भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 590 में से

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पृष्ठ 494
४६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

ननु 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति श्रुतेः न परं ब्रह्मोपास्यमिति चेत्, 'अन्यदेव तद्विदिताद्' इति श्रुतेस्तस्य वेद्यत्वस्याऽप्यसिद्ध्यापातात् । श्रुत्यन्तरेषु ब्रह्मवेदनप्रसिद्धेरवेद्यत्वश्रुतिर्वास्तवावेद्यत्वपरा चेद्, आथर्वणादौ तदुपासनाप्रसिद्धेस्तदनुपास्यत्वश्रुतिरपि वस्तुवृत्तपराऽस्तु । एवं च 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' इति श्रवणाद् येषां बुद्धिमान्द्याद्, न्यायव्युत्पादनकुशलविशिष्टगुर्वलाभाद्वा श्रवणादि न

'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि०' (बुद्धि आदिके साक्षी चैतन्यको ही ब्रह्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी उपासना होती है) इस श्रुतिसे परब्रह्म उपास्य नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अन्यदेव तद्विदितात्' (वेदन-विषयसे ब्रह्म अन्य ही है, अर्थात् ब्रह्म वेद्य नहीं है) इस श्रुतिसे ब्रह्ममें वेद्यत्वकी असिद्धि भी है। यदि शङ्का हो कि अन्य श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानकी प्रसिद्धि होनेसे अवेद्यत्वश्रुतिका भी तात्पर्य वस्तुतः अवेद्यत्वबोधनमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या आथर्वण श्रुतिमें ब्रह्मोपासनाकी प्रसिद्धि होनेसे ब्रह्मकी अनुपास्यत्वश्रुतिका भी वस्तुतः अनुपास्यत्वमें ही तात्पर्य क्यों न हो, अर्थात् ब्रह्ममें उपास्यत्व या वेद्यत्व वस्तुतः नहीं है, यही निषेधश्रुतिका तात्पर्य है, यह भाव है। निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके सप्रमाण सिद्ध होनेपर * 'श्रवणायापि०' (अनेक लोगोंको आत्माका श्रवण भी प्राप्त नहीं होता) इत्यादि श्रुतिके बलसे जिनको बुद्धिकी मन्दतासे † अथवा न्याय-


होती है 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना हो सकती है, अतः ध्यानदीपमें कहा भी है—

'आनन्दादिभिरस्थूलादिभिश्चात्माऽत्र लक्षितः ।
योऽखण्डैकरसस्सोऽहमस्मीत्येवमुपासते ॥'

अर्थात् वेदान्तोंमें आनन्दादि और अस्थूलादि शब्दोंसे जो अखण्डैकरस आत्मा लक्षित है, 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना करते हैं।

* कुछ मुमुक्षुओंको श्रवणका लाभ नहीं होता है, उसमें यह प्रमाण दिखलाते हैं। अर्थात्

† अनेक पुरुषोंको श्रवण नहीं होता, इस प्रकार श्रुतिने जो प्रतिपादन किया है, उसमें श्रुत्युक्त ये दोनों कारण हैं, अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे श्रवण नहीं होता है, अथवा कदाचित् परिष्कृत बुद्धि है, परन्तु सामग्री नहीं है, तो भी श्रवण नहीं होता, इसमें ध्यानदीपका यह श्लोक भी प्रमाण है—

'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥'