्गुण उपासना करनी चाहिए' इस शास्त्रके आधारपर निर्गुण उपासना करनी चाहिए, यह भाव है ।

* यदि शङ्का हो कि यह प्रश्न पक्षद्वयसाधारण नहीं हो सकता है, क्योंकि योगमार्गमें निर्गुण उपासना ही सगुण उपासनाके दृष्टान्तसे पूर्वमें करण कही गई है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह प्रश्न प्रमाणके अभिप्रायसे पूछा गया है, पहले निर्गुण उपासनामें ब्रह्म- साक्षात्कारकी हेतुता बतलाई गई है, करणता नहीं, इसलिए इस प्रश्नकी अनुपपत्ति नहीं है, अर्थात् योगमार्गमें उपासना ही करण है, या अन्य कोई यह प्रश्न हो सकता है, यह भाव है ।

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४६८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

केचिदाहुः—प्रत्ययाभ्यासरूपं प्रसंख्यानमेव। योगमार्गे आदित आरभ्योपासनरूपस्य साङ्ख्यमार्गे मननानन्तरनिदिध्यासनरूपस्य च तस्य सत्त्वात्। न च तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वे मानाभावः, 'ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रवणात्। कामातुरस्य व्यवहितकामिनीसाक्षात्कारे प्रसंख्यानस्य करणत्वक्लृप्तेश्च। 'आ प्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्' (उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १२) इत्यधिकरणे, 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वाद्' (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ५९) इत्यधिकरणे च दहराद्यहंग्रहोपासकानां प्रसंख्यानादुपास्यसगुणब्रह्मसाक्षात्काराङ्गीकाराच्च। ननु च प्रसंख्यानस्य प्रमाणपरिगणनेष्वपरिगणनात् तज्जन्यो ब्रह्मसाक्षात्कारः प्रमा न स्यात्। न च काकतालीसम्वादिवराटकसङ्ख्या-

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण है, क्योंकि योगमार्गमें पहलेसे लेकर उपासनारूप और सांख्यमार्गमें मननके बाद निदिध्यासनरूप प्रसंख्यान विद्यमान ही है। यदि शङ्का हो कि प्रसंख्यानको ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ततस्तु०' (निर्विशेष परमात्माका ध्यान करनेवाला पुरुष उस ध्यानसे परमात्माको देखता है) इस प्रकारकी श्रुति प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यानको साक्षात्कारके प्रति करण माननेमें प्रमाण है।† और कामातुरके असन्निकृष्टकामिनीके साक्षात्कारमें प्रसंख्यानकी करणता दृष्ट भी है। 'आप्रायणात् ‡ तत्रापि हि दृष्टम्' इस अधिकरणमें और 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात्' × इस अधिकरणमें दहरादि और अहंग्रहके उपासकोंके उपास्य सगुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति प्रसंख्यानको करण माना भी गया है। यदि शङ्का हो कि प्रमाणकी गिनतीमें प्रसंख्यानका परिगणन न होनेसे उससे उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मसाक्षात्कार प्रमा नहीं होगी। और काकतालीय कौड़ीकी


† इस स्थलमें कामिनीके साथ चक्षुका संसर्ग न होनेके कारण और मनका बाह्यार्थमें स्वातन्त्र्य न होनेके कारण कामिनीविषयक प्रसङ्ख्यान ही कामिनीसाक्षात्कारमें करण है, यह तात्पर्य है।
‡ मरणपर्यन्त सगुण उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, क्योंकि मरणकालमें भी योगी लोग ब्रह्मकी उपासना करते हैं, यह श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, इसलिए सर्वदा जबतक ब्रह्मचिन्तन न किया जाय, तबतक मरणकालमें वह नहीं हो सकता है, यह सूत्रका अर्थ है।
× सगुण उपासनाओंका विकल्प मानना ही युक्त है, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल सामान्यरूपसे सर्वत्र एक ही है, यह 'विकल्पो' इत्यादि सूत्रका अक्षरार्थ है।

ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४६९


विशेपाहार्यज्ञानवद् अर्थाबाधेन प्रमात्वोपपत्तिः, प्रमाणामूलकप्रमात्वा- योगात् । आहार्यवृत्तेश्च उपासनार्वृत्तिवद् ज्ञानभिन्नमानसक्रियारूपतया इच्छादिवद् अवाधितार्थविषयत्वेऽपि प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । मैवम्, क्लृप्त- प्रमाकरणामूलकत्वेऽपीश्वरमायावृत्तित्त्वत् प्रमात्वोपपत्तेः । विषयाबाधतौ- ल्यात् । मार्गद्वयेऽपि प्रसङ्ख्यानस्य विचारितादविचारिताद्वा वेदान्तात् ब्रह्मात्मैक्यावगतिमूलकतया प्रसङ्ख्यानजन्यस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य प्रमाण- मूलकत्वाच्च । उक्तं च कल्पतरुकारैः—


संख्याविशेषके सफल ज्ञानके समान अर्थके बाधित न होनेपर भी ब्रह्मसाक्षा- त्कारको प्रमा नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रमाणसे अनुत्पन्न ज्ञान प्रमा नहीं होता, यह नियम है, जैसी उपासना वृत्ति ज्ञानभिन्न क्रियारूप है, वैसे ही आहार्यवृत्ति भी * मानस क्रियारूप ही है, इसलिए उसके अबाधितार्थविषयक होनेपर भी इच्छा आदिके समान उसमें प्रमात्व नहीं माना जा सकता है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि ब्रह्मसाक्षात्कार प्रसिद्ध प्रमाणजन्य नहीं है, तथापि ईश्वरकी † मायावृत्तिके समान उसमें प्रमात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि विषयका ‡ अबाध समान ही है । और उक्त दो मार्गोंमें प्रसंख्यानके मूलविचारित या अविचारित वेदान्तसे × होनेवाली जीवब्रह्मैक्यविषयक अवगति के होनेसे प्रसंख्यानजन्य ब्रह्मसाक्षात्कार भी प्रमाणमूलक ही हो सकता है । इस विषयमें कल्पतरुकारने कहा भी हैं ।


* अविसंवादी वराटकसंख्या आदिको विषय करनेवाली वृत्ति आहार्य वृत्ति कहलाती है, अथवा बाधकालीन इच्छाजन्य वृत्ति आहार्यवृत्ति है ।

† ईश्वरकी मायावृत्तिमें भी यदि ज्ञानत्वका अङ्गीकार न किया जायगा, तो 'यः सर्वज्ञः स सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिकी उपपत्ति नहीं होगी, कारण कि ईश्वरमें सर्वज्ञताकी भी मायावृत्तिके आधारपर ही उपपत्ति है, यह भाव है ।

‡ इच्छाका वारण करनेके लिए इच्छाभिन्नत्व विशेषण देना चाहिए, अतः इच्छामें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथा इच्छाके अबाधितार्थ कत्व होनेसे उसमें भी ज्ञानत्वकी प्रसक्ति, होगी यह भाव है ।

× अविचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होता है, यह योगमार्गाभिप्रायसे कहा गया है, और सांख्यमार्गमें विचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यावगति होती है, इस अभिप्रायसे 'विचारितात्' यह विशेषण है, यदि शङ्का हो कि विचारित या अविचारित वेदान्तसे ही ब्रह्मावगति हो

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४७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद ]

'वेदान्तवाक्यजज्ञानभावनाजाऽपरोक्षधीः ।
मूलप्रमाणदार्थ्येन न भ्रमत्वं प्रपद्यते ॥
न च प्रामाण्यपरतस्त्वापत्तिस्तु प्रसज्यते ।
अपवादनिरासाय मूलशुद्ध्यनुरोधनात् ॥' इति ।
अन्ये तु मन एवाहुरेनां तत्सहकारिणीम् ।

कुछ लोग कहते हैं कि मन ही ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारण है और प्रत्ययावृत्ति मनकी सहकारी कारण है ।

अन्ये तु 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः', 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यादिश्रुतेर्मन एव ब्रह्मसाक्षात्कारे करणम्, तस्य सोपाधिकात्मनि अहंवृत्तिरूपप्रमाकरणत्वक्लप्तेः । 'स्वप्नप्रपञ्चविपरीतप्रमात्रादिज्ञानसाधनस्यान्तःकरणस्य' इत्यादिपञ्चपादिकाविवरणग्रन्थैरपि तथा

' वेदान्तवाक्यजज्ञान० '
अर्थात् वेदान्तवाक्योंके ज्ञानरूप अभ्याससे होनेवाली अपरोक्ष बुद्धि वेदान्तवाक्यकी अथवा इससे होनेवाली प्रमाकी दृढ़तासे (अविप्रतिपन्न प्रामाण्य होनेसे) भ्रम नहीं होती है । इससे परतः प्रामाण्यापत्ति भी प्रसक्त नहीं है, क्योंकि अपवादके (अप्रामाण्य शङ्काके) निरासके लिए मूल प्रमाणकी शुद्धिकी अपेक्षा की गई है ।

  • कुछ लोग कहते हैं कि 'एषोऽणुरात्मा०' (इस अत्यन्त सूक्ष्म आत्माको मनसे जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (कुशाग्र बुद्धिसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे आत्मसाक्षात्कारमें मन ही कारण प्रतीत होता है, क्योंकि मनमें सोपाधिक आत्माके अहमाकार वृत्तिरूप प्रमात्मक साक्षात्कारके प्रति करणता लोकमें प्रसिद्ध है, और 'प्रातिभासिक स्वप्न प्रपञ्चसे विपरीत व्यावहारिक प्रमाता आदि पदार्थोंके ज्ञानके प्रति साधनभूत अन्तःकरणके' इत्यादि प्रपञ्चपादिका आदि विवरणग्रन्थोंसे प्रमाताशब्दसे कहलानेवाले सोपाधिक

सकती है, तो प्रसंख्यानकी क्या आवश्यकता है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रसंख्यानके पूर्वमें अविद्याके निवर्तक अप्रतिबद्ध ब्रह्मावगति उत्पन्न नहीं हो सकती है, यह भाव है।

* केवल प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, किन्तु तत्सहकृत अन्तःकरण ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इस प्रकारके मतका अवलम्बन करनेवालोंके मतका निरूपण इस ग्रन्थसे करते हैं ।

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ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४७१

प्रतिपादनात् । 'अहमेवेदं सर्वं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः' इति श्रुत्युक्ते स्वाप्ने ब्रह्मसाक्षात्कारे एव मनसः करणत्वसम्प्रतिपत्तेश्च । तदा करणान्तराभावात् । प्रसङ्ख्यानं तु मनस्सहकारिभावेनापि उपयुज्यते । 'वाक्यार्थभावनापरिपाकसहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्ष्यस्य तत्तदुपाध्याकारनिषेधेन तत्पदार्थतामाविर्भावयति'—इति भामतीवचनात् । 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रुतावपि ज्ञानप्रसादशब्दितचित्तैकाग्र्यहेतुतयैव ध्यानोपादानात् । न तु प्रसङ्ख्यानं स्वयं करणम्, तस्य क्वचिदपि ज्ञानकरणत्वाक्लृप्तेः । कामातुरकामिनीसाक्षात्कारादावपि प्रसङ्ख्यानसहकृतस्य मनस एव करणत्वोपपत्त्याऽक्लृप्तज्ञानकरणान्तरकल्पनायोगादित्याहुः ।


आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी करणताका प्रतिपादन किया गया है । और 'अहमेवेदम्०' ( सब वस्तुओंमें सद्रूपसे अनुभूयमान यह सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इसलिए सभी मैं हूँ, ऐसा स्वप्नमें ब्रह्मवित् मानता है, यह इसका उच्च लोक है ) इस श्रुतिसे प्रतिपादित स्वप्नकालीन निर्गुण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मन ही करण माना गया है, क्योंकि स्वप्नकालमें मनके सिवा अन्य करण नहीं रहते हैं । आत्मसाक्षात्कारके प्रति प्रसङ्ख्यान मनकी सहकारितारूपसे उपयुक्त होता है, क्योंकि 'महावाक्यार्थकी भावनाके परिपाकसे युक्त अन्तःकरण तत्-तत् उपाधिके आकारके निषेधसे त्वंपदार्थके अपरोक्षानुभवमें तत्पदार्थत्वका आविर्भाव करता है' इस प्रकार भामतीकारका वचन भी है । 'ज्ञानप्रसादेन † विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु' ( ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे शुद्ध ब्रह्मको देखता है ) इस श्रुतिमें भी 'ज्ञानप्रसाद' शब्दसे विवक्षित चित्तकी एकाग्रताके प्रति हेतुरूपसे ही ध्यानशब्दका प्रयोग किया गया है । केवल प्रसंख्यान आत्मसाक्षात्कारमें करण नहीं है, क्योंकि कहीं भी उसकी ज्ञानके करणरूपसे प्रतीति नहीं होती है । और कामातुर पुरुषके कामिनीसाक्षात्कारकी प्रसङ्ख्यानसहकृत मनकी करणतासे ही उपपत्ति हो सकती है, फिर ज्ञानके प्रति अक्लृप्त अन्य करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है ।


† करण-व्युत्पत्तिसे अर्थात् 'ज्ञायते अनेन' इत्यादि व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्दका अर्थ अन्तःकरण है, उसका प्रसाद—चित्तकी एकाग्रता, यह एकाग्रता ध्यानसे प्राप्त होती है,

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