भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 498
४६८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

केचिदाहुः—प्रत्ययाभ्यासरूपं प्रसंख्यानमेव। योगमार्गे आदित आरभ्योपासनरूपस्य साङ्ख्यमार्गे मननानन्तरनिदिध्यासनरूपस्य च तस्य सत्त्वात्। न च तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वे मानाभावः, 'ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः' इति श्रवणात्। कामातुरस्य व्यवहितकामिनीसाक्षात्कारे प्रसंख्यानस्य करणत्वक्लृप्तेश्च। 'आ प्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्' (उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १२) इत्यधिकरणे, 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वाद्' (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ५९) इत्यधिकरणे च दहराद्यहंग्रहोपासकानां प्रसंख्यानादुपास्यसगुणब्रह्मसाक्षात्काराङ्गीकाराच्च। ननु च प्रसंख्यानस्य प्रमाणपरिगणनेष्वपरिगणनात् तज्जन्यो ब्रह्मसाक्षात्कारः प्रमा न स्यात्। न च काकतालीसम्वादिवराटकसङ्ख्या-

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण है, क्योंकि योगमार्गमें पहलेसे लेकर उपासनारूप और सांख्यमार्गमें मननके बाद निदिध्यासनरूप प्रसंख्यान विद्यमान ही है। यदि शङ्का हो कि प्रसंख्यानको ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ततस्तु०' (निर्विशेष परमात्माका ध्यान करनेवाला पुरुष उस ध्यानसे परमात्माको देखता है) इस प्रकारकी श्रुति प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यानको साक्षात्कारके प्रति करण माननेमें प्रमाण है।† और कामातुरके असन्निकृष्टकामिनीके साक्षात्कारमें प्रसंख्यानकी करणता दृष्ट भी है। 'आप्रायणात् ‡ तत्रापि हि दृष्टम्' इस अधिकरणमें और 'विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात्' × इस अधिकरणमें दहरादि और अहंग्रहके उपासकोंके उपास्य सगुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति प्रसंख्यानको करण माना भी गया है। यदि शङ्का हो कि प्रमाणकी गिनतीमें प्रसंख्यानका परिगणन न होनेसे उससे उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मसाक्षात्कार प्रमा नहीं होगी। और काकतालीय कौड़ीकी


† इस स्थलमें कामिनीके साथ चक्षुका संसर्ग न होनेके कारण और मनका बाह्यार्थमें स्वातन्त्र्य न होनेके कारण कामिनीविषयक प्रसङ्ख्यान ही कामिनीसाक्षात्कारमें करण है, यह तात्पर्य है।
‡ मरणपर्यन्त सगुण उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, क्योंकि मरणकालमें भी योगी लोग ब्रह्मकी उपासना करते हैं, यह श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, इसलिए सर्वदा जबतक ब्रह्मचिन्तन न किया जाय, तबतक मरणकालमें वह नहीं हो सकता है, यह सूत्रका अर्थ है।
× सगुण उपासनाओंका विकल्प मानना ही युक्त है, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल सामान्यरूपसे सर्वत्र एक ही है, यह 'विकल्पो' इत्यादि सूत्रका अक्षरार्थ है।