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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ] भाषानुवादसहितं ४६१


, तद्योगैरपि गम्यते' इतिश्रुतिस्मृतिदर्शनात् । यथा साङ्ख्यं नाम वेदान्तविचारः श्रवणशब्दितो मननादिसहकृतो विद्याऽवाप्त्युपायः, एवं योगशब्दितं निर्गुणब्रह्मोपासनमपि । न च निर्गुणस्योपासनमेव नाऽस्तीति शङ्क्यम् , प्रश्नोपनिषदि शैव्यप्रश्ने 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोङ्कारेण परं पुरुषमभिध्यायीत' इति निर्गुणस्यैवोपासनप्रतिपादनात् । तदनन्तरम् 'स


ब्रह्मकी प्राप्ति साङ्ख्य—श्रवण आदिसे युक्त पुरुष—करते हैं, उसी ब्रह्मकी निर्गुण ब्रह्मोपासक भी प्राप्ति करते हैं ) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतिके पर्यालोचनसे यह ज्ञात होता है कि जैसे साङ्ख्यनामक श्रवणशब्दसे कहलानेवाला मनन आदिसहकृत वेदान्तविचार ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु है, वैसे ही योगशब्दसे कहलानेवाली निर्गुणब्रह्मोपासना भी ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है। यदि शङ्का ‡ हो कि जो निर्गुण पदार्थ है, उसकी उपासना ही नहीं हो सकती। तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रश्नोपनिषद्में शैब्यके प्रश्नमें 'यः पुनरेतम्०' ( जो कि इस अकार, उकार और मकारात्मक तीन मात्राओंसे युक्त ओंकारसे सूर्यान्तर्गत परम पुरुषका ध्यान करता है ) इस श्रुतिसे निर्गुण ब्रह्मकी उपा-


‡ यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि निर्गुणपदार्थकी उपासना नहीं होती है, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'तत्कारणं साङ्ख्ययोगाभिप्रन्नम्' और 'यत्साङ्ख्यैः' इत्यादि श्रुति और स्मृतिका प्रमाणरूपसे उपन्यास किया गया है। यदि इसका उत्तर दें कि उक्त श्रुति और स्मृतिमें वर्तमान योगशब्दका अर्थ सगुणोपासना है, अतः यह शङ्का हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भिन्नविषयक उपासना और साक्षात्कारका आपसमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता है, अतः निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति निर्गुण उपासनाको ही हेतु मानना होगा। यदि इसमें भी शङ्का हो कि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वाक्यमें योगशब्दका अर्थ उपासना नहीं है, किन्तु उसके भाष्यमें योगशब्द कर्मयोगपरक माना गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वचनका वस्तुतः निर्गुणोपासनामें तात्पर्य रहते ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कर्मके विषयमें उदाहरण दिया है, इस अभिप्रायसे उक्त व्याख्यान किया है। और योगशब्दकी ध्यानमें ही रूढ़ि होनेसे वस्तुतः वह कर्मका बोधक है भी नहीं, इससे उस स्मृतिकी मूलभूत 'तत्कारणम्' इत्यादि श्रुतिमें योगशब्दकी ध्यानार्थमें भगवान् भाष्यकारने शारीरकभाष्यमें वृत्ति मानी है, अतः कर्मयोग मुख्ययोग द्वारा ब्रह्मप्राप्तिका साधन है, साक्षात् नहीं—इस अर्थको सूचन करनेके लिए भगवान्ने उक्त वचनका कर्मपरकरूपसे उदाहरण दिया है, इसलिए प्रमाणाभावकी शङ्का युक्त नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उदाहृत श्रुति और स्मृतिको छोड़कर अन्यत्र कहींपर भी निर्गुण उपासनाका प्रतिपादन नहीं किया गया है, अतः शङ्का उपपन्न हो सकती है।

४६२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ तृतीय परिच्छेद

एतस्माज्जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति उपासना-फलवाक्ये 'ईक्षितिकर्मत्वेन निर्दिष्टं यन्निर्गुणं ब्रह्म, तदेवोपासनावाक्येऽपि ध्यायतिकर्म, नान्यत्; ईक्षितिध्यानयोः कार्यकारणभूतयोरेकविषयत्व-नियमाद्' इत्यस्याऽर्थस्य ईक्षितिकर्माधिकरणे भाष्यकारादिभिरङ्गीकृतत्वात् । अन्यत्राऽपि तापनीयकठवल्ल्यादिश्रुत्यन्तरे निर्गुणोपास्तेः प्रपञ्चितत्वात् ।


सनाका प्रतिपादन किया गया है । और ध्यानवाक्यके अनन्तर 'स एतस्मात्०' ( इस जीवघनसे * उत्कृष्ट बुद्धिके साक्षीरूपसे हृदयाकाशमें वर्तमान निरुपाधिक पुरुषका वह ध्याता पुरुष साक्षात्कार करता है ) इस प्रकारके उपासनाके फलवोधक वाक्यमें 'ईक्षितिके कर्मरूपसे निर्दिष्ट जो निर्गुण ब्रह्म है, वही † उपासनावाक्यमें ध्यानका कर्म ( विषय ) है, अन्य नहीं, क्योंकि कार्यकारणात्मक जो ईक्षति और ध्यान है, उनका एक विषय होता है, यह नियम है', इस प्रकारसे उक्त ही अर्थका ‡ ईक्षितिकर्माधिकरणमें भगवान् भाष्यकारने भी स्वीकार किया है । तापनीय, × कठवल्ली आदि अन्य श्रुतियों-


* जीवघनः—जीवरूपो घनः—परमात्मनो मूर्तिः—घटाकाशवत् उपाधिपरिच्छिन्नश्चिदात्मा, तस्मात् जीवघनात् अर्थात् जीवरूप परमात्माकी मूर्ति ( ब्रह्मलोक ) जीवघनशब्दका अर्थ है ।
† 'परं पुरुषमभ्यध्यायीत' इस प्रकारके उपासनावाक्यमें यह अर्थ है ।
‡ 'ईक्षितिकर्मव्यपदेशात् सः' ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० १३ ) इस सूत्रके भाष्यमें इस विषयका उपपादन किया गया है, क्योंकि अन्यके ध्यानसे अन्यका साक्षात्कार नहीं देखा जाता है । इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि कल्पतरुकारके मतसे निर्गुण पदार्थकी उपासना नहीं हो सकती है, क्योंकि 'स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' इत्यादि सम्पत्तिप्रतिपादक वचनके अनुसार ध्येय पदार्थका सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण उन्होंने दिया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त सूर्यसम्पत्तिबोधक वचन अर्चिरादि मार्गका बोधक है, ऐसा व्यवस्थापन स्वयं कल्पतरुकारने चतुर्थाध्यायमें किया है । सूर्य अथवा तदन्तःस्थ ईश्वरप्राप्तिका बोधक नहीं है, और वस्तुतः कल्पतरुकारके अन्य वचनको देखनेसे और उक्त श्रुतिके मार्गघटक होनेसे सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण देनेमें तात्पर्य नहीं है, यह भी ज्ञात होता है ।
× 'देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् अणोरणीयांसमिममात्मानमोङ्कारं नो व्याचक्ष्व' ( प्रजापतिके पास जाकर देवताओंने कहा कि सूक्ष्मसे सूक्ष्म ओंकारगम्य प्रत्यगात्माको कहो ) इत्यादि तापनीयोपनिषद्की श्रुति है । 'एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म' ( यही अक्षर ब्रह्म है ) 'ॐ मित्येदक्षरमिदं सर्वम्' ( यह सब ॐकार अक्षर ही है ) 'ॐमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्' ( ओंकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए ) इस प्रकारकी क्रमशः कठवल्ली और आदिशब्दसे गृहीत माण्डूक्य और मुण्डककी श्रुतियाँ भी हैं ।


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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६३


सूत्रकृताऽप्युपास्यगुणपरिच्छेदार्थमारब्धे गुणोपसंहारपादे निर्गुणेऽपि 'आनन्दादयः प्रधानस्य'—इति सूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ११ ) भावरूपाणां ज्ञानानन्दादिगुणानाम्, 'अक्षरधियां त्ववरोधः' इत्यादिसूत्रेण ( उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३३ ) अभावरूपाणामस्थूलत्वादिगुणानां चोपसंहारस्य दर्शितत्वाच्च । ननु आनन्दादिगुणोपसंहारे उपास्यं निर्गुणमेव न स्यादिति चेद्, न; आनन्दादिभिरस्थूलत्वादिभिश्चोपलक्षितमखण्डैकरसं ब्रह्माऽस्मीति निर्गुणत्वानुपमर्देन उपासनासम्भवात् ।

में भी निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका अङ्गीकार किया गया है, सूत्रकारने भी—उपास्य गुणोंका निश्चय करनेके लिए आरब्ध गुणोपसंहार पादमें 'आनन्दादयः प्रधानस्य'* इस सूत्रसे निर्गुण ब्रह्ममें ज्ञान, आनन्द आदि भावरूप गुणोंका और 'अक्षरधियान्त्ववरोधः'† इत्यादि सूत्रसे अस्थूलत्व आदि अभावरूप धर्मोंका—उपसंहार दिखलाया है। यदि शङ्का हो कि आनन्दादि गुणोंका यदि उक्त सूत्रोंसे ब्रह्ममें उपसंहार किया गया है, तो फिर इसीसे उपास्य ब्रह्म निर्गुण नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आनन्द आदि और अस्थूलत्व आदि गुणोंसे‡ उपलक्षित अखण्डैकरस 'मैं ही ब्रह्म हूं' इस प्रकार निर्गुणत्वके अनुपमर्दसे उपासना हो सकती है। यदि शङ्का हो कि


* 'आनन्दादयः प्रधानस्य' आनन्द, सत्य, ज्ञान आदि धर्म भले ही कहींपर सुने गये हों, परन्तु उनका उपसंहार ब्रह्ममें सर्वत्र समझ लेना चाहिए, क्योंकि प्रधानभूत ब्रह्मके एक होनेसे ब्रह्मविद्या भी सब वेदान्तोंमें एक है, यह भाव है।

† यह सूत्रका एक भागमात्र है, परन्तु सूत्रका स्वरूप तो 'अक्षरधियान्त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम्' इतना बड़ा है अक्षरार्थ यह है—अक्षर ब्रह्ममें द्वैतनिषेध बुद्धियोंका सर्वत्र उपसंहार करना चाहिए, क्योंकि द्वैतके निषेधसे सर्वत्र श्रुतियोंमें ब्रह्मका प्रतिपादन और प्रतिपाद्य ब्रह्मका एकत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञान भी समान है, जैसे पुरोडाशके अङ्गभूत औपसद मन्त्रोंका अन्यत्र श्रवण होनेपर अध्वर्युके साथ सम्बन्ध होता है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि उपास्यकोटिमें आनन्दादि गुणोंका प्रवेश नहीं किया गया है, जिससे कि उपास्य ब्रह्ममें सगुणत्वकी सिद्धि हो, किन्तु उपास्य पदार्थके निर्गुणत्व-निर्णय द्वारा केवल उपासनामें उनका उपयोगमात्र स्वीकार किया गया है, इसलिए आनन्दादि गुणोंके उपसंहारसे केवल आनन्दादिगुणवाचक पदोंका साथ उच्चारणमात्र विवक्षित है। इस परिस्थितिमें उपाधिविशिष्ट चैतन्यवाचक आनन्दादिशब्दोंसे और स्थौल्याभावविशिष्टवाचक अस्थूल आदि पदोंसे सब वाच्यार्थोंमें अनुगत अखण्डैकरस जिस ब्रह्मकी लक्षणासे प्रतीति

४६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

ननु 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति श्रुतेः न परं ब्रह्मोपास्यमिति चेत्, 'अन्यदेव तद्विदिताद्' इति श्रुतेस्तस्य वेद्यत्वस्याऽप्यसिद्ध्यापातात् । श्रुत्यन्तरेषु ब्रह्मवेदनप्रसिद्धेरवेद्यत्वश्रुतिर्वास्तवावेद्यत्वपरा चेद्, आथर्वणादौ तदुपासनाप्रसिद्धेस्तदनुपास्यत्वश्रुतिरपि वस्तुवृत्तपराऽस्तु । एवं च 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः' इति श्रवणाद् येषां बुद्धिमान्द्याद्, न्यायव्युत्पादनकुशलविशिष्टगुर्वलाभाद्वा श्रवणादि न

'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि०' (बुद्धि आदिके साक्षी चैतन्यको ही ब्रह्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी उपासना होती है) इस श्रुतिसे परब्रह्म उपास्य नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अन्यदेव तद्विदितात्' (वेदन-विषयसे ब्रह्म अन्य ही है, अर्थात् ब्रह्म वेद्य नहीं है) इस श्रुतिसे ब्रह्ममें वेद्यत्वकी असिद्धि भी है। यदि शङ्का हो कि अन्य श्रुतियोंमें ब्रह्मज्ञानकी प्रसिद्धि होनेसे अवेद्यत्वश्रुतिका भी तात्पर्य वस्तुतः अवेद्यत्वबोधनमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या आथर्वण श्रुतिमें ब्रह्मोपासनाकी प्रसिद्धि होनेसे ब्रह्मकी अनुपास्यत्वश्रुतिका भी वस्तुतः अनुपास्यत्वमें ही तात्पर्य क्यों न हो, अर्थात् ब्रह्ममें उपास्यत्व या वेद्यत्व वस्तुतः नहीं है, यही निषेधश्रुतिका तात्पर्य है, यह भाव है। निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके सप्रमाण सिद्ध होनेपर * 'श्रवणायापि०' (अनेक लोगोंको आत्माका श्रवण भी प्राप्त नहीं होता) इत्यादि श्रुतिके बलसे जिनको बुद्धिकी मन्दतासे † अथवा न्याय-


होती है 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना हो सकती है, अतः ध्यानदीपमें कहा भी है—

'आनन्दादिभिरस्थूलादिभिश्चात्माऽत्र लक्षितः ।
योऽखण्डैकरसस्सोऽहमस्मीत्येवमुपासते ॥'

अर्थात् वेदान्तोंमें आनन्दादि और अस्थूलादि शब्दोंसे जो अखण्डैकरस आत्मा लक्षित है, 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना करते हैं।

* कुछ मुमुक्षुओंको श्रवणका लाभ नहीं होता है, उसमें यह प्रमाण दिखलाते हैं। अर्थात्

† अनेक पुरुषोंको श्रवण नहीं होता, इस प्रकार श्रुतिने जो प्रतिपादन किया है, उसमें श्रुत्युक्त ये दोनों कारण हैं, अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे श्रवण नहीं होता है, अथवा कदाचित् परिष्कृत बुद्धि है, परन्तु सामग्री नहीं है, तो भी श्रवण नहीं होता, इसमें ध्यानदीपका यह श्लोक भी प्रमाण है—

'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥'

विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भाषानुवादसहित ४६५


सम्भवति, तेषामध्ययनगृहीतैः वेदान्तैरापाततोऽधिगमितब्रह्मात्मभावानां तद्विचारं विनैव प्रश्नोपनिषदाद्युक्तमार्षग्रन्थेषु ब्राह्मवासिष्ठादिकल्पेषु पञ्चीकरणादिषु चानेकशाखाविप्रकीर्णसर्वार्थोपसंहारेण कल्पसूत्रेष्वग्निहोत्रादिविधोरिवानुष्ठानप्रकारं निर्गुणोपासनं सम्प्रदायमात्रविद्द्भ्यो गुरुभ्योऽवधार्य तदनुष्ठानात् क्रमेणोपास्यभूतनिर्गुणब्रह्मसाक्षात्कारः सम्पद्यते। अवि-


व्युत्पत्तिके सम्पादनमें कुशल आचार्यके प्राप्त न होनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते, अध्ययनसम्पादित वेदान्तोंसे सामान्यतः जीवब्रह्मैक्य जाननेवाले उन पुरुषोंको—उसके विचारके बिना ही जैसे अनेक शाखाओंमें विप्रकीर्ण-विशकलित-रूपसे उपलब्ध पदार्थोंके उपसंहारसे अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान प्रकार निश्चित होता है, वैसे ही † ब्राह्म, वासिष्ठ आदि ऋषिनिर्मित ग्रन्थोंमें और पञ्चीकरण आदि ग्रन्थोंमें ‡ विशकलितरूपसे अवस्थित अर्थोंका उपसंहार द्वारा प्रश्नोपनिषत् आदिमें उक्त निर्गुण ब्रह्मोपासनाका प्रकारविशेष सम्प्रदायवेत्ता गुरुओंसे जानकर उसके अनुष्ठान करनेसे—क्रमशः उपास्यभूत निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। अविसंवादिभ्रम न्यायसे × उपासना भी कदाचित् फलकालमें


अर्थात् जो बुद्धिकी मन्दतासे अथवा ग्रामप्रोष्ठ अभावसे वेदान्त श्रवणकी प्राप्ति न कर सकें, वे अहर्निश ब्रह्मकी उपासना करें, तात्पर्य यह है कि भले ही वे वेदान्ताध्ययणसे रहित हों, परन्तु अध्ययनसे सामान्यतः उन्हें आत्माका परिज्ञान हो, तो श्रवणके बिना ही गुरुओंसे आत्माका सद्विशेष निर्णय करके उसकी उपासनासे ब्रह्मसाक्षात्कार कर सकते हैं।

† ब्राह्मपुराण और योगवासिष्ठ इत्यादि आर्ष ग्रन्थ, यह भाव है।

‡ यदि प्रश्नमें शङ्का हो कि पञ्चीकरणमें कहा है कि वेदान्तके लक्ष्यभूत अखण्डैकरस प्रत्यगब्रह्मात्मक मनका ज्ञानके प्रतिलोपनपूर्वक 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार अभेदभावनासे अवस्थान ही समाधि है, इससे और 'योऽसावखण्डैकरसः सोऽहमस्मि' इत्यादि उदाहृत ध्यानदीपके वचनसे प्रकृत निर्गुण ब्रह्मदृष्टिही की विवक्षा की गई है, प्रश्नोपनिषत्में शैव्यके प्रश्नमें तो ओंकाररूप प्रतीकमें निर्गुण ब्रह्मदृष्टि विवक्षित है, वैसे कठवल्लीमें भी इसी प्रकारकी उपासना निकली है। इस परिस्थितिमें प्रकृत निर्गुणोपासनामें यह प्रश्नोपनिषत्का वाक्य प्रमाणरूपसे कैसे ग्राह्य हो सकता है, सो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत उपासनामें तापनी, माण्डूक्य आदि उपनिषद् ही प्रमाणरूपसे विवक्षित हैं और प्रश्न, कठवल्ली आदिका उदाहरण तो यह बतलानेके लिए दिया गया है कि निर्गुण उपासना अन्यत्र भी दृष्ट है, यह भाव है।

× अविसंवादिभ्रम न्याय इस प्रकारका है—किसी एक घरमें श्रीकृष्णचन्द्रकी मूर्ति है, उसके प्रतिबिम्बका घरसे बाहर प्रदेशमें स्थित पुरुषको आभास होनेपर 'ये श्रीकृष्णचन्द्र हैं'

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४६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

संवादिभ्रमन्यायेन उपास्तेरपि क्वचित् फलकाले प्रमापर्यवसानसम्भवात् । पाणौ पञ्च वराटकाः पिधाय केनचित् 'करे कति वराटकाः' ? इति पृष्टे 'पञ्च वराटकाः' इति तदुत्तरवक्तृवाक्यप्रयोगमूलभूतसङ्ख्याविशेष- ज्ञानस्य मूलप्रमाणशून्यस्याऽऽहार्यारोपरूपस्यापि यथार्थत्ववन्निर्गुणब्रह्मोपासन- स्याऽर्थतथात्वविवेचकनिर्विकित्समूलप्रमाणनिरपेक्षस्य दहराद्युपासनवदु- पासनाशास्त्रमात्रमवलम्ब्य क्रियमाणस्यापि वस्तुतो यथार्थत्वेन दहराद्यु-


प्रमाणमें पर्यवसित होती है । जैसे कोई अपने हाथमें पाँच कौड़ियोंको बन्द करके * पूछे कि बतलाओ मेरे हाथमें कितनी कौड़ियाँ हैं ? इसके जवाबमें किसीने अटकलसे कहा कि पाँच कौड़ियाँ हैं । इसमें जिस पुरुषने उत्तर दिया उसके वाक्यप्रयोगमें हेतुभूत जो संख्याविशेषज्ञान है, वह यद्यपि मूल प्रमाणसे शून्य और आहार्यारोप है, तथापि वह जैसे यथार्थ माना जाता है, वैसे ही † अर्थतथात्वनिश्चायक मूल प्रमाणसे निरपेक्ष क्रियमाण ब्रह्मोपासना भी दहरादि उपासनाके समान ‡ केवल शास्त्रका अवलम्बन करके वस्तुतः


इस प्रकार भ्रम उत्पन्न होता है, इस भ्रमके बाद उस पुरुषके प्रतिबिम्बाध्यासकी उपाधिकी सन्निधिमें जानेसे सत्य कृष्णचन्द्रविषयक प्रमा होती है, यह देखा जाता है । इस स्थलमें प्रतिबिम्ब स्थलमें उत्पन्न बिम्बभूत कृष्णचन्द्रका भ्रम अविसंवादी (सफल) कहलाता है । प्रकृतमें जैसे उस भ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको श्रीकृष्णप्राप्तिरूप फलके समयमें श्रीकृष्णकी प्रमा उत्पन्न होती है, वैसे ही निर्गुण उपासनामें प्रवृत्त पुरुषको ब्रह्मप्राप्तिरूप फलकालमें निर्गुण ब्रह्मकी प्रमा होती है, यह भाव है ।

* पूर्वमें संवादिभ्रमके दृष्टान्तसे निर्गुण उपासनका प्रमामें पर्यवसान है, यह जो कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त विषम है, कारण कि कृष्णके प्रतिबिम्ब-विभ्रमस्थलमें उपाधिके पास जानेके बाद चक्षुके सन्निकर्षसे श्रीकृष्णकी प्रमा होती, संवादी भ्रमसे नहीं होती, प्रकृतमें प्रमाके उत्पादनमें निर्गुण उपासनाकी सामर्थ्य नहीं है और न तो कोई अन्य सामग्री है, इसलिए उसका प्रमामें पर्यवसान कैसे हो सकता है ? इस प्रकारकी आशङ्का करके निर्गुण उपासनामें स्वसमान विषयकी प्रमाके उत्पादनमें सामर्थ्य है, उसका प्रतिपादन करनेके लिए उसकी यथार्थताका सदृष्टान्त उपपादन इस ग्रन्थसे करते हैं ।

† ब्रह्मरूप अर्थके प्रत्यग्रूपत्व, निष्प्रपञ्चत्वरूप तथात्वका निर्णायक जो अन्यार्थबोधकत्व-शून्य मूलभूत श्रुति प्रमाण है उसकी अपेक्षा नहीं रखनेवाली अर्थात् निदिध्यासनके समान प्रकृत निर्गुणोपासना विचारपूर्वक नहीं है, अतः निर्विचिकित्स तत्त्वनिर्णयपूर्वकत्वप्रयुक्त यह यथार्थता नहीं है, यह भाव है ।

‡ सगुण उपासनामें जैसे सगुण ईश्वरमें विचारपूर्वक जीवाभिन्नताका निर्णय नहीं

[ ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४६७


पासनेनेव निर्गुणोपासनेन जन्यस्य स्वविषयसाक्षात्कारस्य श्रवणादि- प्रणालीजन्यसाक्षात्कारवदेव तत्त्वार्थविषयत्वावश्यंभावाच्च ।

इयांस्तु विशेषः—प्रतिबन्धरहितस्य पुंसः श्रवणादिप्रणाल्या ब्रह्मसा- क्षात्कारो झटिति सिध्यतीति साङ्ख्यमार्गो मुख्यः कल्पः, उपास्त्या तु विलम्बेनेति योगमार्गोऽनुकल्प इति ॥ ८ ॥

ननु किं करणं ब्रह्मसाक्षात्कारे ब्रह्मके साक्षात्कारमें करण क्या है ?

नन्वस्मिन् पक्षद्वयेऽपि ब्रह्मसाक्षात्कारे किं करणम् ? । अत्र केचन ।

प्रत्ययावृत्तिमाहुरग्र्युः साङ्ख्ये योगे च सम्भवात् ॥ १९ ॥

इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं कि साङ्ख्य और योग दोनों मार्गमें प्रत्ययावृत्ति ही ब्रह्मके साक्षात्कारमें करण है ॥ १९ ॥


यथार्थ होनेके कारण दहरादि उपासनाके समान निर्गुण उपासनासे जन्य स्वविषयक साक्षात्कार श्रवणादि क्रमसे उत्पन्न साक्षात्कारके समान तत्त्वार्थ- विषयकत्व अवश्य हो सकता है ।

विशेष केवल इतना ही है कि प्रतिबन्धकोंसे शून्य पुरुषको श्रवणादि क्रमसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार शीघ्र होता है, इसलिए सांख्यमार्ग मुख्य कल्प है और उपा- सनासे ब्रह्मसाक्षात्कार विलम्बसे होता है, अतः योगमार्ग गौण कल्प है ॥८॥

यहांपर * शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें भी अर्थात् सांख्यमार्ग और योगमार्गमें भी ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण कौन है ?


है, तथापि 'सगुण ईश्वरकी अभिप्रीतये अपनी उपासना करनी चाहिए' इस प्रकारके उपासना- विधिशास्त्रके सामर्थ्यसे सगुण उपासना की जाती है, वैसे ही 'निर्गुण उपासना करनी चाहिए' इस शास्त्रके आधारपर निर्गुण उपासना करनी चाहिए, यह भाव है ।

* यदि शङ्का हो कि यह प्रश्न पक्षद्वयसाधारण नहीं हो सकता है, क्योंकि योगमार्गमें निर्गुण उपासना ही सगुण उपासनाके दृष्टान्तसे पूर्वमें करण कही गई है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह प्रश्न प्रमाणके अभिप्रायसे पूछा गया है, पहले निर्गुण उपासनामें ब्रह्म- साक्षात्कारकी हेतुता बतलाई गई है, करणता नहीं, इसलिए इस प्रश्नकी अनुपपत्ति नहीं है, अर्थात् योगमार्गमें उपासना ही करण है, या अन्य कोई यह प्रश्न हो सकता है, यह भाव है ।

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४६८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

केचिदाहुः—प्रत्ययाभ्यासरूपं प्रसंख्यानमेव। योगमार्गे आदित आरभ्योपासनरूपस्य साङ्ख्यमार्गे मननानन्तरनिदिध्यासनरूपस्य च तस्य सत्त्वात्। न च तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वे मानाभावः, 'ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रवणात्। कामातुरस्य व्यवहितकामिनीसाक्षात्कारे प्रसंख्यानस्य करणत्वक्लृप्तेश्च। 'आ प्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्' (उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १२) इत्यधिकरणे, 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वाद्' (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ५९) इत्यधिकरणे च दहराद्यहंग्रहोपासकानां प्रसंख्यानादुपास्यसगुणब्रह्मसाक्षात्काराङ्गीकाराच्च। ननु च प्रसंख्यानस्य प्रमाणपरिगणनेष्वपरिगणनात् तज्जन्यो ब्रह्मसाक्षात्कारः प्रमा न स्यात्। न च काकतालीसम्वादिवराटकसङ्ख्या-

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण है, क्योंकि योगमार्गमें पहलेसे लेकर उपासनारूप और सांख्यमार्गमें मननके बाद निदिध्यासनरूप प्रसंख्यान विद्यमान ही है। यदि शङ्का हो कि प्रसंख्यानको ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ततस्तु०' (निर्विशेष परमात्माका ध्यान करनेवाला पुरुष उस ध्यानसे परमात्माको देखता है) इस प्रकारकी श्रुति प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यानको साक्षात्कारके प्रति करण माननेमें प्रमाण है।† और कामातुरके असन्निकृष्टकामिनीके साक्षात्कारमें प्रसंख्यानकी करणता दृष्ट भी है। 'आप्रायणात् ‡ तत्रापि हि दृष्टम्' इस अधिकरणमें और 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात्' × इस अधिकरणमें दहरादि और अहंग्रहके उपासकोंके उपास्य सगुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति प्रसंख्यानको करण माना भी गया है। यदि शङ्का हो कि प्रमाणकी गिनतीमें प्रसंख्यानका परिगणन न होनेसे उससे उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मसाक्षात्कार प्रमा नहीं होगी। और काकतालीय कौड़ीकी


† इस स्थलमें कामिनीके साथ चक्षुका संसर्ग न होनेके कारण और मनका बाह्यार्थमें स्वातन्त्र्य न होनेके कारण कामिनीविषयक प्रसङ्ख्यान ही कामिनीसाक्षात्कारमें करण है, यह तात्पर्य है।
‡ मरणपर्यन्त सगुण उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, क्योंकि मरणकालमें भी योगी लोग ब्रह्मकी उपासना करते हैं, यह श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, इसलिए सर्वदा जबतक ब्रह्मचिन्तन न किया जाय, तबतक मरणकालमें वह नहीं हो सकता है, यह सूत्रका अर्थ है।
× सगुण उपासनाओंका विकल्प मानना ही युक्त है, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल सामान्यरूपसे सर्वत्र एक ही है, यह 'विकल्पो' इत्यादि सूत्रका अक्षरार्थ है।

ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४६९


विशेपाहार्यज्ञानवद् अर्थाबाधेन प्रमात्वोपपत्तिः, प्रमाणामूलकप्रमात्वा- योगात् । आहार्यवृत्तेश्च उपासनार्वृत्तिवद् ज्ञानभिन्नमानसक्रियारूपतया इच्छादिवद् अवाधितार्थविषयत्वेऽपि प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । मैवम्, क्लृप्त- प्रमाकरणामूलकत्वेऽपीश्वरमायावृत्तित्त्वत् प्रमात्वोपपत्तेः । विषयाबाधतौ- ल्यात् । मार्गद्वयेऽपि प्रसङ्ख्यानस्य विचारितादविचारिताद्वा वेदान्तात् ब्रह्मात्मैक्यावगतिमूलकतया प्रसङ्ख्यानजन्यस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य प्रमाण- मूलकत्वाच्च । उक्तं च कल्पतरुकारैः—


संख्याविशेषके सफल ज्ञानके समान अर्थके बाधित न होनेपर भी ब्रह्मसाक्षा- त्कारको प्रमा नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रमाणसे अनुत्पन्न ज्ञान प्रमा नहीं होता, यह नियम है, जैसी उपासना वृत्ति ज्ञानभिन्न क्रियारूप है, वैसे ही आहार्यवृत्ति भी * मानस क्रियारूप ही है, इसलिए उसके अबाधितार्थविषयक होनेपर भी इच्छा आदिके समान उसमें प्रमात्व नहीं माना जा सकता है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि ब्रह्मसाक्षात्कार प्रसिद्ध प्रमाणजन्य नहीं है, तथापि ईश्वरकी † मायावृत्तिके समान उसमें प्रमात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि विषयका ‡ अबाध समान ही है । और उक्त दो मार्गोंमें प्रसंख्यानके मूलविचारित या अविचारित वेदान्तसे × होनेवाली जीवब्रह्मैक्यविषयक अवगति के होनेसे प्रसंख्यानजन्य ब्रह्मसाक्षात्कार भी प्रमाणमूलक ही हो सकता है । इस विषयमें कल्पतरुकारने कहा भी हैं ।


* अविसंवादी वराटकसंख्या आदिको विषय करनेवाली वृत्ति आहार्य वृत्ति कहलाती है, अथवा बाधकालीन इच्छाजन्य वृत्ति आहार्यवृत्ति है ।

† ईश्वरकी मायावृत्तिमें भी यदि ज्ञानत्वका अङ्गीकार न किया जायगा, तो 'यः सर्वज्ञः स सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिकी उपपत्ति नहीं होगी, कारण कि ईश्वरमें सर्वज्ञताकी भी मायावृत्तिके आधारपर ही उपपत्ति है, यह भाव है ।

‡ इच्छाका वारण करनेके लिए इच्छाभिन्नत्व विशेषण देना चाहिए, अतः इच्छामें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथा इच्छाके अबाधितार्थ कत्व होनेसे उसमें भी ज्ञानत्वकी प्रसक्ति, होगी यह भाव है ।

× अविचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होता है, यह योगमार्गाभिप्रायसे कहा गया है, और सांख्यमार्गमें विचारित वेदान्तसे ब्रह्मात्मैक्यावगति होती है, इस अभिप्रायसे 'विचारितात्' यह विशेषण है, यदि शङ्का हो कि विचारित या अविचारित वेदान्तसे ही ब्रह्मावगति हो

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४७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद ]

'वेदान्तवाक्यजज्ञानभावनाजाऽपरोक्षधीः ।
मूलप्रमाणदार्थ्येन न भ्रमत्वं प्रपद्यते ॥
न च प्रामाण्यपरतस्त्वापत्तिस्तु प्रसज्यते ।
अपवादनिरासाय मूलशुद्ध्यनुरोधनात् ॥' इति ।
अन्ये तु मन एवाहुरेनां तत्सहकारिणीम् ।

कुछ लोग कहते हैं कि मन ही ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारण है और प्रत्ययावृत्ति मनकी सहकारी कारण है ।

अन्ये तु 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः', 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यादिश्रुतेर्मन एव ब्रह्मसाक्षात्कारे करणम्, तस्य सोपाधिकात्मनि अहंवृत्तिरूपप्रमाकरणत्वक्लप्तेः । 'स्वप्नप्रपञ्चविपरीतप्रमात्रादिज्ञानसाधनस्यान्तःकरणस्य' इत्यादिपञ्चपादिकाविवरणग्रन्थैरपि तथा

' वेदान्तवाक्यजज्ञान० '
अर्थात् वेदान्तवाक्योंके ज्ञानरूप अभ्याससे होनेवाली अपरोक्ष बुद्धि वेदान्तवाक्यकी अथवा इससे होनेवाली प्रमाकी दृढ़तासे (अविप्रतिपन्न प्रामाण्य होनेसे) भ्रम नहीं होती है । इससे परतः प्रामाण्यापत्ति भी प्रसक्त नहीं है, क्योंकि अपवादके (अप्रामाण्य शङ्काके) निरासके लिए मूल प्रमाणकी शुद्धिकी अपेक्षा की गई है ।

  • कुछ लोग कहते हैं कि 'एषोऽणुरात्मा०' (इस अत्यन्त सूक्ष्म आत्माको मनसे जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (कुशाग्र बुद्धिसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे आत्मसाक्षात्कारमें मन ही कारण प्रतीत होता है, क्योंकि मनमें सोपाधिक आत्माके अहमाकार वृत्तिरूप प्रमात्मक साक्षात्कारके प्रति करणता लोकमें प्रसिद्ध है, और 'प्रातिभासिक स्वप्न प्रपञ्चसे विपरीत व्यावहारिक प्रमाता आदि पदार्थोंके ज्ञानके प्रति साधनभूत अन्तःकरणके' इत्यादि प्रपञ्चपादिका आदि विवरणग्रन्थोंसे प्रमाताशब्दसे कहलानेवाले सोपाधिक

सकती है, तो प्रसंख्यानकी क्या आवश्यकता है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रसंख्यानके पूर्वमें अविद्याके निवर्तक अप्रतिबद्ध ब्रह्मावगति उत्पन्न नहीं हो सकती है, यह भाव है।

* केवल प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, किन्तु तत्सहकृत अन्तःकरण ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इस प्रकारके मतका अवलम्बन करनेवालोंके मतका निरूपण इस ग्रन्थसे करते हैं ।

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ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ] भाषानुवादसहित ४७१

प्रतिपादनात् । 'अहमेवेदं सर्वं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः' इति श्रुत्युक्ते स्वाप्ने ब्रह्मसाक्षात्कारे एव मनसः करणत्वसम्प्रतिपत्तेश्च । तदा करणान्तराभावात् । प्रसङ्ख्यानं तु मनस्सहकारिभावेनापि उपयुज्यते । 'वाक्यार्थभावनापरिपाकसहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्ष्यस्य तत्तदुपाध्याकारनिषेधेन तत्पदार्थतामाविर्भावयति'—इति भामतीवचनात् । 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रुतावपि ज्ञानप्रसादशब्दितचित्तैकाग्र्यहेतुतयैव ध्यानोपादानात् । न तु प्रसङ्ख्यानं स्वयं करणम्, तस्य क्वचिदपि ज्ञानकरणत्वाक्लृप्तेः । कामातुरकामिनीसाक्षात्कारादावपि प्रसङ्ख्यानसहकृतस्य मनस एव करणत्वोपपत्त्याऽक्लृप्तज्ञानकरणान्तरकल्पनायोगादित्याहुः ।


आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी करणताका प्रतिपादन किया गया है । और 'अहमेवेदम्०' ( सब वस्तुओंमें सद्रूपसे अनुभूयमान यह सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इसलिए सभी मैं हूँ, ऐसा स्वप्नमें ब्रह्मवित् मानता है, यह इसका उच्च लोक है ) इस श्रुतिसे प्रतिपादित स्वप्नकालीन निर्गुण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मन ही करण माना गया है, क्योंकि स्वप्नकालमें मनके सिवा अन्य करण नहीं रहते हैं । आत्मसाक्षात्कारके प्रति प्रसङ्ख्यान मनकी सहकारितारूपसे उपयुक्त होता है, क्योंकि 'महावाक्यार्थकी भावनाके परिपाकसे युक्त अन्तःकरण तत्-तत् उपाधिके आकारके निषेधसे त्वंपदार्थके अपरोक्षानुभवमें तत्पदार्थत्वका आविर्भाव करता है' इस प्रकार भामतीकारका वचन भी है । 'ज्ञानप्रसादेन † विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु' ( ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे शुद्ध ब्रह्मको देखता है ) इस श्रुतिमें भी 'ज्ञानप्रसाद' शब्दसे विवक्षित चित्तकी एकाग्रताके प्रति हेतुरूपसे ही ध्यानशब्दका प्रयोग किया गया है । केवल प्रसंख्यान आत्मसाक्षात्कारमें करण नहीं है, क्योंकि कहीं भी उसकी ज्ञानके करणरूपसे प्रतीति नहीं होती है । और कामातुर पुरुषके कामिनीसाक्षात्कारकी प्रसङ्ख्यानसहकृत मनकी करणतासे ही उपपत्ति हो सकती है, फिर ज्ञानके प्रति अक्लृप्त अन्य करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है ।


† करण-व्युत्पत्तिसे अर्थात् 'ज्ञायते अनेन' इत्यादि व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्दका अर्थ अन्तःकरण है, उसका प्रसाद—चित्तकी एकाग्रता, यह एकाग्रता ध्यानसे प्राप्त होती है,

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४७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

महावाक्यं परे प्राहुर्मनसः प्रतिषेधतः ॥ २० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें तत्त्वमस्यादि महावाक्य ही करण है, क्योंकि अनेक श्रुतियोंमें मनकी करणताका प्रतिषेध किया गया है ॥ २० ॥

अपरे तु 'तद्धास्य विजज्ञौ' 'तमसः पारं दर्शयति' 'आचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादिश्रुतिषु आचार्योपदेशानन्तरमेव ब्रह्मसाक्षात्कारोदये, जीवन्मुक्तिश्रवणाद्, 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चिताथाः' इति ज्ञानान्तरनैराकाङ्क्ष्यश्रवणात्, 'तं त्वौपनिषदं पुरुषम्' इति ब्रह्मण उपनिषदेकगम्यत्वश्रवणाच्च औपनिषदं महावाक्यमेव ब्रह्मसाक्षात्कारे


कुछ लोग कहते हैं कि 'तद्धास्य विजज्ञौ' (उसने पिताके उपदेशसे उस ब्रह्मका साक्षात्कार किया) 'तमसः पारं दर्शयति०' (अविद्याके अधिष्ठानभूत ब्रह्मको दिखलाता है) 'आचार्यवान्०' (आचार्यवाला पुरुष जानता है, विद्वान्‌की विदेह मुक्तिमें तबतक ही देर है, जबतक प्रारब्धसे वह मुक्त नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंमें आचार्यके उपदेशके बाद ही ब्रह्मसाक्षात्कारका उदय होनेपर, जीवन्मुक्तिका श्रवण है, इसलिए और 'वेदान्तविज्ञान०' * (वेदान्त वाक्योंके ज्ञानसे ही जिन्हें अर्थ निश्चित हो गया है) इससे ज्ञानके बाद किसी आकाङ्क्षाके न होनेसे एवं 'तन्त्वौपनिषदं पुरुषम्' (उस उपनिषत्प्रमाणगम्य पुरुषको) इस श्रुतिसे ब्रह्मके उपनिषत्प्रमाणगम्यत्वके श्रवणसे [यही निश्चित होता है] ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति उपनिषत्के महावाक्य ही † करण हैं, मन


इसलिए ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे उस आत्माको देखता है, यह इस श्रुतिका तात्पर्य है।

* जिन लोगोंके मतसे महावाक्य ही ब्रह्म-साक्षात्कारके प्रति कारण है, उनका मत इस ग्रन्थसे दिखलाया जाता है।

प्रकृत श्रुतिसे वेदान्तवाक्यजन्य ज्ञानसे ही ब्रह्मात्मैक्यरूप अर्थका निश्चय होता है, ऐसा कहनेसे वाक्यार्थज्ञानके बाद प्रसङ्ख्यानका अनुष्ठान अपेक्षित नहीं है, यह प्रतीत होता है, इसकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि वाक्यसे ही अपरोक्ष ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय, इससे 'वेदान्तविज्ञान' इत्यादि श्रुतिसे वाक्य ही अपरोक्षज्ञानमें करणत्वरूपसे निश्चित होता है, यह भाव है।

† सांख्य और योगमार्गके अनुष्ठानसे दृष्ट और अदृष्टरूप सकल प्रतिबन्धकका विनाश होनेपर प्रतिबन्धकसे रहित वाक्य ही साक्षात्कारको उत्पन्न करता है, इसलिए वाक्यके करणत्व-पक्षमें सांख्य और योगमार्गकी वैयर्थ्यशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है।

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ब्रह्मसाक्षात्कारमें करणविचार ] भाषानुवादसहित ४७३


करणम्, न मनः । 'यन्मनसा न मनुते' इति तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वनिषेधात् । न चाऽपक्वमनोविषयमिदम् । 'येनाहुर्मनो मतम्' इतिवाक्यशेषे मनोमात्रग्रहणात् । न चैवं 'यद्वाचाऽनभ्युदितम्' इति शब्दस्यापि तत्करणत्वं निषिध्यते इति शङ्क्यम्, मनःकरणत्ववादिनामपि शब्दस्य निर्विशेषपरोक्षज्ञानकरणत्वस्याभ्युपगतत्वेन तस्य 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुत्यनुरोधेन शब्दार्थप्राप्तिरूपशक्तिमुखेन शब्दस्य तत्करणत्वनिषेधे तात्पर्यस्य वक्तव्यतया शक्यसम्बन्धरूपलक्षणामुखेन तस्य तत्कारणत्वाविरोधात् । न च 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतिसिद्धं मनसोऽपि तत्करणत्वं न पराकर्तुं शक्यमिति वाच्यम्,


नहीं। क्योंकि 'यन्मनसा न मनुते' (जिसका मनसे ज्ञान नहीं हो सकता है) इस श्रुतिसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी साधनताका निषेध किया गया है। यदि शङ्का हो कि वह निषेध अपक्व मनके लिए है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'येनाहुर्मनो मतम्' (जिस चैतन्यसे मनका प्रकाश होता है) इस प्रकारके वाक्यशेषमें सामान्य मनका ही ग्रहण है। यदि शङ्का हो कि 'यद्वाचानभ्युदितम्' (जिस चैतन्यका वाणीसे प्रकाश नहीं होता है) इस श्रुतिसे शब्दकी भी ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारणताका खण्डन किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मन जिसके मतमें साक्षात्कारके प्रति करण है, उसके मतमें भी शब्दको निर्विशेष वस्तुके परोक्षज्ञानके प्रति करण मानते हैं, अतः 'यद्वाचानभ्युदितम्' इत्यादि निषेधका 'यतो वाचो०' ❊ (मनके साथ वाणी भी प्राप्ति न कर जिससे निवृत्त होती है) इस प्रकारकी श्रुतिके अनुरोधसे शब्दकी अर्थप्राप्तिरूपा शक्तिके निषेध द्वारा शब्दनिष्ठ साक्षात्कारके निषेधमें तात्पर्य है, ऐसा कहना होगा, इसलिए शक्यसम्बन्धरूप लक्षणाके द्वारा शब्दमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी करणताका निषेध नहीं है। यदि शङ्का हो कि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए) इस श्रुतिसे मनमें सिद्ध हुई साक्षात्कारकरणताका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी


❊ अर्थात् पूर्वापरवाक्योंके अनुसन्धानसे यही ज्ञात होता है, कि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका बोधक नहीं है, परन्तु लक्षणावृत्तिसे बोधक नहीं है, यह नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।

४७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

शाब्दसाक्षात्कारजननेऽपि तदैकाग्र्यस्याऽपेक्षितत्वेन हेतुत्वमात्रेण तृतीयोपपत्तेः । 'मनसा ह्येष पश्यति मनसा शृणोति' इत्यादौ तथा दर्शनात् । गीताविवरणे भाष्यकारीयमनःकरणत्ववचनस्य मतान्तराभिप्रायेण प्रवृत्तेरित्याहुः ॥ ९ ॥

ननु तथाऽपि शब्दस्य परोक्षज्ञानजनकत्वस्वभावस्याऽपरोक्षज्ञानजनकत्वं न सङ्गच्छते इति चेत्,

मानान्तरस्याप्रसरात्परोक्षेण भ्रमाक्षयात् ।
सहकारिविधानाच्च शब्दादप्यपरोक्षधीः ॥ २१ ॥

ब्रह्ममें किसी अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं होनेसे, परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे और सहकारी (मनन आदि) का विधान होनेसे शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान हो सकता है ॥२१॥

अत्र केचित्—स्वतोऽसमर्थोऽपि शब्दः शास्त्रश्रवणमननपूर्वकप्रत्ययाभ्यासजनितसंस्कारप्रचयलब्धब्रह्मैकाग्र्यचित्तदर्पणानुगृहीतोऽपरोक्षज्ञानमु-


युक्त नहीं है, क्योंकि शब्दसाक्षात्कारके उत्पादनमें भी मनकी एकाग्रताकी अपेक्षा होनेसे केवल हेतु अर्थमें भी उक्त तृतीयाकी (मनसा) उपपत्ति हो सकती है। 'मनसा ह्येष' (यह मनसे देखता है और मनसे सुनता है) इत्यादि स्थलमें चाक्षुष आदि ज्ञानमें मनकी करणताके न होनेपर भी केवल हेतुत्वरूपसे तृतीयाकी उपलब्धि है। गीताके विवरणमें मनमें करणताका प्रतिपादक जो भाष्यकारका वचन है, उसकी किसी मतान्तरसे (वृत्तिकारके मतसे) प्रवृत्ति हुई है, खास निजी मतसे नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥९॥

अब शङ्का होती है कि शब्दके ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वपक्षमें श्रुति और भाष्यका विरोध यद्यपि नहीं है, तथापि जिस शब्दका स्वभाव परोक्षज्ञानजनकता है, उसकी अपरोक्षज्ञानजनकता कैसे सङ्गत हो सकती है ?

इस प्रश्नके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि शब्द स्वतः अपरोक्षज्ञान करनेमें समर्थ नहीं है, तथापि शास्त्रश्रवणमननपूर्वक प्रत्ययाभ्याससे उत्पन्न अनेक संस्कारोंसे प्राप्त ब्रह्मैकाग्र्यसे युक्त चित्तरूप दर्पणसे * अनुगृहीत


* जैसे चक्षु अपने आप प्रतिबिम्बका ग्रहण नहीं करता है, तथापि दर्पणके समवधानसे प्रतिबिम्बका ग्रहण करता है, वैसे ही प्रकृतमें चित्ताख्य दर्पणसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञानको पैदा करता है, यह भाव है।

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ब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित ४७५


त्पादयति शास्त्रीयसंस्कारसंस्कृताग्न्यधिकरणक इव होमोऽपूर्वमिति कल्प्यते । 'तरति शोकमात्मवित्' इति शास्त्रप्रामाण्याद् । अपरोक्षस्य कर्तृत्वाध्यासस्यापरोक्षाधिष्ठानज्ञानं विना निवृत्त्ययोगाद् औपनिषदे ब्रह्मणि मानान्तराप्रवृत्तेः शब्दादप्यपरोक्षज्ञानानुत्पत्तौ अनिर्मोक्षप्रसङ्गादित्याहुः ।

भावनाऽऽवृत्तिसचिवाद्धिधुरस्येव मानसात् ।
कामिन्या इव शब्दात्तामितरे सम्प्रचक्षते ॥ २२ ॥

भावनाकी आवृत्तिसे युक्त अन्तःकरणसे जैसे विधुर पुरुषको कामिनीका साक्षात्कार होता है, वैसे ही भावनाकी आवृत्तिसे युक्त शब्दसे भी ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥२२॥


शब्द अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करता है, जैसे कि शास्त्रीय संस्कारसे संस्कृत † अग्निमें होनेवाला होम अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि 'तरति शोकमात्मवित्' यह श्रुति प्रमाण है। और अपरोक्षरूप कर्तृत्वादि अध्यासकी अधिष्ठानविषयक अपरोक्ष ज्ञानके विना × निवृत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए जिसमें अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं है, ऐसे केवल उपनिषत् प्रमाणगम्य ब्रह्मकी शब्दसे भी अपरोक्षानुभूति न मानी जाय, तो मोक्षकी ‡ अप्रसक्ति होगी ।


† अर्थात् आधान आदि संस्कारोंसे संस्कृत अग्निमें किया हुआ होम (त्यक्त द्रव्यका अग्निमें प्रक्षेप ) ही अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि आधान आदि संस्कार से रहित अग्निमें किया हुआ होम अपूर्वकी उत्पत्तिमें समर्थ नहीं है, इसी प्रकार शब्द भी उक्त चित्तदर्पणानुगृहीत होकर अपरोक्षज्ञानकी उत्पत्ति करता है, यह भाव है।

× कारण कि श्रवण आदिसे उत्पन्न परोक्षज्ञानके रहते हुए भी कर्तृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती है, यदि परोक्षज्ञानमात्रसे अध्यासकी निवृत्ति मानी जाय, तो मनन आदिका विधान व्यर्थ होगा और अपरोक्ष दिग्भ्रम अपरोक्ष साक्षात्कारके विना निवृत्त भी नहीं होता, अतः अपरोक्षकर्मृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति करनेके लिए अवश्य शब्दसे अपरोक्ष ज्ञान मानना चाहिए, यह भाव है ।

‡ तात्पर्य यह है कि अतीन्द्रिय मनको यदि ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माना जाय, तो केवल उपनिषत्प्रमाणसे ही ब्रह्मका ज्ञान होता है, इस औपनिषदत्वश्रुतिके साथ विरोध होनेसे ब्रह्ममें किसी शब्दभिन्न प्रमाणकी प्रवृत्ति न होनेपर शब्दकी भी यदि प्रवृत्ति न मानी जाय, तो ब्रह्मसाक्षात्कारकरणके लब्ध न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कार भी नहीं होगा और सुतरां मोक्षबोधक सम्पूर्ण शास्त्रोंकी अप्रामाण्यप्रसक्ति होगी, इसलिए मोक्षबोधकशास्त्रोंके प्रामाण्यके लिए अवश्य शब्दको साक्षात्कारके प्रति करण मानना चाहिए, यह भाव है ।

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४७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अन्ये तु भावनाप्रचयसाहित्ये सति बहिरसमर्थस्यापि मनसो नष्ट-वनितासाक्षात्कारजनकत्वदर्शनाद् निदिध्यासनसाहित्येन शब्दस्याप्यपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तमिति दृष्टानुरोधेन समर्थयन्ते ।

विज्ञातृचिदभिन्नस्य विषयस्यापरोक्षतः ।
पारोक्ष्यासम्भवादन्ये प्राहुः शब्दापरोक्षताम् ॥ २३ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न विषयका अपरोक्षत्व होनेसे और शब्दसे परोक्षज्ञानका सम्भव न होनेसे शब्दसे ही ब्रह्मका अपरोक्ष होता है ॥२३॥

अपरे तु अपरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽपरोक्षत्वं नाम, अन्यानिरुक्तेः । अर्थापरोक्षत्वं तु नापरोक्षज्ञानविषयत्वम्, येनाऽन्योन्याश्रयो भवेत् । किन्तु तत्तत्पुरुषीयचैतन्याभेदः । अन्तःकरणतद्धर्माणां साक्षिणि कल्पिततया·


* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि बाह्य पदार्थके ग्रहण करनेमें स्वतः मन असमर्थ है, तथापि भावनाधिक्यके सहकारसे वह अन्तःकरण विनष्ट वनिताके साक्षात्कारमें जैसे जनक देखा जाता है, वैसे ही निदिध्यासनके सहकारसे शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न कर सकता है ।

† अन्य लोग कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व है, क्योंकि उसका ( अपरोक्षत्वका ) निर्वचन अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता है । अर्थनिष्ठ अपरोक्षत्व अपरोक्षज्ञानविषयत्वरूप नहीं है, जिससे कि अन्योन्याश्रय हो, किन्तु तत्-तत् पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद है, ‡ अन्तःकरणोंके धर्मोंकी


* शास्त्रप्रमाण कदाचित् न लिया जाय और केवल युक्तिके आधारपर ही विचार किया जाय, तो भी अपरोक्षज्ञानजनकत्व घट सकता है, ऐसा इस मतसे प्रतिपादन करते हैं ।
† अब शब्दमें परोक्षज्ञानजनकत्व हैं ही नहीं, अतः नित्य अपरोक्षब्रह्मके साक्षात्कारमें वेदान्तोंकी करणता अबाधित है, इस प्रकारके मतान्तरको कहते हैं ।
‡ तात्पर्य यह है कि अन्य प्रकारकी अनुपलब्धि होनेसे अर्थका अपरोक्षत्व यदि अपरोक्ष-ज्ञानविषयत्व माना जायगा, तो अन्योऽन्याश्रय होगा, क्योंकि अर्थके अपरोक्षत्वकाज्ञान होनेपर ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होगा और ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होनेपर अर्थ की अपरोक्षताका ज्ञान होगा, इसलिए अपरोक्षज्ञानविषयकत्वको अर्थका अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं, किन्तु तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्नत्व ही उन उन विषयोंका तत्-तत् प्रमाताके प्रति अपरोक्षत्व है । अर्थात् तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न अर्थविषयक ज्ञान ही तत्-तत् प्रमातृचैतन्याभिन्न विषयमें अपरोक्षज्ञान है । यदि शङ्का हो कि इस प्रकारके अर्थापरोक्षत्वका अनुगम नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्वकी जातिरूपता

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ब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित [ ४७७


तदभेदसत्त्वाद् । बाह्यचैतन्ये कल्पितानां घटादीनां बाह्यचैतन्ये वृत्तिकृततत्त्पुरुषीयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्या तदभेदसत्त्वाच्च न क्वाप्यव्याप्तिः । न चान्तःकरणतद्धर्माणां ज्ञानादीनामिव धर्माधर्मसंस्काराणामपि साक्षिणि कल्पितत्वाविशेषाद् आपरोक्ष्यापत्तिः । तेषामनुद्भूतत्वाद् उद्भूतस्यैव जडस्य चैतन्याभेद आपरोक्ष्यमित्यभ्युपगमात् । एवं च सर्वदा सर्वपुरुषचैतन्याभिन्नत्वाद् ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इति श्रुत्या स्वत एवाऽपरोक्षं


साक्षीमें कल्पना होनेके कारण साक्षी चैतन्यके साथ अभेद है ही + । बाह्य घटावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पित घट आदिका बाह्य चैतन्यमें वृत्ति द्वारा × तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अमेदाभिव्यक्तिसे तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे कोई अनुपपत्ति नहीं है । यदि शङ्का हो कि अन्तःकरण और उसके ज्ञान आदि धर्मोंके समान धर्म, अधर्म और संस्कारोंकी भी साक्षीमें ही कल्पना होनेसे उनका भी आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षत्व) प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके अनुद्भूत होनेसे उद्भूत जड़ पदार्थका चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका अपरोक्षत्व है, * ऐसा स्वीकार किया गया है । इस अवस्थामें सदा सब पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे ‘यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म’ (साक्षात् अपरोक्ष ही ब्रह्म है) इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्म स्वतः अपरोक्ष


और उपाधिरूपताका पूर्वमें ही निरास किया गया है, इसलिए उसका यदि अननुगम हो, तो भी कोई हानि नहीं है ।

+ साक्षीशब्दसे विवक्षित प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद है, यह भाव है, अर्थापरोक्षत्वके निर्वचनमें कल्पितावशिष्ट साधारण अभेदका प्रवेश होनेसे प्रमातृचैतन्य और जड़का वास्तविक अभेद न होनेपर भी ‘जडं यत्’ इस प्रतीतिसे कल्पित अभेदके होनेसे दोष नहीं है, यह तात्पर्य है ।

× बाह्यविषयावच्छिन्न चैतन्यमें चक्षुरादिद्वारा निर्गतवृत्तिका संसर्ग होनेपर वृत्ति और वृत्तिमान्‌का अभेद सिद्ध होगा, इससे वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग प्राप्त होगा, इसलिए वृत्तिसे संसृष्ट बाह्य चैतन्य ही अन्तःकरणके सम्बन्धसे तत्-तत्पुरुषीय चैतन्य होगा, अतः इसी प्रकारके बाह्यचैतन्यमें वृत्तिकृत तत्-तत्पुरुषीय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्ति भी होती है, यह भाव है ।

***** अर्थात् तद्भूतत्वे सति प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वम् अर्थापरोक्षत्वम्, अर्थात् उद्भूत होकर प्रमातृचैतन्यके साथ जो अभिन्न हो, वही अर्थापरोक्षत्व है, उद्भूतत्व है, फलके बलसे कल्पित स्वभावविशेष, वह उद्भूतत्व धर्म आदिमें नहीं है और घट आदिमें है, यह समाधानका तात्पर्य है ।

४७८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीये परिच्छेद

ब्रह्मेति अपरोक्षार्थविषयत्वात् शाब्दस्यापि ब्रह्मज्ञानस्याऽपरोक्षत्ववाचो- युक्तिर्युक्तेत्याहुः ।

अद्वैतविद्याचार्यास्तु स्वसुखज्ञानसङ्ग्रहात् ।
आपरोक्ष्यं स्फुरचित्त्वं तदभेदात्तु तद्भाजि ॥ २४ ॥

अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि स्वरूपसुखके अपरोक्षज्ञानका संग्रह करनेके लिए प्रकाशमान चैतन्यत्व ही अपरोक्षत्व है और चैतन्यके साथ अभेद होनेसे अर्थमें भी अपरोक्षत्व रह सकता है ॥२४॥

अद्वैतविद्याचार्यास्तु नापरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽऽपरोक्ष्यम्, स्वरू- पसुखापरोक्षरूपस्वरूपज्ञानाऽव्यापनात् स्वविषयत्वलक्षणस्वप्रमाणत्वनिषेधात् । किन्तु यथा तत्तदर्थस्य स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याऽभेदोऽर्थापरोक्ष्यम्,

ही है । इसलिए अपरोक्ष अर्थको विषय करनेवाला होनेसे शब्दजन्य ब्रह्म-ज्ञानमें भी अपरोक्षत्वका कथन युक्ति-युक्त है ।

† अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व नहीं है, क्योंकि स्वविषयत्वलक्षण स्वप्रकाशत्वका निषेध होनेसे स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें उक्त लक्षण अव्याप्त होगा, किन्तु जैसे तत्-तत् अर्थोका अपने व्यवहारानुकूल चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका आपरोक्ष्य है ‡


† पूर्वोक्त ज्ञानापरोक्षत्व और अर्थापरोक्षत्वका अन्य प्रकारसे निर्वचन करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें अपरोक्षार्थविषयकत्वके न होनेसे अपरोक्षार्थविषयकत्वरूप अपरोक्षत्वकी उसमें अवस्थिति नहीं होगी, यदि कहा जाय, कि आत्मस्वरूप सुखानुभव साक्षिचैतन्यात्मक है, इसलिए उसके स्वप्रकाश होनेसे और स्वप्रकाशत्वके स्वविषयकत्वरूप होनेसे स्वरूपसुखविषयकत्वरूप अपरोक्षत्व रह सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि एक ही चैतन्यमें विषयविषयीभाव लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि सम्बन्ध दो में रहता है, अतः उक्त लक्षणोंमें अव्याप्ति ही है ।

‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ अभिन्नत्व ही अर्थका अपरोक्षत्व है, अन्तःकरण और उसके धर्मोका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, क्योंकि साक्षिचैतन्यमें उनका अध्यास है, वैसे ही घट आदिका भी उनके व्यवहारमें अनुकूल घटाकार-वृत्तिसे उपहित घटादिके अधिष्ठान चैतन्यके साथ अभेद है, वैसे ब्रह्मका भी अपने व्यवहारमें अनुकूल स्वविषयक वृत्तिसे उपहित साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, इसलिए कहीं-पर भी अव्याप्ति नहीं है । घट आदि अर्थोकी चैतन्यमें ही कल्पना होनेसे चैतन्यके साथ अभेद तो है, परन्तु अपरोक्षत्व सदा नहीं है, इसलिए स्वव्यवहारानुकूल विशेषण दिया

महाज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] | भाषानुवादसहित | ४७९


एवं तत्तद्व्यवहारानुकूलचैतन्यस्य तत्तदर्थाभेदो । तथा च चैतन्यधर्म एवाऽऽपरोक्ष्यम्, न त्वनुमितित्वादिवद् अन्तःकरणवृत्तिधर्मः । अत एव सुखादिप्रकाशरूपे साक्षिणि स्वरूपसुखप्रकाशरूपे चैतन्ये चाऽऽपरोक्ष्यम् । न च घटाद्यैन्द्रियकवृत्तौ तदनुभवविरोधः । अनुभवस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यगतापरोक्ष्यविषयत्वोपपत्तेः ।

ननूक्तं ज्ञानार्थयोरापरोक्ष्यं हृदयादिगोचरशाब्दवृत्तिशाब्दविषययोर-


वैसे ही तत्-तत् व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ तत्-तत् अर्थोंका अभेद ज्ञानका अपरोक्षत्व है । इस परिस्थितिमें अर्थात् चैतन्यके ही तत्-तत् व्यवहारमें अनुकूलत्वेन विवक्षित होनेपर, अपरोक्षत्व चैतन्यका ही धर्म है, अनुमितित्व आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिका धर्म नहीं है*, इससे अर्थात् अपरोक्षत्वके चैतन्यधर्म होनेसे सुख आदिके प्रकाशरूप साक्षीमें और स्वरूपसुखप्रकाशरूप चैतन्यमें अपरोक्षत्व हो सकता है । यदि शङ्का हो कि ज्ञानापरोक्षत्वको चैतन्य धर्म माना जाय, तो घटादि विषयाकारवृत्तिमें अपरोक्षत्वव्यवहार विरुद्ध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभवकी—वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अपरोक्षत्वको विषय मान करके भी—उपपत्ति हो सकती है ।

यदि शङ्का † हो कि ज्ञान और अर्थके आपरोक्ष्यकी हृदय आदिविषयक


गया है, घट आदि विषयक वृत्तिकी अवस्था में ही घट आदि अधिष्ठानभूत चैतन्य उनके व्यवहारमें अनुकूल होता है, सर्वदा नहीं होता, इसलिए अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।

* यदि अपरोक्षत्वको वृत्तिधर्म माना जायगा, तो सुख, दुःख आदि पदार्थों की अपरोक्षवृत्तिका अङ्गीकार न होनेसे और सुखादिके अवभासक साक्षिचैतन्यमें अपरोक्षत्वरूप वृत्तिधर्मके न होनेसे सुख आदिका अपरोक्षत्वानुभव विरुद्ध होगा, इसलिए अपरोक्षत्वको ज्ञानका ही धर्म मानना चाहिए, वृत्तिका नहीं, यह तात्पर्य है । अपरोक्षत्वका परिष्कृत लक्षण यह हुआ—तत्तदर्थव्यवहारानुकूलत्वे सति तत्तदर्थाभिन्नत्वम् अर्थात् उन उन पदार्थोंके व्यवहारमें अनुकूल होकर उन उन पदार्थोंसे जो अभिन्नत्व है, वह ज्ञानापरोक्षत्व है । वह्निविषयक अनुमित्यात्मक वृत्तिसे उपहित जीव चैतन्यमें भी जो वह्निव्यवहारका अनुकूल है, सत्यन्त अर्थात् तत्-तदर्थव्यवहारानुकूलत्व है, अतः उसमें अतिव्याप्तिवारण करनेके लिए विशेष्य दल है । घटादिविषयक ज्ञानके अभावकालमें भी घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्यर्थाभिन्नत्व है, इसलिए उसके वारणके लिए विशेषण दल है, यह भाव है ।

† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणमें उत्पद्यमान सारे शरीरमें व्याप्त होनेवाली हृदय, नाड़ी और धर्म आदिको विषय करनेवाली शाब्दवृत्ति दैवयोगसे कदाचित् हृदय,

४८०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

तिप्रसक्तम् । तत्र दैवात् कदाचित् वृत्तिविषयसंसर्गे सति वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्यस्य चाऽभेदाभिव्यक्तेरवर्जनीयत्वादिति चेद्,* न; परोक्षवृत्तेर्विषयावच्छिन्नचैतन्यगताज्ञाननिवर्तनाक्षमतया तत्राऽज्ञानेनाऽऽवृतस्य विषयचैतन्यस्याऽनावृतेन वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिचैतन्येनाऽभेदाभिव्यक्तेरभावादापरोक्ष्याप्रसक्तेः। अत एव जीवस्य संसारदशायां वस्तुतस्सत्यपि ब्रह्माभेदे न तदापरोक्ष्यम् , अज्ञानावरणकृतभेदसत्त्वात् । न चैवं ब्रह्मणो


शब्दवृत्ति और शाब्दज्ञान विषयमें अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि उस स्थलमें दैवसे कदाचित् वृत्ति और विषयका परस्पर संसर्ग होनेसे वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्य और विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति अवश्य हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है ‡, क्योंकि परोक्षवृत्ति विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकती है, इसलिए उक्त स्थलमें अज्ञानसे आवृत विषय चैतन्यका अनावृत वृत्त्यवच्छिन्न साक्षिरूप चैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है, इससे अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है । इसीसे संसारदशामें ब्रह्मके साथ जीवका अभेद है, तो भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि अज्ञानके आवरणसे भेद है* ।


नाडी आदिसे अवच्छिन्न अन्तःकरणके प्रदेशमें उत्पन्न हो, तो हृदय आदिरूप विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका और हृदय आदिविषयक शाब्दवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यका परस्पर अवश्य अभेद अभिव्यक्त होगा, क्योंकि घटादिस्थलमें वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्ध होनेपर वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति मानी गई है। इस अवस्थामें हृदय आदिविषयक शाब्द और अनुमिति आदिवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यरूप परोक्ष ज्ञानमें, जो कि हृदय आदि अर्थोंसे अभिन्न है और उनके व्यवहारमें अनुकूल है, ज्ञानके अपरोक्षत्वरूप लक्षणकी अतिव्याप्ति अवश्य हो सकती है, अतः तथाकथित ज्ञानका अपरोक्षत्व असिद्ध है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि जिन चैतन्योंका परस्पर अभेद विवक्षित है उनका अनावृतत्व भी अपेक्षित है, क्योंकि उनमें से एक भी चैतन्य यदि आवृत हो, तो उनका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता है, इसलिए हृदय आदि विषयको अवगाहन करनेवाली शाब्दवृत्ति स्थलमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हो सकती है ।

* तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्तिमें ही अपरोक्षत्वप्रयोजकताका अङ्गीकार होनेसे तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्वकालमें ब्रह्मका अपने व्यवहारमें अनुकूल जीव चैतन्यके साथ अभेद होनेपर भी अभेदाभिव्यक्ति न होनेसे ब्रह्मका अपरोक्षत्व नहीं होता है ।