भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 492
४६२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ तृतीय परिच्छेद

एतस्माज्जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति उपासना-फलवाक्ये 'ईक्षितिकर्मत्वेन निर्दिष्टं यन्निर्गुणं ब्रह्म, तदेवोपासनावाक्येऽपि ध्यायतिकर्म, नान्यत्; ईक्षितिध्यानयोः कार्यकारणभूतयोरेकविषयत्व-नियमाद्' इत्यस्याऽर्थस्य ईक्षितिकर्माधिकरणे भाष्यकारादिभिरङ्गीकृतत्वात् । अन्यत्राऽपि तापनीयकठवल्ल्यादिश्रुत्यन्तरे निर्गुणोपास्तेः प्रपञ्चितत्वात् ।


सनाका प्रतिपादन किया गया है । और ध्यानवाक्यके अनन्तर 'स एतस्मात्०' ( इस जीवघनसे * उत्कृष्ट बुद्धिके साक्षीरूपसे हृदयाकाशमें वर्तमान निरुपाधिक पुरुषका वह ध्याता पुरुष साक्षात्कार करता है ) इस प्रकारके उपासनाके फलवोधक वाक्यमें 'ईक्षितिके कर्मरूपसे निर्दिष्ट जो निर्गुण ब्रह्म है, वही † उपासनावाक्यमें ध्यानका कर्म ( विषय ) है, अन्य नहीं, क्योंकि कार्यकारणात्मक जो ईक्षति और ध्यान है, उनका एक विषय होता है, यह नियम है', इस प्रकारसे उक्त ही अर्थका ‡ ईक्षितिकर्माधिकरणमें भगवान् भाष्यकारने भी स्वीकार किया है । तापनीय, × कठवल्ली आदि अन्य श्रुतियों-


* जीवघनः—जीवरूपो घनः—परमात्मनो मूर्तिः—घटाकाशवत् उपाधिपरिच्छिन्नश्चिदात्मा, तस्मात् जीवघनात् अर्थात् जीवरूप परमात्माकी मूर्ति ( ब्रह्मलोक ) जीवघनशब्दका अर्थ है ।
† 'परं पुरुषमभ्यध्यायीत' इस प्रकारके उपासनावाक्यमें यह अर्थ है ।
‡ 'ईक्षितिकर्मव्यपदेशात् सः' ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० १३ ) इस सूत्रके भाष्यमें इस विषयका उपपादन किया गया है, क्योंकि अन्यके ध्यानसे अन्यका साक्षात्कार नहीं देखा जाता है । इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि कल्पतरुकारके मतसे निर्गुण पदार्थकी उपासना नहीं हो सकती है, क्योंकि 'स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' इत्यादि सम्पत्तिप्रतिपादक वचनके अनुसार ध्येय पदार्थका सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण उन्होंने दिया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त सूर्यसम्पत्तिबोधक वचन अर्चिरादि मार्गका बोधक है, ऐसा व्यवस्थापन स्वयं कल्पतरुकारने चतुर्थाध्यायमें किया है । सूर्य अथवा तदन्तःस्थ ईश्वरप्राप्तिका बोधक नहीं है, और वस्तुतः कल्पतरुकारके अन्य वचनको देखनेसे और उक्त श्रुतिके मार्गघटक होनेसे सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण देनेमें तात्पर्य नहीं है, यह भी ज्ञात होता है ।
× 'देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् अणोरणीयांसमिममात्मानमोङ्कारं नो व्याचक्ष्व' ( प्रजापतिके पास जाकर देवताओंने कहा कि सूक्ष्मसे सूक्ष्म ओंकारगम्य प्रत्यगात्माको कहो ) इत्यादि तापनीयोपनिषद्की श्रुति है । 'एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म' ( यही अक्षर ब्रह्म है ) 'ॐ मित्येदक्षरमिदं सर्वम्' ( यह सब ॐकार अक्षर ही है ) 'ॐमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्' ( ओंकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए ) इस प्रकारकी क्रमशः कठवल्ली और आदिशब्दसे गृहीत माण्डूक्य और मुण्डककी श्रुतियाँ भी हैं ।


ankurnagpal108@gmail.com