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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 590 में से

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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४६१


, तद्योगैरपि गम्यते' इतिश्रुतिस्मृतिदर्शनात् । यथा साङ्ख्यं नाम वेदान्तविचारः श्रवणशब्दितो मननादिसहकृतो विद्याऽवाप्त्युपायः, एवं योगशब्दितं निर्गुणब्रह्मोपासनमपि । न च निर्गुणस्योपासनमेव नाऽस्तीति शङ्क्यम् , प्रश्नोपनिषदि शैव्यप्रश्ने 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोङ्कारेण परं पुरुषमभिध्यायीत' इति निर्गुणस्यैवोपासनप्रतिपादनात् । तदनन्तरम् 'स


ब्रह्मकी प्राप्ति साङ्ख्य—श्रवण आदिसे युक्त पुरुष—करते हैं, उसी ब्रह्मकी निर्गुण ब्रह्मोपासक भी प्राप्ति करते हैं ) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतिके पर्यालोचनसे यह ज्ञात होता है कि जैसे साङ्ख्यनामक श्रवणशब्दसे कहलानेवाला मनन आदिसहकृत वेदान्तविचार ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु है, वैसे ही योगशब्दसे कहलानेवाली निर्गुणब्रह्मोपासना भी ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है। यदि शङ्का ‡ हो कि जो निर्गुण पदार्थ है, उसकी उपासना ही नहीं हो सकती। तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रश्नोपनिषद्में शैब्यके प्रश्नमें 'यः पुनरेतम्०' ( जो कि इस अकार, उकार और मकारात्मक तीन मात्राओंसे युक्त ओंकारसे सूर्यान्तर्गत परम पुरुषका ध्यान करता है ) इस श्रुतिसे निर्गुण ब्रह्मकी उपा-


‡ यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि निर्गुणपदार्थकी उपासना नहीं होती है, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'तत्कारणं साङ्ख्ययोगाभिप्रन्नम्' और 'यत्साङ्ख्यैः' इत्यादि श्रुति और स्मृतिका प्रमाणरूपसे उपन्यास किया गया है। यदि इसका उत्तर दें कि उक्त श्रुति और स्मृतिमें वर्तमान योगशब्दका अर्थ सगुणोपासना है, अतः यह शङ्का हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भिन्नविषयक उपासना और साक्षात्कारका आपसमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता है, अतः निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति निर्गुण उपासनाको ही हेतु मानना होगा। यदि इसमें भी शङ्का हो कि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वाक्यमें योगशब्दका अर्थ उपासना नहीं है, किन्तु उसके भाष्यमें योगशब्द कर्मयोगपरक माना गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वचनका वस्तुतः निर्गुणोपासनामें तात्पर्य रहते ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कर्मके विषयमें उदाहरण दिया है, इस अभिप्रायसे उक्त व्याख्यान किया है। और योगशब्दकी ध्यानमें ही रूढ़ि होनेसे वस्तुतः वह कर्मका बोधक है भी नहीं, इससे उस स्मृतिकी मूलभूत 'तत्कारणम्' इत्यादि श्रुतिमें योगशब्दकी ध्यानार्थमें भगवान् भाष्यकारने शारीरकभाष्यमें वृत्ति मानी है, अतः कर्मयोग मुख्ययोग द्वारा ब्रह्मप्राप्तिका साधन है, साक्षात् नहीं—इस अर्थको सूचन करनेके लिए भगवान्ने उक्त वचनका कर्मपरकरूपसे उदाहरण दिया है, इसलिए प्रमाणाभावकी शङ्का युक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहृत श्रुति और स्मृतिको छोड़कर अन्यत्र कहींपर भी निर्गुण उपासनाका प्रतिपादन नहीं किया गया है, अतः शङ्का उपपन्न हो सकती है।

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