सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६५
सम्भवति, तेषामध्ययनगृहीतैः वेदान्तैरापाततोऽधिगमितब्रह्मात्मभावानां तद्विचारं विनैव प्रश्नोपनिषदाद्युक्तमार्षग्रन्थेषु ब्राह्मवासिष्ठादिकल्पेषु पञ्चीकरणादिषु चानेकशाखाविप्रकीर्णसर्वार्थोपसंहारेण कल्पसूत्रेष्वग्निहोत्रादिविधोरिवानुष्ठानप्रकारं निर्गुणोपासनं सम्प्रदायमात्रविद्द्भ्यो गुरुभ्योऽवधार्य तदनुष्ठानात् क्रमेणोपास्यभूतनिर्गुणब्रह्मसाक्षात्कारः सम्पद्यते। अवि-
व्युत्पत्तिके सम्पादनमें कुशल आचार्यके प्राप्त न होनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते, अध्ययनसम्पादित वेदान्तोंसे सामान्यतः जीवब्रह्मैक्य जाननेवाले उन पुरुषोंको—उसके विचारके बिना ही जैसे अनेक शाखाओंमें विप्रकीर्ण-विशकलित-रूपसे उपलब्ध पदार्थोंके उपसंहारसे अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान प्रकार निश्चित होता है, वैसे ही † ब्राह्म, वासिष्ठ आदि ऋषिनिर्मित ग्रन्थोंमें और पञ्चीकरण आदि ग्रन्थोंमें ‡ विशकलितरूपसे अवस्थित अर्थोंका उपसंहार द्वारा प्रश्नोपनिषत् आदिमें उक्त निर्गुण ब्रह्मोपासनाका प्रकारविशेष सम्प्रदायवेत्ता गुरुओंसे जानकर उसके अनुष्ठान करनेसे—क्रमशः उपास्यभूत निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अविसंवादिभ्रम न्यायसे × उपासना भी कदाचित् फलकालमें
अर्थात् जो बुद्धिकी मन्दतासे अथवा ग्रामप्रोष्ठ अभावसे वेदान्त श्रवणकी प्राप्ति न कर सकें, वे अहर्निश ब्रह्मकी उपासना करें, तात्पर्य यह है कि भले ही वे वेदान्ताध्ययणसे रहित हों, परन्तु अध्ययनसे सामान्यतः उन्हें आत्माका परिज्ञान हो, तो श्रवणके बिना ही गुरुओंसे आत्माका सद्विशेष निर्णय करके उसकी उपासनासे ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकते हैं।
† ब्राह्मपुराण और योगवासिष्ठ इत्यादि आर्ष ग्रन्थ, यह भाव है।
‡ यदि प्रश्नमें शङ्का हो कि पञ्चीकरणमें कहा है कि वेदान्तके लक्ष्यभूत अखण्डैकरस प्रत्यगब्रह्मात्मक मनका ज्ञानके प्रतिलोपनपूर्वक 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अभेदभावनासे अवस्थान ही समाधि है, इससे और 'योऽसावखण्डैकरसः सोऽहमस्मि' इत्यादि उदाहृत ध्यानदीपके वचनसे प्रकृत निर्गुण ब्रह्मदृष्टिही की विवक्षा की गई है, प्रश्नोपनिषत्में शैव्यके प्रश्नमें तो ओंकाररूप प्रतीकमें निर्गुण ब्रह्मदृष्टि विवक्षित है, वैसे कठवल्लीमें भी इसी प्रकारकी उपासना निकली है। इस परिस्थितिमें प्रकृत निर्गुणोपासनामें यह प्रश्नोपनिषत्का वाक्य प्रमाणरूपसे कैसे ग्राह्य हो सकता है, सो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत उपासनामें तापनी, माण्डूक्य आदि उपनिषद् ही प्रमाणरूपसे विवक्षित हैं और प्रश्न, कठवल्ली आदिका उदाहरण तो यह बतलानेके लिए दिया गया है कि निर्गुण उपासना अन्यत्र भी दृष्ट है, यह भाव है।
× अविसंवादिभ्रम न्याय इस प्रकारका है—किसी एक घरमें श्रीकृष्णचन्द्रकी मूर्ति है, उसके प्रतिबिम्बका घरसे बाहर प्रदेशमें स्थित पुरुषको आभास होनेपर 'ये श्रीकृष्णचन्द्र हैं'
५९