सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ तृतीय परिच्छेद |
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संवादिभ्रमन्यायेन उपास्तेरपि क्वचित् फलकाले प्रमापर्यवसानसम्भवात् । पाणौ पञ्च वराटकाः पिधाय केनचित् 'करे कति वराटकाः' ? इति पृष्टे 'पञ्च वराटकाः' इति तदुत्तरवक्तृवाक्यप्रयोगमूलभूतसङ्ख्याविशेष- ज्ञानस्य मूलप्रमाणशून्यस्याऽऽहार्यारोपरूपस्यापि यथार्थत्ववन्निर्गुणब्रह्मोपासन- स्याऽर्थतथात्वविवेचकनिर्विकित्समूलप्रमाणनिरपेक्षस्य दहराद्युपासनवदु- पासनाशास्त्रमात्रमवलम्ब्य क्रियमाणस्यापि वस्तुतो यथार्थत्वेन दहराद्यु-
प्रमाणमें पर्यवसित होती है । जैसे कोई अपने हाथमें पाँच कौड़ियोंको बन्द करके * पूछे कि बतलाओ मेरे हाथमें कितनी कौड़ियाँ हैं ? इसके जवाबमें किसीने अटकलसे कहा कि पाँच कौड़ियाँ हैं । इसमें जिस पुरुषने उत्तर दिया उसके वाक्यप्रयोगमें हेतुभूत जो संख्याविशेषज्ञान है, वह यद्यपि मूल प्रमाणसे शून्य और आहार्यारोप है, तथापि वह जैसे यथार्थ माना जाता है, वैसे ही † अर्थतथात्वनिश्चायक मूल प्रमाणसे निरपेक्ष क्रियमाण ब्रह्मोपासना भी दहरादि उपासनाके समान ‡ केवल शास्त्रका अवलम्बन करके वस्तुतः
इस प्रकार भ्रम उत्पन्न होता है, इस भ्रमके बाद उस पुरुषके प्रतिबिम्बाध्यासकी उपाधिकी सन्निधिमें जानेसे सत्य कृष्णचन्द्रविषयक प्रमा होती है, यह देखा जाता है । इस स्थलमें प्रतिबिम्ब स्थलमें उत्पन्न बिम्बभूत कृष्णचन्द्रका भ्रम अविसंवादी (सफल) कहलाता है । प्रकृतमें जैसे उस भ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको श्रीकृष्णप्राप्तिरूप फलके समयमें श्रीकृष्णकी प्रमा उत्पन्न होती है, वैसे ही निर्गुण उपासनामें प्रवृत्त पुरुषको ब्रह्मप्राप्तिरूप फलकालमें निर्गुण ब्रह्मकी प्रमा होती है, यह भाव है ।
* पूर्वमें संवादिभ्रमके दृष्टान्तसे निर्गुण उपासनका प्रमामें पर्यवसान है, यह जो कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त विषम है, कारण कि कृष्णके प्रतिबिम्ब-विभ्रमस्थलमें उपाधिके पास जानेके बाद चक्षुके सन्निकर्षसे श्रीकृष्णकी प्रमा होती, संवादी भ्रमसे नहीं होती, प्रकृतमें प्रमाके उत्पादनमें निर्गुण उपासनाकी सामर्थ्य नहीं है और न तो कोई अन्य सामग्री है, इसलिए उसका प्रमामें पर्यवसान कैसे हो सकता है ? इस प्रकारकी आशङ्का करके निर्गुण उपासनामें स्वसमान विषयकी प्रमाके उत्पादनमें सामर्थ्य है, उसका प्रतिपादन करनेके लिए उसकी यथार्थताका सदृष्टान्त उपपादन इस ग्रन्थसे करते हैं ।
† ब्रह्मरूप अर्थके प्रत्यग्रूपत्व, निष्प्रपञ्चत्वरूप तथात्वका निर्णायक जो अन्यार्थबोधकत्व-शून्य मूलभूत श्रुति प्रमाण है उसकी अपेक्षा नहीं रखनेवाली अर्थात् निदिध्यासनके समान प्रकृत निर्गुणोपासना विचारपूर्वक नहीं है, अतः निर्विचिकित्स तत्त्वनिर्णयपूर्वकत्वप्रयुक्त यह यथार्थता नहीं है, यह भाव है ।
‡ सगुण उपासनामें जैसे सगुण ईश्वरमें विचारपूर्वक जीवाभिन्नताका निर्णय नहीं