सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित [ ४७७
तदभेदसत्त्वाद् । बाह्यचैतन्ये कल्पितानां घटादीनां बाह्यचैतन्ये वृत्तिकृततत्त्पुरुषीयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्या तदभेदसत्त्वाच्च न क्वाप्यव्याप्तिः । न चान्तःकरणतद्धर्माणां ज्ञानादीनामिव धर्माधर्मसंस्काराणामपि साक्षिणि कल्पितत्वाविशेषाद् आपरोक्ष्यापत्तिः । तेषामनुद्भूतत्वाद् उद्भूतस्यैव जडस्य चैतन्याभेद आपरोक्ष्यमित्यभ्युपगमात् । एवं च सर्वदा सर्वपुरुषचैतन्याभिन्नत्वाद् ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इति श्रुत्या स्वत एवाऽपरोक्षं
साक्षीमें कल्पना होनेके कारण साक्षी चैतन्यके साथ अभेद है ही + । बाह्य घटावच्छिन्न चैतन्यमें कल्पित घट आदिका बाह्य चैतन्यमें वृत्ति द्वारा × तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अमेदाभिव्यक्तिसे तत्-तत् पुरुषके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे कोई अनुपपत्ति नहीं है । यदि शङ्का हो कि अन्तःकरण और उसके ज्ञान आदि धर्मोंके समान धर्म, अधर्म और संस्कारोंकी भी साक्षीमें ही कल्पना होनेसे उनका भी आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षत्व) प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके अनुद्भूत होनेसे उद्भूत जड़ पदार्थका चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका अपरोक्षत्व है, * ऐसा स्वीकार किया गया है । इस अवस्थामें सदा सब पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद होनेसे ‘यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म’ (साक्षात् अपरोक्ष ही ब्रह्म है) इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्म स्वतः अपरोक्ष
और उपाधिरूपताका पूर्वमें ही निरास किया गया है, इसलिए उसका यदि अननुगम हो, तो भी कोई हानि नहीं है ।
+ साक्षीशब्दसे विवक्षित प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद है, यह भाव है, अर्थापरोक्षत्वके निर्वचनमें कल्पितावशिष्ट साधारण अभेदका प्रवेश होनेसे प्रमातृचैतन्य और जड़का वास्तविक अभेद न होनेपर भी ‘जडं यत्’ इस प्रतीतिसे कल्पित अभेदके होनेसे दोष नहीं है, यह तात्पर्य है ।
× बाह्यविषयावच्छिन्न चैतन्यमें चक्षुरादिद्वारा निर्गतवृत्तिका संसर्ग होनेपर वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद सिद्ध होगा, इससे वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग प्राप्त होगा, इसलिए वृत्तिसे संसृष्ट बाह्य चैतन्य ही अन्तःकरणके सम्बन्धसे तत्-तत्पुरुषीय चैतन्य होगा, अतः इसी प्रकारके बाह्यचैतन्यमें वृत्तिकृत तत्-तत्पुरुषीय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्ति भी होती है, यह भाव है ।
***** अर्थात् तद्भूतत्वे सति प्रमातृचैतन्याभिन्नत्वम् अर्थापरोक्षत्वम्, अर्थात् उद्भूत होकर प्रमातृचैतन्यके साथ जो अभिन्न हो, वही अर्थापरोक्षत्व है, उद्भूतत्व है, फलके बलसे कल्पित स्वभावविशेष, वह उद्भूतत्व धर्म आदिमें नहीं है और घट आदिमें है, यह समाधानका तात्पर्य है ।