भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४८०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

तिप्रसक्तम् । तत्र दैवात् कदाचित् वृत्तिविषयसंसर्गे सति वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्यस्य चाऽभेदाभिव्यक्तेरवर्जनीयत्वादिति चेद्,* न; परोक्षवृत्तेर्विषयावच्छिन्नचैतन्यगताज्ञाननिवर्तनाक्षमतया तत्राऽज्ञानेनाऽऽवृतस्य विषयचैतन्यस्याऽनावृतेन वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिचैतन्येनाऽभेदाभिव्यक्तेरभावादापरोक्ष्याप्रसक्तेः। अत एव जीवस्य संसारदशायां वस्तुतस्सत्यपि ब्रह्माभेदे न तदापरोक्ष्यम् , अज्ञानावरणकृतभेदसत्त्वात् । न चैवं ब्रह्मणो


शब्दवृत्ति और शाब्दज्ञान विषयमें अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि उस स्थलमें दैवसे कदाचित् वृत्ति और विषयका परस्पर संसर्ग होनेसे वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्य और विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति अवश्य हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है ‡, क्योंकि परोक्षवृत्ति विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकती है, इसलिए उक्त स्थलमें अज्ञानसे आवृत विषय चैतन्यका अनावृत वृत्त्यवच्छिन्न साक्षिरूप चैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है, इससे अपरोक्षत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है । इसीसे संसारदशामें ब्रह्मके साथ जीवका अभेद है, तो भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि अज्ञानके आवरणसे भेद है* ।


नाडी आदिसे अवच्छिन्न अन्तःकरणके प्रदेशमें उत्पन्न हो, तो हृदय आदिरूप विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका और हृदय आदिविषयक शाब्दवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यका परस्पर अवश्य अभेद अभिव्यक्त होगा, क्योंकि घटादिस्थलमें वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्ध होनेपर वृत्त्यवच्छिन्न और विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति मानी गई है। इस अवस्थामें हृदय आदिविषयक शाब्द और अनुमिति आदिवृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यरूप परोक्ष ज्ञानमें, जो कि हृदय आदि अर्थोंसे अभिन्न है और उनके व्यवहारमें अनुकूल है, ज्ञानके अपरोक्षत्वरूप लक्षणकी अतिव्याप्ति अवश्य हो सकती है, अतः तथाकथित ज्ञानका अपरोक्षत्व असिद्ध है।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि जिन चैतन्योंका परस्पर अभेद विवक्षित है उनका अनावृतत्व भी अपेक्षित है, क्योंकि उनमें से एक भी चैतन्य यदि आवृत हो, तो उनका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता है, इसलिए हृदय आदि विषयको अवगाहन करनेवाली शाब्दवृत्ति स्थलमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हो सकती है ।

* तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्तिमें ही अपरोक्षत्वप्रयोजकताका अङ्गीकार होनेसे तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्वकालमें ब्रह्मका अपने व्यवहारमें अनुकूल जीव चैतन्यके साथ अभेद होनेपर भी अभेदाभिव्यक्ति न होनेसे ब्रह्मका अपरोक्षत्व नहीं होता है ।