भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४७८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीये परिच्छेद

ब्रह्मेति अपरोक्षार्थविषयत्वात् शाब्दस्यापि ब्रह्मज्ञानस्याऽपरोक्षत्ववाचो- युक्तिर्युक्तेत्याहुः ।

अद्वैतविद्याचार्यास्तु स्वसुखज्ञानसङ्ग्रहात् ।
आपरोक्ष्यं स्फुरचित्त्वं तदभेदात्तु तद्भाजि ॥ २४ ॥

अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि स्वरूपसुखके अपरोक्षज्ञानका संग्रह करनेके लिए प्रकाशमान चैतन्यत्व ही अपरोक्षत्व है और चैतन्यके साथ अभेद होनेसे अर्थमें भी अपरोक्षत्व रह सकता है ॥२४॥

अद्वैतविद्याचार्यास्तु नापरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽऽपरोक्ष्यम्, स्वरू- पसुखापरोक्षरूपस्वरूपज्ञानाऽव्यापनात् स्वविषयत्वलक्षणस्वप्रमाणत्वनिषेधात् । किन्तु यथा तत्तदर्थस्य स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याऽभेदोऽर्थापरोक्ष्यम्,

ही है । इसलिए अपरोक्ष अर्थको विषय करनेवाला होनेसे शब्दजन्य ब्रह्म-ज्ञानमें भी अपरोक्षत्वका कथन युक्ति-युक्त है ।

† अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व नहीं है, क्योंकि स्वविषयत्वलक्षण स्वप्रकाशत्वका निषेध होनेसे स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें उक्त लक्षण अव्याप्त होगा, किन्तु जैसे तत्-तत् अर्थोका अपने व्यवहारानुकूल चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका आपरोक्ष्य है ‡


† पूर्वोक्त ज्ञानापरोक्षत्व और अर्थापरोक्षत्वका अन्य प्रकारसे निर्वचन करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरूपज्ञानमें अपरोक्षार्थविषयकत्वके न होनेसे अपरोक्षार्थविषयकत्वरूप अपरोक्षत्वकी उसमें अवस्थिति नहीं होगी, यदि कहा जाय, कि आत्मस्वरूप सुखानुभव साक्षिचैतन्यात्मक है, इसलिए उसके स्वप्रकाश होनेसे और स्वप्रकाशत्वके स्वविषयकत्वरूप होनेसे स्वरूपसुखविषयकत्वरूप अपरोक्षत्व रह सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि एक ही चैतन्यमें विषयविषयीभाव लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि सम्बन्ध दो में रहता है, अतः उक्त लक्षणोंमें अव्याप्ति ही है ।

‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ अभिन्नत्व ही अर्थका अपरोक्षत्व है, अन्तःकरण और उसके धर्मोका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, क्योंकि साक्षिचैतन्यमें उनका अध्यास है, वैसे ही घट आदिका भी उनके व्यवहारमें अनुकूल घटाकार-वृत्तिसे उपहित घटादिके अधिष्ठान चैतन्यके साथ अभेद है, वैसे ब्रह्मका भी अपने व्यवहारमें अनुकूल स्वविषयक वृत्तिसे उपहित साक्षिचैतन्यके साथ अभेद है, इसलिए कहीं-पर भी अव्याप्ति नहीं है । घट आदि अर्थोकी चैतन्यमें ही कल्पना होनेसे चैतन्यके साथ अभेद तो है, परन्तु अपरोक्षत्व सदा नहीं है, इसलिए स्वव्यवहारानुकूल विशेषण दिया