भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 590 में से

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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६३


सूत्रकृताऽप्युपास्यगुणपरिच्छेदार्थमारब्धे गुणोपसंहारपादे निर्गुणेऽपि 'आनन्दादयः प्रधानस्य'—इति सूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ११ ) भावरूपाणां ज्ञानानन्दादिगुणानाम्, 'अक्षरधियां त्ववरोधः' इत्यादिसूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३३ ) अभावरूपाणामस्थूलत्वादिगुणानां चोपसंहारस्य दर्शितत्वाच्च । ननु आनन्दादिगुणोपसंहारे उपास्यं निर्गुणमेव न स्यादिति चेद्, न; आनन्दादिभिरस्थूलत्वादिभिश्चोपलक्षितमखण्डैकरसं ब्रह्माऽस्मीति निर्गुणत्वानुपमर्देन उपासनासम्भवात् ।

में भी निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका अङ्गीकार किया गया है, सूत्रकारने भी—उपास्य गुणोंका निश्चय करनेके लिए आरब्ध गुणोपसंहार पादमें 'आनन्दादयः प्रधानस्य'* इस सूत्रसे निर्गुण ब्रह्ममें ज्ञान, आनन्द आदि भावरूप गुणोंका और 'अक्षरधियान्त्ववरोधः'† इत्यादि सूत्रसे अस्थूलत्व आदि अभावरूप धर्मोंका—उपसंहार दिखलाया है। यदि शङ्का हो कि आनन्दादि गुणोंका यदि उक्त सूत्रोंसे ब्रह्ममें उपसंहार किया गया है, तो फिर इसीसे उपास्य ब्रह्म निर्गुण नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आनन्द आदि और अस्थूलत्व आदि गुणोंसे‡ उपलक्षित अखण्डैकरस 'मैं ही ब्रह्म हूं' इस प्रकार निर्गुणत्वके अनुपमर्दसे उपासना हो सकती है। यदि शङ्का हो कि


* 'आनन्दादयः प्रधानस्य' आनन्द, सत्य, ज्ञान आदि धर्म भले ही कहींपर सुने गये हों, परन्तु उनका उपसंहार ब्रह्ममें सर्वत्र समझ लेना चाहिए, क्योंकि प्रधानभूत ब्रह्मके एक होनेसे ब्रह्मविद्या भी सब वेदान्तोंमें एक है, यह भाव है।

† यह सूत्रका एक भागमात्र है, परन्तु सूत्रका स्वरूप तो 'अक्षरधियान्त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम्' इतना बड़ा है अक्षरार्थ यह है—अक्षर ब्रह्ममें द्वैतनिषेध बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार करना चाहिए, क्योंकि द्वैतके निषेधसे सर्वत्र श्रुतियोंमें ब्रह्मका प्रतिपादन और प्रतिपाद्य ब्रह्मका एकत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञान भी समान है, जैसे पुरोडाशके अङ्गभूत औपसद मन्त्रोंका अन्यत्र श्रवण होनेपर अध्वर्युके साथ सम्बन्ध होता है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि उपास्यकोटिमें आनन्दादि गुणोंका प्रवेश नहीं किया गया है, जिससे कि उपास्य ब्रह्ममें सगुणत्वकी सिद्धि हो, किन्तु उपास्य पदार्थके निर्गुणत्व-निर्णय द्वारा केवल उपासनामें उनका उपयोगमात्र स्वीकार किया गया है, इसलिए आनन्दादि गुणोंके उपसंहारसे केवल आनन्दादिगुणवाचक पदोंका साथ उच्चारणमात्र विवक्षित है। इस परिस्थितिमें उपाधिविशिष्ट चैतन्यवाचक आनन्दादिशब्दोंसे और स्थौल्याभावविशिष्टवाचक अस्थूल आदि पदोंसे सब वाच्यार्थोंमें अनुगत अखण्डैकरस जिस ब्रह्मकी लक्षणासे प्रतीति

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