भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

महाज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] | भाषानुवादसहित | ४७९


एवं तत्तद्व्यवहारानुकूलचैतन्यस्य तत्तदर्थाभेदो । तथा च चैतन्यधर्म एवाऽऽपरोक्ष्यम्, न त्वनुमितित्वादिवद् अन्तःकरणवृत्तिधर्मः । अत एव सुखादिप्रकाशरूपे साक्षिणि स्वरूपसुखप्रकाशरूपे चैतन्ये चाऽऽपरोक्ष्यम् । न च घटाद्यैन्द्रियकवृत्तौ तदनुभवविरोधः । अनुभवस्य वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यगतापरोक्ष्यविषयत्वोपपत्तेः ।

ननूक्तं ज्ञानार्थयोरापरोक्ष्यं हृदयादिगोचरशाब्दवृत्तिशाब्दविषययोर-


वैसे ही तत्-तत् व्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ तत्-तत् अर्थोंका अभेद ज्ञानका अपरोक्षत्व है । इस परिस्थितिमें अर्थात् चैतन्यके ही तत्-तत् व्यवहारमें अनुकूलत्वेन विवक्षित होनेपर, अपरोक्षत्व चैतन्यका ही धर्म है, अनुमितित्व आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिका धर्म नहीं है*, इससे अर्थात् अपरोक्षत्वके चैतन्यधर्म होनेसे सुख आदिके प्रकाशरूप साक्षीमें और स्वरूपसुखप्रकाशरूप चैतन्यमें अपरोक्षत्व हो सकता है । यदि शङ्का हो कि ज्ञानापरोक्षत्वको चैतन्य धर्म माना जाय, तो घटादि विषयाकारवृत्तिमें अपरोक्षत्वव्यवहार विरुद्ध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभवकी—वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अपरोक्षत्वको विषय मान करके भी—उपपत्ति हो सकती है ।

यदि शङ्का † हो कि ज्ञान और अर्थके आपरोक्ष्यकी हृदय आदिविषयक


गया है, घट आदि विषयक वृत्तिकी अवस्था में ही घट आदि अधिष्ठानभूत चैतन्य उनके व्यवहारमें अनुकूल होता है, सर्वदा नहीं होता, इसलिए अतिप्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है ।

* यदि अपरोक्षत्वको वृत्तिधर्म माना जायगा, तो सुख, दुःख आदि पदार्थों की अपरोक्षवृत्तिका अङ्गीकार न होनेसे और सुखादिके अवभासक साक्षिचैतन्यमें अपरोक्षत्वरूप वृत्तिधर्मके न होनेसे सुख आदिका अपरोक्षत्वानुभव विरुद्ध होगा, इसलिए अपरोक्षत्वको ज्ञानका ही धर्म मानना चाहिए, वृत्तिका नहीं, यह तात्पर्य है । अपरोक्षत्वका परिष्कृत लक्षण यह हुआ—तत्तदर्थव्यवहारानुकूलत्वे सति तत्तदर्थाभिन्नत्वम् अर्थात् उन उन पदार्थोंके व्यवहारमें अनुकूल होकर उन उन पदार्थोंसे जो अभिन्नत्व है, वह ज्ञानापरोक्षत्व है । वह्निविषयक अनुमित्यात्मक वृत्तिसे उपहित जीव चैतन्यमें भी जो वह्निव्यवहारका अनुकूल है, सत्यन्त अर्थात् तत्-तदर्थव्यवहारानुकूलत्व है, अतः उसमें अतिव्याप्तिवारण करनेके लिए विशेष्य दल है । घटादिविषयक ज्ञानके अभावकालमें भी घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटाद्यर्थाभिन्नत्व है, इसलिए उसके वारणके लिए विशेषण दल है, यह भाव है ।

† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणमें उत्पद्यमान सारे शरीरमें व्याप्त होनेवाली हृदय, नाड़ी और धर्म आदिको विषय करनेवाली शाब्दवृत्ति दैवयोगसे कदाचित् हृदय,